





यदि साधक शिष्यता के भाव से पूरित है, और अपने जीवन में गुरू के ब्रह्मा स्वरूप की साधना सम्पन्न नहीं करता, तो वह एक बहुत बड़े सौभाग्य से वंचित रहता है, क्योंकि जीवन निर्माण कोई एक क्षण की क्रिया नहीं है। जीवन का प्रत्येक क्षण ही नूतन हो, कुछ नवीनता लिये हुये तभी सार्थकता है। इस साधना के बाद सद्गुरू अपने शिष्य का हर क्षण किसी न किसी रूप में नव निर्माण ही कर रहे होते हैं। उसके एक एक कुसंस्कार समाप्त कर नवीन संस्कारों को जन्म देते रहते हैं, यही इस साधना का मूल है। यह गुरू के सृजनात्मक रूप की साधना है, जिसमें वे पुरूष से पुरूषोत्तम बनाने की क्रिया करते है, नर से नारायण बनाने की क्रिया करते हैं।
इस साधना के बाद साधक को फिर कहीं भटकना नहीं पड़ता, गुरू की चेतना निरन्तर उसके अन्दर शुभ विचारों का उदय करती रहती है। अनेक विकल्पों में से श्रेष्ठ विकल्प चुनने का या अपने लक्ष्य में सफल होने की युक्ति एक मार्गदर्शक के रूप में सद्गुरूदेव आंतरिक रूप से बताते चलते हैं। और गुरू के इन आंतरिक निर्देषों द्वारा साधक के जीवन का निर्माण होता चला जाता है, और वह आध्यात्मिक व भौतिक दोनों ही पक्षों में पूर्णता प्राप्त करने की स्थिति में आ जाता है। इतिहास साक्षी है कि एक डाकू गुरू के अनुग्रह और इस साधना द्वारा ही इतनी ऊंचाई पर पहुँच गया कि उसके हाथ से एक ऐसे अद्वितीय ग्रंथ-वाल्मीकि रामायण की रचना हुई, जो कि भारतीय जनमानस के लिये पवित्रतम ग्रंथ है।
यह साधना किसी भी अमावस्या से प्रारम्भ कर अगली पूर्णिमा तक पूर्ण की जा सकती है। यह 16 दिन की साधना है। अमावस्या की रात्रि से जिस प्रकार चन्द्रमा अपनी एक कला में वृद्धि करता हुआ पूर्णिमा के दिन पूर्ण चन्द्र का आकार ले लेता है, उसी प्रकार इस साधना की तेजस्विता से साधक के अन्दर भी पूर्ण गुरूत्व का स्थापन होता जाता है। ब्रह्मा को आदि गुरू कहा गया है, और उन्हीं के क्रम में ब्रह्माण्ड के सोलह और गुरू कहे गये है, और इस साधना द्वारा उन सभी के तेज का स्थापन साधक के शरीर में होता है। यही सोलह दिन की साधना का रहस्य भी है।
साधना विधि
इस साधना को 05 नवम्बर अथवा किसी भी अमावस्या से प्रारम्भ करें। प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर अपने सामने चौकी पर एक सफेद आसन बिछा लें। सबसे पहले हाथ जोड़ कर सद्गुरूदेव के ब्रह्मा स्वरूप का ध्यान करें-
देवनाथं गुरूर्देवं देषिकस्वात्म नायकं।
प्रणमामि निखिलानन्दं ब्रह्मभावेन भूषितम्।।
अंगन्यास
गुरू साधना में प्रयुक्त होने के पूर्व अब गुरू मंत्र का अपने शरीर के समस्त अंगों में स्थापन करें। इसके लिये निम्न संदर्भ का उच्चारण करते हुये निर्दिष्ट अंगों को दाहिने हाथ से स्पर्श करें-
