





मन का इतना ही उपयोग है कि उसे पार कर जाओ। गुजरो उससे जरूर, क्योंकि इस सीढ़ी से गुजरना ही होगा। रूको मत। गुजरो पूरी तरह, पूरे होश से, ताकि इस सीढ़ी का पूरा अनुभव हो जाये और वापस लौट-लौट कर इस सीढ़ी को देखने की इच्छा न हो। पीछे लौटने का मन ही न हो, इस तरह चलो। क्योंकि पीछे लौट कर देखने का मन भी यही कहता है कि तुम जहां से गुजर गए, वहां पूरी तरह अनुभव नहीं हो पाया, कुछ अधूरा रह गया, कुछ अपरिपक्व रह गया, कुछ होने-होने को था, हो नहीं पाया- तो फिर तुम पीछे लौट कर देखोगे।
यह जो पुनर्जन्म की जीवन-चिंतन है, वह इतनी ही है- वह पीछे लौट-लौट कर देखना है। तुम गुजरे बहुत बार जीवन से, लेकिन भोग न पाये, मन में खटक रह गई, ऐसा लगता ही रहा कि अभी कुछ और मिलने को था। थोड़ा और धन मिल जाता तो सुख मिलता, थोड़ा और पद मिल जाता तो आनन्द मिलता, थोड़ी देर और जी लेते, थोड़ी देर और युवा रह लेते, तो शायद सुख की थोड़ी सी प्रतीति होती- ऐसा पीछे लौट कर देखने का मन रह गया। जिस दृश्य से तुम गुजर गये, गुजर न गये, आंखें अटकी ही रहीं, पीछे तुम देखते ही रहे, चले आगे को, देखा पीछे को- यही पुनर्जन्म का सिद्धांत है। लौट तुम आओगे। तुम अपने ही हाथ से लौटने का इंतजाम कर रहे हो। वापस-वापस उसी गढ्ढे में गिरते रहोगे, जब तक कि तुम इस गढ्ढे से पूरी तरह मुक्त न हो जाओ। और मुक्त होने का एक ही ढंग है कि तुम इसे पूरा का पूरा अनुभव कर लो। अनुभव के अतिरिक्त कोई मुक्त नहीं है।
मैं त्याग से मुक्ति नहीं कहता, मैं भोग को मुक्ति कहता हूं।
उपनिषदों ने कहा है- तेन त्यक्तेन भुंजीथाः। उन्हीं ने त्यागा जिन्होंने भोगा।
यह वचन बड़ा क्रांतिकारी है। क्योंकि जिसने भोगा ही नहीं वह त्यागेगा कैसे! तुम बिना भोगे भी त्याग सकते हो, तब तुम लौट आओगे। तुम्हें वह दृश्य पीछा करता रहेगा। अनभोगा रस तुम्हें बुलायेगा, बार-बार उसी जगह बुलायेगा। तुम लाख उपाय करो, तुम कुछ कर न पाओगे, तुम्हें आना ही पड़ेगा। शरीर चलता जायेगा, मन पीछे लौटता रहेगा। लेकिन अगर तुमने किसी बात को पूरा भोग लिया, जान लिया, सब पहलुओं से पहचान लिया, कुछ छोड़ा नहीं, निचोड़ लिया सारा सार, देख लिया पूरा का पूरा, कुछ देखने को न बचा- तो लौट कर आने का सवाल कहां? लौट कर देखोगे भी क्यों? वहां से मुक्ति हो गई। जो जान लिया, उसी से मुक्त हो गये।
ज्ञान मुक्ति है। अनुभव मुक्ति है। और जो अनुभव में जल्दी करेगा, कच्चा भागना चाहेगा, वह फिर लौट आयेगा। ऐसे देर ही होगी। ऐसे ही तो अनंत जन्मों की देर हो गये है।
तो मन का एक उपयोग है, और वह है, उसके पार होना। जल्दी में उसे छोड़ना मत। नहीं तो छूटेगा नहीं। कोई जल्दी नहीं है। ठीक से पहचान लो, ठीक से जान लो। मन को ठीक से देख लो। जितना तुम जानोगे, जितना देखोगे, उतना ही पाओगे- रेत है। इस रेत से हम तेल निकालने की चेष्टा कर रहे हैं। जिस दिन यह तथ्य पूरी तरह आत्मसात हो जायेगा कि रेत से तेल नहीं निकलता, मन से शांति नहीं मिलती, उसी दिन तुम मुक्त हो गये, मन के पास हो गये। विधायक उपयोग यही हैं मन का। उसकी सीढ़ी बनाओ। उस पर पैर रखो और आगे निकल जाओ।
व्यर्थ नहीं है मन। कोई सीढ़ी व्यर्थ नहीं है। लेकिन तुम उस पागल की तरह हो, जो सीढ़ी को पकड़ लिया। भला सीढ़ी सोने की हो, हीरे-जवाहरात जड़ी हो, तो भी सीढ़ी सीढ़ी है। उस पर बैठ कर तुम रोते रहोगे, उस पर बैठ कर तुम नाच न सकोगे। यात्रा करनी है, आगे जाना है।
