





जितने भी साधक हुये है, उन्होंने किसी न किसी रूप में दुर्गा की साधना सम्पन्न की है और उसके बाद ही वे सिद्ध पुरूष बन सके, उनमें तेजस्विता आ सकी। ‘रामकृष्णदेव परमहंस’, जिन्होंने मां काली को स्वयं में आत्मसात् कर लिया था, वे काली शक्तिमय बन गये।
तंत्र शास्त्र तो सम्पूर्ण रूप से शक्ति पर आधारित है, श्रेष्ठ साधनायें, उपलब्धियां उस पराशक्ति के द्वारा ही तो प्राप्त होनी संभव है। उच्चकोटि के साधनात्मक ग्रंथों का निष्कर्ष यही है, कि विभिन्न साधनाओं और यौगिक क्रियाओं के माध्यम से अपनी शक्ति को जाग्रत कर, जीवन की श्रेष्ठता और अद्वितीयता प्राप्त की जा सकती है।
तांत्रिक ग्रंथों में शक्ति उपासना हेतु कुछ विशेष क्षणों का वर्णन प्राप्त होता है, जिनमें इस प्रकार की साधनायें सम्पन्न करने पर साधक को शीघ्र ही सफलता प्राप्त होती है।
ऐसे क्षणों में नवरात्रि के दिनों का अत्यन्त महत्त्व है, जब सम्पूर्ण वातावरण भगवती जगदम्बा की चैतन्यता से आप्लावित होता है और वे प्रत्येक साधक पर सहज ही अपनी कृपा दृष्टि करने को आतुर होती हैं।
ज्ञानी साधक, योगी, यति निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं, कि प्रत्येक श्रेष्ठ अवसर पर वह भगवती दुर्गा का साक्षात्कार करें परन्तु जो साधना के आयामों से अपरिचत है, साधना के गूढ़ रहस्यों से अनभिज्ञ हैं, उनके लिये तो गुरू का सानिध्य आवश्यक हो ही जाता है। गुरू का सानिध्य प्राप्त होने के उपरान्त ही मां भगवती दुर्गा के साक्षात्कार की प्रक्रिया प्रारम्भ हो पाती है।
गुरू ही एक मात्र कड़ी है, जो साधक को उसके लक्ष्य तक पहुंचाने का हेतु बनती है। साधक के लिये भी यह अनिवार्य है, कि वह गुरू पर विश्वास करें, निरन्तर सम्पर्क बनाये रखे और उस ऊर्जा को प्राप्त कर सके, जिसके माध्यम से सफलता उसके कदम चूमे।
जिस प्रकार मां अपने शिशु की प्रत्येक आवश्यकता को पूर्ण करने के लिये तत्पर रहती है, उसी प्रकार भगवती दुर्गा अपने साधक की प्रत्येक कामना को पूर्ण करती ही है। जिसे उस जगत जननी की कृपा प्राप्त हो गई, उसे फिर किस बात की चिन्ता।
ऐश्वर्यमयी, परमशक्ति स्वरूपा भगवती के आश्रय में जब साधक प्रस्तुत हो जाता है तो फिर वह श्रीहीन, शक्तिहीन रह ही नहीं सकता। उसको धन-धान्य, समृद्धि, यश, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य, बल और तेजस्विता आदि सहज ही प्राप्त हो जाता है।
दुर्गा का यह स्वरूप विशेष प्रबल तथा ज्वलनशील दाहक माना गया है, जो साधक राज्य बाधा, शत्रु-बाधा, मुकदमे इत्यादि से विशेष दुःखी हो, चिन्ताओं का भार बढ़ता ही जा रहा हो, तो यह साधना अवश्य करनी चाहिये।
देवी दुर्गा कल्याणी स्वरूप है, जिनके तीव्र प्रभाव से दुष्टात्माओं का नाश हो जाता है और प्रबल से प्रबल शत्रु भी वश में होकर दास स्वरूप बन जाता है।
साधना विधि
पूर्ण तांत्रोक्त साधना है और गुप्त नवरात्रि में ही किसी एक दिन सम्पन्न की जाती है, (गुप्त नवरात्रि 19 जनवरी से 27 जनवरी तक) इसके लिये विशेष सामग्री तथा विशेष अनुष्ठान की आवश्यकता रहती है, सामग्री सहित सभी व्यवस्था पहले से कर लेनी चाहिये, साधना के बीच में उठने का विधान वर्जित है।
साधना सायंकाल के पश्चात् स्नान कर शुद्ध लाल वस्त्र धारण करें, अपने पूजा स्थान में अथवा एकान्त कमरे में यह साधना सम्पन्न कर सकते है, आसन ऊनी कम्बल अथवा मृगछाल हो सकता है, अपने सामने देवी का विकराल स्वरूप का चित्र स्थापित कर सिन्दूर से चित्र पर तिलक कर स्वयं भी तिलक लगायें और आसन ग्रहण करें।
अपने सामने राज राजेश्वरी यन्त्र शुद्ध रूप से धो कर सिन्दूर लगा कर काले तिलों की ढ़ेरी पर स्थापित करें, एक ओर एक कलश स्थापित कर उस पर नारियल रखे, सर्व प्रथम कलश पूजन सम्पन्न कर भैरव का ध्यान कर मौली बांध कर एक सुपारी भैरव स्वरूप स्थापित करें, अब एक ओर धूप दूसरी ओर दीपक जला कर एक कटोरे में देवी के सामने खीर का प्रसाद रखें, अब इस साधना में साधक वीर मुद्रा में बैठ कर पूजन कार्य प्रारम्भ करें, साधक का मुंह दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिये, सर्वप्रथम देवी से प्रार्थना कर पूजन की सफलता प्राप्ति का ध्यान करें। और अपने सामने यन्त्र पर तांत्रोक्त फल स्थापित करें,
ध्यान मंत्र
ऊँ ह्रः ऊँ सौं ऊँ ह्रौं ऊँ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीजयजय
राज राजेश्वरी दुर्गायै मम सकल मनोरथं
देहि सर्वोपद्रवं निवारय निवारय नमो नमः।।
उक्त ध्यान मंत्र को बोलते हुये काले तिल और सरसों सिन्दूर मिलाकर तांत्रोक्त फल पर चढ़ायें, जब यह क्रिया पूर्ण हो जाय तो अपने ललाट पर चंदन से त्रिपुण्ड तिलक बनायें।
राज राजेश्वरी मंत्र
।। ऊँ ऐं ह्रीं राज राजेश्वरी क्लीं ह्रीं ऐं फट्।।
(Om Aiem Hreem Raaj Rajeshwari Kleem Hreem Aiem Phat)
दुर्गति नाशिनी माला से 11 माला जप कर पूजन कार्य सम्पन्न करें तथा मन्त्र जप मौन रूप से नहीं अपितु जोर-जोर से बोल कर सम्पन्न करना चाहिये। सब साधना पूर्ण हो जाय तो प्रार्थना और भाव व्यक्त कर आरती सम्पन्न करें। सामने रखे हुये खीर के प्रसाद को ग्रहण करना चाहिये।
तांत्रोक्त फल, सरसों तथा तिल को दूसरे दिन किसी एकान्त स्थान पर जाकर गाड़ देना चाहिये। तथा यंत्र को पूजन स्थान में स्थापित रहने दें।
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