





नौ ग्रह होते हैं- सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरू, शुक्र, शनि, राहु और केतु। यों तो आकाश में सैकड़ों ग्रह हैं, किन्तु मुख्य ग्रह नौ ही माने जाते हैं, जिनका प्रभाव जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे हमारे ऊपर पड़ता ही रहता है, और इन्हीं ग्रहों के प्रभाव से हमें अपने जीवन में सफलता-असफलता मिलती रहती है। हर ग्रह का मानव-जीवन पर अपना अलग-अलग प्रभाव पड़ता है, जिसके फलस्वरूप मनुष्य को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन नौ ग्रहों में भी पांच ग्रह ऐसे हैं, जिनका प्रभाव प्रायः व्यक्ति पर देखने को मिलता ही है।
इस प्रकार अन्य ग्रह भी अपना दूषित प्रभाव मानव जीवन पर डालते रहते हैं, जिनके चंगुल से बच निकलना मानव के लिये एक दुष्कर कार्य प्रतीत होता है। कई व्यक्ति ढोंगी व्यक्तियों के चंगुल में फंस कर उपरोक्त समस्याओं के निवारण हेतु उनके द्वारा बताये गये उपायों को आजमाते हैं, परन्तु उससे उन्हें कोई लाभ नहीं मिल पाता, अपने कार्यों को सिद्धि एवं सफलता के लिये वे उनसे कई प्रकार के छोटे-मोटे अनुष्ठान-प्रयोग भी करवाते हैं, किन्तु फिर भी उसका अनुकूल फल उन्हें प्राप्त नहीं होता, तब उनका देवताओं आदि पर से विश्वास उठने लगता है, क्योंकि वे उन समस्याओं एवं परेशानियों का कारण नहीं जान पाते, जबकि इन आपदाओं-विपदाओं का मूल कारण ‘‘ग्रह-बाधा’’ ही है।
कुछ व्यक्ति ग्रह बाधा निवारण के लिये छोटे-मोटे टोने-टोटके, मंत्र, अनुष्ठान भी करते रहते हैं, किन्तु उनसे समस्त ग्रह दोषों से मुक्ति नहीं प्राप्त हो सकती, वह तो ‘भगवान चन्द्रमौलिश्वर’ की साधना-उपासना करने पर ही सम्भव है। यदि व्यक्ति अपने जीवन की समस्त बाधाओं, उलझनों एवं परेशानियों से छुटकारा पाना चाहता है, यदि वह जीवन में पूर्णतः सुखी एवं समृद्ध होना चाहता है, यदि वह समस्त ग्रह बाधा से मुक्ति पाना चाहता है, तो उसे यह साधना अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिये, वरना आज जो आपके पास है वह भी बचा रहे, यह कोई जरूरी नहीं।
वेदों, शास्त्रों, पुराणों आदि में भगवान शिव को ही चन्द्रमौलिश्वर कहा गया है-
चन्द्रोद्भासितशेखरे स्मरहरे गंगाधरे शंकरे, सर्पैर्भूषित कण्ठकर्णविवरे नेत्रोत्थ वैश्वानरे।
दन्तित्वक् कृत सुन्दराम्बर धरे त्रैलोक्य सारे हरे, मोक्षार्थं कुरूचित्तवृत्तिमचलाम् अन्यैस्तु किं कर्मभिः।।
अर्थात् ‘‘सिर पर अर्धचन्द्र को धारण किये हुए भगवान चन्द्रमौलिश्वर, जो कामदेव को भस्म करने वाले हैं, जिनके मस्तक से गंगा प्रवाहित हो रही है, कण्ठहार के रूप में सर्प को धारण किये हुये हैं, जिनके तृतीय नेत्र से वैश्वानर अग्नि निकल रही है, हस्ति चर्म को सुन्दर वस्त्र के रूप में धारण किये हुए तीनों लोकों में अद्वितीय भगवान शंकर, जो अपने इस रूप-गुण के कारण ‘चन्द्रमौलिश्वर’ कहे जाते हैं, वे मेरे मन और बुद्धि को मोक्ष मार्ग की ओर प्रेरित करते हुये मेरे समस्त ग्रह जन्य दोषों को दूर करें।’’
