





तुम किसी व्यक्ति को प्रेम करते हो, यह तो एक बात हुई और तुम किसी व्यक्ति को घृणा करते हो, कोई तुम्हारा दुश्मन है, तो दुश्मन का जो दुश्मन है उससे भी तुम जतलाते हो, यह बड़ी दूसरी बात हुई। किसी से प्रेम होना एक बात है, दुश्मन के दुश्मन से प्रेम दिखलाना बिलकुल दूसरी बात है। पहली बात तो धर्म की है, दूसरी राजनीति की है। राजनीति का सूत्र ही यह है कि दुश्मन का दुश्मन अपना मित्र। उससे कोई मैत्री नहीं है, उससे कुल इतना ही संबंध है कि वह दुश्मन का दुश्मन है।
अगर तुम अपने गुरू को प्रेम करते हो, तब तो तुम्हें किसी और गुरू से तुलना करने का कोई सवाल नहीं। लेकिन तुम्हारे जीवन में प्रेम कम महत्त्वपूर्ण है, घृणा ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। वस्तुतः तुम अपने गुरू को प्रेम कम करते हो, किसी और के गुरू को घृणा ज्यादा करते हो। उस घृणा के विपरीत ही तुम इस व्यक्ति के प्रेम में पड़ते हो। तुमने महावीर को नहीं चाहा है, तुमने कृष्ण को न चाहा होगा, इसलिये तुम महावीर को पकड़े हो, क्योंकि यह दृष्टि विपरीत मालूम होती है। तुमने कृष्ण को भी नहीं चाहा है, तुमने बुद्ध को न चाहा होगा, इसलिये तुम कृष्ण को पकड़े हो, क्योंकि बुद्ध की दृष्टि से कृष्ण विपरीत जाते मालूम पड़ते हैं।
तुम्हारे जीवन की धारा प्रेम से आंदोलित नहीं है, घृणा से आंदोलित है। इसलिये जब भी तुम्हारे जीवन में घृणा को प्रकट करने का मौका होता है, तब तुम्हारे उत्साह की कमी नहीं होती। अगर कहीं कोई शुभ घटना घटती हो, तो तुम ध्यान ही नहीं देते। कहीं कोई अशुभ घटना घटती हो, तो तुम भीड़ बांध कर वहां खड़े हो जाते हो।
तुम अस्पताल जा रहे हो, पत्नी बीमार पड़ी है, बच्चा भूखा है, दवा लानी है, भोजन कमाना है, लेकिन अगर रास्ते पर दो लोग लड़ रहे हों, तो फिर तुम्हारे पैर नहीं बढ़ते। तुम खड़े होकर देख ही लेना चाहोगे। और अगर ऐसा हो जाये कि शोरगुल तो बहुत मचे, लड़ाई-झगड़ा हो न, गाली-गलौज बहुत हो और लोग बीच-बचाव कर दें, या लोग अलग हटा दें, तो तुम बड़े उदास मन से आगे बढ़ते हो कि कुछ हुआ ही नहीं। मन में बात छूट जाती है, जैसे कुछ था-छुरा चलता, खून बहता, तो जीवन में थोड़ी गति आ जाती।
युद्ध के समय इसलिये लोग बहुत ज्यादा ताजे, निखरे मालूम पड़ते हैं। जो कभी ब्रह्ममुहुर्त में नहीं उठते, वे भी ब्रह्ममुहुर्त में उठ कर अखबार खोजते हैं। जिनके जीवन में कुछ भी नहीं है, वे भी कहीं लाखों लोग मर रहे हैं, मारे जा रहे हैं, इससे आंदोलन हो जाते हैं। हर दस वर्षो में, मनस्विद कहते हैं, पृथ्वी पर एक बड़े युद्ध की जरूरत पड़ जाती है। क्योंकि लोग घृणा से जीते हैं। और अगर घृणा के निकलने का उपाय न हो तो लोगों के जीवन से रस खा जायेगा।
अखबार तुम पढ़ते हो, तुमने कभी खयाल किया, हत्या हो, चोरी हो, किसी की स्त्री भगाई गई हो, कहीं दंगा हो जाये, कहीं दुर्घटना हो जाये-तत्क्षण तुम्हारी रीढ़ झुक जाती है, पढ़ने में आंखे एकाग्र हो जाती हैं। रामनाम पर इतनीं एकाग्र नहीं होती, जैसे अखबार में हुई दुर्घटना पर। कुछ भी गलत पर मन अटक जाता है।
