





आकाश हमारे अनुभव में एक दूसरी स्थिति है। सब कुछ आकाश में है। आकाश का अर्थ है, जिसमें सब कुछ है। इसलिये आकाश किसी में नहीं हो सकता। और अगर हम सोचते हों कि आकाश को भी होने के लिये किसी में होना पड़े, तो फिर हमें एक और महत आकाश की कल्पना करनी पड़े। और फिर हम मुश्किल में पड़ेंगे। फिर जिसको तार्किक कहते हैं, फिर हम अंतहीन नासमझी में पड़ जायेंगे। क्योंकि फिर वह जो महत आकाश है, वह किस में होगा? फिर इसका कोई अंत नहीं होगा। फिर और महत आकाश- फिर-फिर वही सवाल होगा।
नहीं, इसलिये आकाश में सब है और आकाश किसी में नहीं है। आकाश सबको घेरे हुये है और आकाश अनघिर है। आकाश का अर्थ है- जिसमें सब है और जो किसी में नहीं है। इसलिये आकाश के भीतर सब कुछ निर्मित होता रहता है, आकाश उससे बड़ा नहीं हो जाता। और आकाश के भीतर सब कुछ विसर्जित होता रहता है, आकाश उससे छोटा नहीं हो जाता। आकाश जैसा है वैसा है- जस का तस।
एक जगह हम एक ही मकान बना सकते हैं, उसी जगह दूसरा मकान न बन सकेगा, उसी जगह तीसरा तो बिलकुल नहीं बन सकता। क्यों? क्योंकि जो एक मकान हमने बनाया उसने आकाश को घेर लिया। अगर आकाश को उसने घेर लिया, तो आकाश किसी खास अर्थ में कम हो गया।
इसीलिये तो मकान हमें ऊपर उठाने पड़ रहे हैं। मकान इसीलिये ऊपर उठाने पड़ रहे हैं कि जमीन की सतह पर जो आकाश है वह कम पड़ता जा रहा है। जमीन के दाम बढ़ते चले जाते हैं, तो मकान ऊपर उठने शुरू हो जाते हैं। क्योंकि नीचे दाम बढ़ने लगते हैं, नीचे का आकाश महंगा होने लगा, भरने लगा, ज्यादा भरने लगा, अब वहां जगह कम रह गई, तो मकान को ऊपर उठाना पड़ता है।
आकाश भी भरता मालूम पड़ता है और जब भरता है, तो उसका अर्थ है कि उतनी जगह कम हो गई। उतना रिक्त स्थान कम हो गया। जिस जमीन पर हम बैठे हैं, इस जगह पर अब दूसरी जमीन पैदा नहीं हो सकती। माना की अनंत आकाश चारों तरफ शून्य की तरह फैला हुआ है, कोई कमी नहीं है, लेकिन इतनी जगह पर तो रूकावट हो गई। इतना आकाश तो कम हुआ, भर गया।
परमात्मा इतना भी नहीं भरता। सागर मैने कहा कि बहुत छोटा है- परमात्मा के हिसाब से। हमारे हिसाब से बहुत बड़ा है। गंगा और ब्रह्मपुत्र के हिसाब से बहुत बड़ा है। कोई अंतर नहीं पड़ता उनके गिरने से, फिर भी अंतर पड़ता है। नाप-तोल में नहीं आता, लेकिन अंतर पड़ता है। आकाश और भी बड़ा है, हमारे सागरों-महासागरों से बहुत बड़ा है। फिर भी, आकाश भी भर जाता मालूम होता है।
परमात्मा यानी अस्तित्व, जो है। सिर्फ है। इज़नेस होना जिसका गुण है। हम कुछ भी करें, उसके होने में कोई अंतर नहीं पड़ता।
परमात्मा का अर्थ हैः सारी चीजों के भीतर जो है- पन, वह जो इज़नेस, जो अस्तित्व है, होना है, वही है। कितनी ही चीजें बनती चली जायें, उस होने में कुछ जुड़ता नहीं। और कितनी ही चीजें मिटती चली जायें, उस होने में कुछ कम होता नहीं। वह उतना का ही उतना, वही का वही, अलिप्त और असंग, अस्पर्शित।
पानी पर भी हम रेखा खींचते हैं तो कुछ बनता है, मिट जाता है बनते ही। लेकिन परमात्मा पर इस सारे अस्तित्व से इतनी भी रेखा नहीं खिंचती। इतना भी नहीं बनता है।
इसलिये उपनिषद का यह वचन कहता है कि पूर्ण से, उस पूर्ण से यह पूर्ण निकला है। वह अज्ञात है, यह ज्ञात है। जो हमें दिखाई पड़ रहा है, वह उससे निकला, जो नहीं दिखाई पड़ रहा है। जिसे हम जानते हैं, वह उससे निकला, जिसे हम नहीं जानते हैं। जो हमारे अनुभव में आता है, वह उससे निकला, जो हमारे अनुभव में नहीं आता है।