मन एक पड़ाव है, उससे गुजर जाओ। वह एक सेतु है, उस पार जाना है। बीच सेतु पर मत बैठे रहो। अन्यथा बहुत धक्के-मुक्के खाओगे, क्योंकि हजारों लोग गुजर रहे हैं सेतु से। तुम्हें कभी शांति न मिलेगी, चैन न मिलेगा।
मन को ठीक से पहचानते ही ध्यान का जन्म होता है। मन ध्यान के आगे की सीढ़ी है। ध्यान पर भी रूकना नहीं है। क्योंकि ध्यान पर जो रूक गया, वह समाधि तक न पहुंच पायेगा। समाधि तक पहुंचना है। समाधि का अर्थ होता है- समाधान हो गया, अब कुछ प्रश्न ना रहा, न कोई जिज्ञासा रही, न कोई अनुभव करने की आकांक्षा रही, न कोई जिजीविषा रही- सब शांत हो गया। समाधि का अर्थ हैः सभी लहरें झील में शांत हो गई, कोई तरंग नहीं उठती, झील परिपूर्ण मौन है। इस समाधि की अवस्था में ही सत्य का, परमात्मा का, साइयां का मिलन है।
मन से जाना है ध्यान पर, ध्यान से जाना है समाधि पर।
ये तीन अवस्थायें है। तुम अभी मन पर खड़े हो। अगर तुमने मन को ही पकड़ लिया और समझा कि यही सब कुछ है- तुम रोओगे, दुखी होओगे, नरक भोगोगे। इसलिये तो सभी ज्ञानी पुरूष तुम्हें मन से ध्यान की तरफ खींचना चाहते हैं।
ध्यान मन की कोई क्रिया नहीं है, मन का शांत हो जाना है। मन का अभाव है ध्यान। जैसे एक कांटे हो हम दूसरे कांटे से निकाल लेते हैं, ऐसे ही मन के कांटे को ध्यान के कांटे से निकाल लेते हैं। लेकिन फिर दूसरे कांटे को भी संभाल कर रखने की जरूरत नहीं। वह भी बेकार हो गया। फिर दोनों कांटों को फेंक देते हैं।
बहुत नासमझ, अधिक नासमझ, मन से जकड़े हुये हैं। फिर तुम्हारे साधु-संन्यासी हैं, वे ध्यान से जकड़े हुये हैं। उन्होंने पहला कांटा तो छोड़ दिया, वह बाजार का कांटा तो छोड़ दिया, आश्रम का कांटा पकड़ गया। दुकान का कांटा छोड़ दिया, मंदिर का कांटा पकड़ गया। बही-खातों का कांटा छूट गया, गीता-कुरान-बाइबील का कांटा पकड़ गया। मन के कांटे से किसी तरह छुटकारा किया बामुश्किल, अब वह जिस कांटे से मन के कांटे को निकाला है, अब उसकी पूजा जारी है, अब उसको उन्होंने घाव में रख लिया है। वह उतना ही कांटा है। उसे धन्यवाद दो, उसे भी फेंक दो। जिस दिन मन और ध्यान दोनों ही फिंक जाते हैं, उस दिन समाधि।
समाधिस्थ व्यक्ति ध्यान करता नहीं। मन है न रहा तो अब ध्यान का क्या सवाल है? बीमारी ही न रही तो औषधि का क्या करेंगे? जिस दिन तुम्हारी बीमारी ठीक हो जाती है, तुम औषधि की शीशी को कचरे में फेंक आते हो। क्या करोगे औषधि का?
ध्यान औषधि है। और जब बीमारी और औषधि दोनों ही चली गई… क्योंकि कुछ पागल ऐसे हैं कि बीमारी चली जाये तो औषधि की बोतल छाती से लगाये घूम रहे हैं। यह एक नई बीमारी हो गई। अब वे कहते हैं, हम यह बोतल न छोड़ सकेंगे, क्योंकि इस बोतल ने बड़ा सहारा दिया।
माना की सहारा दिया, धन्यवाद दो और छुटकारा पाओ। अन्यथा तुमने बीमारी की जगह फिर कुछ पकड़ लिया। थोड़े दिन में यह बोतल ही बीमारी हो जायेगी। थोड़े दिन में ध्यान ही फिर तुम्हारा मन बन जायेगा। क्योंकि यह भी कांटा है, यह भी घाव पैदा करेगा।
इसलिये बुद्धपुरूषों ने कहा है, जब ध्यान का काम पूरा हो जाये, एक क्षण रूकना मत, ध्यान को फेंक देना। उस पर मोह मत करना। संसारी मन पर मोह करता है, साधक ध्यान का मोह करने लगता है। धार्मिक वही है जो दोनों को छोड़ देता है। तब समाधि है।
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