ऊँ ऊँ नमः। (सिर)
ऊँ पं नमः। (दोनों नेत्र)
ऊँ रं नमः। (ललाट)
ऊँ मं नमः। (कण्ठ)
ऊँ तं नमः। (दोनों भौहें)
ऊँ त्वां नमः। (दोनों कान)
ऊँ यं नमः। (दोनों गाल)
ऊँ नां नमः। (मुंह)
ऊँ रां नमः। (दांत)
ऊँ यं नमः। (जीभ)
ऊँ णां नमः। (दोनों कन्धे)
ऊँ गुं नमः। (हृदय)
ऊँ रूं नमः। (नाभि)
ऊँ भ्यों नमः। (दोनों पैर)
ऊँ नं नमः। (पीठ)
ऊँ मं नमः। (सभी अंग)
इसके बाद गुरू मंत्र की एक माला जप करें।
षोडष गुरू पूजन
इसके बाद अपने सामने एक गोल घेरे में जौ (अथवा तिल) की 16 ढेरियां बना लें। फिर ‘16 ब्रह्मा बीज’ (ये बीज षोडष गुरूओं के स्थापन मंत्रों से सिद्ध होने चाहिये) को इन ढेरियों पर स्थापित करें। तत्पश्चात् निम्न मंत्र बोलकर (बाएं से दाएं क्रम में ) इन बीजों का कुंकुंम, अक्षत से पूजन करें-
प्रथम ब्रह्माय गुरूं स्थापयामि नमः।
द्वितीयं विश्वामित्रं गुरूं स्थापयामि नमः।
तृतीय चैतन्यं गुरूं स्थापयामि नमः।
चतुर्थं पूर्णानुष्ठानं गुरूं स्थापयामि नमः।
पंचमं कपिंजलं गुरू स्थापयामि नमः।
षष्ठं वशिष्ठं गुरू स्थापयामि नमः।
सप्तं आत्रेयं गुरूं स्थापयामि नमः।
अष्टमं महादीर्घाय गुरूं स्थापयामि नमः।
नवमं अग्निमूर्धानं गुरूं स्थापयामि नमः।
दशमं दीर्घोवस्थानं गुरूं स्थापयामि नमः।
एकादशं दीर्घोवस्यां गुरूं स्थापयामि नमः।
द्वादशं दीर्घस्तां गुरूं स्थापयामि नमः।
त्रयोदशं पूर्णं गुरूं स्थापयामि नमः।
चतुर्दशं सच्चिदानन्दं गुरूं स्थापयामि नमः।
पंचदशं दुर्गत्वं गुरूं स्थापयामि नमः।
षोडषं निखिलेश्वरानन्दं गुरूं स्थापयामि नमः।
इसके बाद इन ढेरियों के मध्य के रिक्त स्थान में ‘गुरू ब्रह्मा सिद्धि यंत्र’ स्थापित करें। यंत्र पर एक गुलाब का पुष्प अर्पित करें। धूप, दीप, कुंकुंम आदि से यंत्र का पूजन करें। इसके बाद निम्न मंत्र की 16 दिन तक ‘विरंचि सिद्धि माला’ से नित्य इस मंत्र की 16 माला जप करें।
गुरू ब्रह्मा स्वरूप यंत्र
।। ऊँ ब्रं ब्रह्मात्व सिद्धिं गुं गुरवे नमः।
16वें दिन अर्थात् पूर्णिमा के दिन उपरोक्त मंत्र के अंत में स्वाहा शब्द जोड़ते हुये घी, जौ और तिल से अग्नि में 107 आहुतियां दें। इस प्रकार यह साधना पूर्ण हो जाती है। साधना समाप्ति पर सामग्री को विसर्जित करने की आवश्यकता नहीं है। इसी सामग्री से यदि साधक अगले एक वर्ष में ही दो बार पुनः इसी साधना क्रम को और दोहरा ले, तो निश्चय ही इस साधना की अद्वितीयता उसके सामने सिद्धि के रूप में प्रकट होती है। इस तरह यही साधना एक बार अथवा तीन बार सम्पन्न करने के उपरान्त साधक समस्त सामग्री को जल में विसर्जित कर सकते है।
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