इस सूत्र में दोनों बातें कही है, पूर्ण से पूर्ण निकल आता है, फिर भी पीछे पूर्ण ही शेष रहता है। पूर्ण में पूर्ण लीन हो जाता है, फिर भी पूर्ण, पूर्ण ही रहता है।
इस जगत में भगवान जो भी चमत्कार दिखाते हैं वह हर क्षण दिख रहा है। इस जगत में कोई चमत्कार नहीं होते और या फिर हर क्षण जो हो रहा है वह सब चमत्कार है, सब मिरेकल है। जब भी एक बीज से वृक्ष पैदा होता है, तब चमत्कार होता है। और जब भी एक मां से बेटा पैदा होता है, तब चमत्कार होता है।
अगर इतना बड़ा संसार बनाकर परमात्मा पीछे गृहस्थ नहीं बन जाता, तो एक छोटा सा घर बनाकर एक आदमी गृहस्थ बन जाये, पागलपन है! इतने विराट संसार के जाल को खड़ा करके अगर परमात्मा वैसे का वैसा रह जाता है जैसा था, तो आप एक दुकान छोटी सी चलाकर और नष्ट हो जाते हैं? कहीं कुछ भूल हो रही है। कहीं अनजाने में आप अपने कर्मों के साथ अपने को एक मान रहे हैं, तादात्मय कर रहे हैं। आप जो कर रहें है, समझ रहें है मैं कर रहा हूं, बस कठिनाई में पड़ रहे हैं। जिस दिन आप इतना जान लेंगे कि जो हो रहा है वह हो रहा है, मैं नहीं कर रहा हूं, उसी दिन आप संन्यासी हो जाते हैं।
गृहस्थ मैं उसे कहता हूं, जो सोचता है, मैं कर रहा हूं। संन्यासी मैं उसे कहता हूं, जो कहता है, हो रहा है। कहता ही नहीं, क्योंकि कहने से क्या होगा? जानता है। जानता ही नहीं, क्योंकि अकेले जानने से क्या होगा?
एक छोटा सा काम करके देखें और पूरे वक्त जानते रहें कि हो रहा है, मैं नहीं कर रहा हूं। कोई भी काम करके देखें। खाना खाकर देखें। रास्ते पर चलकर देखें। किसी पर क्रोध करके देखें। और जानें कि हो रहा है। और पीछे खड़े देखते रहें कि हो रहा है। और तब आपको इस सूत्र का राज मिल जायेगा। तब आप पायेंगे कि बाहर कुछ हो रहा है और आप पीछे अछूते वही के वहीं हैं जो करने के पहले थे, और जो करने के बाद भी रह जायेंगे। तब बीच की घटना सपने की जैसी आयेगी और खो जायेगी।
संसार परमात्मा के लिये एक स्वप्न से ज्यादा नहीं है। आपके लिये भी संसार एक स्वप्न हो जाये तो आप भी परमात्मा से भिन्न नहीं रह जाते। जब तक आपके लिये संसार एक स्वप्न से ज्यादा है, तब तक आप परमात्मा से कम होंगे। जिस दिन आपको भी संसार एक स्वप्न जैसा हो जायेगा, उस दिन आप परमात्मा हैं। उस दिन आप कह सकते हैं, अहं ब्रह्मास्मि! मैं ब्रह्म हूं।
इस सूत्र में यह कहा गया है कि वह पूर्ण आ जाता है निकलकर पूरा का पूरा। ध्यान रहे, पीछे पूरा रह जाता है, यह तो कहा ही है, साथ में यह भी कहा है कि वह पूरा का पूरा बाहर आ जाता है। इसका क्या मतलब हुआ? इसका यह मतलब हुआ कि एक-एक व्यक्ति भी पूरा का पूरा परमात्मा है। एक-एक व्यक्ति भी, एक-एक अणु भी पूरा का पूरा परमात्मा है। ऐसा नहीं कि अणु आंशिक परमात्मा है- पूरा का पूरा।
इसलिये ऐसा नहीं है कि आप परमात्मा के एक हिस्से हैं। जो ऐसा कहता है, वह गलत कहता है। जो ऐसा कहता है कि आप एक अंश है परमात्मा के, वह गलत कहता है। मैं आपसे कहता हूं और उपनिषद् आपसे यह कहते हैं, और जिन्होंने भी कभी जाना है वह यही कहते हैं कि तुम पूरे के पूरे परमात्मा हो।
परमात्मा की पूर्णता अनंत पूर्णता है। अनंत पूर्णता का अर्थ है कि उसमें से अनंत पूर्ण प्रगट हो सकते हैं। एक-एक व्यक्ति पूरा का पूरा परमात्मा है। एक-एक अणु पूरा का पूरा विराट है। पूर्ण में और उसमें रत्ती मात्र का भी कोई फर्क नहीं है। अगर फर्क है तो फिर कभी पूरा न हो सकेगा। फिर पूरा करने का कोई उपाय नहीं। और अगर कभी पूरा हो जाता है तो वह अभी ही पूरा है, सिर्फ हमें पता नहीं है। सिर्फ हमारे बोध की कमी है।
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