भगवान शिव अपने ‘चन्द्रमौलिश्वर’ स्वरूप द्वारा ग्रहों के दूषित प्रभावों से व्यक्ति को या साधक को छुटकारा दिलाते हैं, क्योंकि ‘भगवान चन्द्रमौलिश्वर’ देवाधिपति है, तंत्रेश्वर हैं अतः समस्त मंत्र-तंत्र भी उनके अधीन है, ऐसे भगवान चन्द्रमौलिश्वर की साधना तो प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में एक बार अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिये, इस साधना के बल पर वह व्यक्ति अपने जीवन में समस्त नौ ग्रहों के दूषित प्रभावों से मुक्ति प्राप्त कर उन ग्रहों को अपने अनुकूल बनाने में सफल हो जाता है, और तब उसे जीवन में कभी भी किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं भोगना पड़ता।
ग्रहों की दशा यदि सही रहे, तो व्यक्ति के जीवन में उन्नति के स्त्रोत हमेशा के लिये खुले रहते हैं, और वह कामयाबी की मंजिल की ओर बढ़ते हुये अपने जीवन में पूर्ण सुखी एवं सम्पन्न हो जाता है, क्योंकि इस साधना शक्ति के द्वारा वह एकबारगी ही अपनी समस्त परेशानियों एवं बाधाओं से मुक्ति पा लेता है।
साधना विधान
साधना सामग्री- चैतन्य पूरित रूद्राक्ष, रूद्राक्ष माला।
साधना दिवस- 04 अगस्त, सोमवार या किसी रविवार के दिन सम्पन्न करें।
साधना समय- रात्रि 7:36 से 9:12 तक।
श्रावण सोमवार के दिन रात्रिकालीन इस साधना में बैठने से पहले साधक स्नानादि करके पूर्णतया शुद्ध होकर, पीली धोती धारण कर, ऊपर गुरू चादर धारण करें, तथा अपने सामने किसी लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछा दें, और फिर आसन पर शांतचित्त तथा दत्तचित्त होकर बैठ जायें, इसके पश्चात् तीन बार ‘ऊँ’ की ध्वनि का उच्चारण करने के बाद 5 मिनट तक गुरू का ध्यान करें, और प्रार्थना करें कि मुझे समस्त परेशानियों से मुक्ति प्राप्त हो, ऐसा कहकर उनसे आशीर्वाद ग्रहण करें, तत्पश्चात् किसी प्लेट में कुंकुंम से ‘ऊँ’ लिखकर, उसमें उस विशिष्ट ‘रूद्राक्ष’ को स्थापित कर दें, फिर कुंकुंम का तिलक करके उस पर ‘ऊँ चन्द्रमौलिश्वराय नमः’ मंत्र बोलते हुए 11 बार थोड़े-थोड़े चावल चढ़ायें, तथा 11 बार इसी मंत्र से काली तिल, काली सरसों, काली मिर्च अलग-अलग चढ़ाएं, और धूप या अगरबत्ती जलाकर सरसों या तिल के तेल का दीपक जलाएं, ध्यान रहे कि पूरे साधना काल में दीपक प्रज्वलित रहे।
फिर साधक मन ही मन शिव के ‘चन्द्रमौलिश्वर’ स्वरूप को नमस्कार कर रूद्राक्ष माला से निम्न मंत्र का 9 माला जप करें।
Om Sham Chham Chandramaulishwaraaya Namah
जप समाप्ति के बाद गुरू आरती करें, फिर ‘चैतन्य पूरित रूद्राक्ष’ पर चढ़ी सामग्री को रात्रि के समय पूरे घर व दुकान तथा जो भी आपके आवासीय या व्यापारिक संस्थान है, सब जगह छिड़क दें, जिससे दुष्ट ग्रहों का प्रभाव दूर हो सके तथा भविष्य में भी उन ग्रह दोषों का प्रभाव न हो, इसके पश्चात् रूद्राक्ष तथा माला को किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें।
यह साधना पूर्ण सफलतादायक है, जिसे पूर्ण श्रद्धा और लगन से करने की आवश्यकता है, तभी साधक को इससे निश्चित लाभ की प्राप्ति सम्भव है।
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