अखबार में खबर इकट्ठी करने वाले लोग शुभ खबरों को इकट्ठा नहीं करते। क्योंकि उन्हें कौन पढ़ेगा? उनका कोई मूल्य ही नहीं। अगर कहीं किसी ने किसी गिरते आदमी को सहारा दिया हो, इसको कौन पढ़ेगा? इसमें मतलब भी क्या है? इसमें रस किसको है? किसी ने किसी बीमार के पैर दबाए हो, यह कोई खबर है! इसमें कोई उत्तेजना नहीं है। यह बात फीकी लगती है। अगर कभी आ भी जाये तो किसी कोने में कोई छोटा सा स्थान घेरती है। धर्म के लिये तो अखबार में कोई जगह ही नहीं रह गई है, केवल अधर्म के लिये जगह है। राजनीतिज्ञ होते है प्रथम पृष्ठों पर बड़ी सुर्खियों में क्योंकि उनके आस-पास सब तरह का उपद्रव है। उनके आस-पास सब तरह का गलत चल रहा है।
गलत पर हमारी दृष्टि है, घृणा में हमारा रस है। मित्र में हमें बहुत रूझान नहीं है, शत्रु में है। यह जीवन की बड़ी उलटी दिशा है, जैसे गंगा गंगोत्री की तरफ बहती हो, सागर की तरफ नहीं।
निश्चित ही तुम बहुत दुःख पाते हो, बहुत पीड़ा पाते हो इसके कारण। लेकिन यही तुम्हारा ढंग है।
तुम्हारे रस बड़े रूग्ण हैं। तुम जब कहते हो, मैं कृष्ण के पक्ष में हूं, तो तुम जरा गौर से सोचनाः तुम कृष्ण के पक्ष में हो? क्योंकि पक्ष में होते तो तुम कृष्णमय हो जाते। तुम रूपांतरित हो गये होते। तुम महावीर के विपक्ष में होओगे, बुद्ध के विपक्ष में होओगे। क्योंकि इन सबके विपक्ष में होने के लिये किसी के पक्ष में होना जरूरी है, इसलिये तुम कृष्ण के पक्ष में हो! तुम्हारा पक्ष तुम्हारे प्रेम से नहीं आता, तुम्हारे घृणा के जहर से आता है।
इसलिये तो दुनिया में इतने धार्मिक लोग दिखाई पड़ते हैं और धर्म बिलकुल दिखाई नहीं पड़ता। आदमी ही खोजना मुश्किल है जो धार्मिक लोग दिखाई पड़ते हैं और धर्म बिलकुल दिखाई नहीं पड़ता। आदमी ही खोजना मुश्किल है जो धार्मिक न हो। सभी आदमी धार्मिक है। कोई हिंदू है, कोई मुसलमान है, कोई ईसाई है। पर धार्मिक कहां है? धार्मिक होना तो एक महाक्रांति है। वह तो जीवन का आमूल रूपांतरण है। वह तो जड़ों से स्वयं को बदल डालना है।
तो मैं तुमसे कहता हूं, सयाने तो सभी एकमत हैं। महावीर कृष्ण के विरोध में नहीं हैं, कृष्ण महावीर के विरोध में नहीं हैं। और अगर कभी तुम्हें ऐसा भी लगता हो कि विरोध में मालूम पड़ते है, तो पहले तो तुम अपनी बुद्धि को समझने की कोशिश करना। क्योंकि जितना ज्ञान का शिखर ऊपर उठता है, उतनी ही वाणी और शब्दों के अर्थ रूपांतरित हो जाते हैं। शब्द का अर्थ वहीं होता है जो अर्थ तुम देते हो।
महावीर ने कहा है, आत्मा ही एकमात्र सत्य है। और बुद्ध ने कहा है, आत्मा से असत्य और कुछ भी नहीं। स्वभावतः विरोधी हैं। इसको देखने में आंख की भी जरूरत नहीं, अंधा भी पहचान लेगा, कि एक कहता है, आत्मा ही सत्य है, आत्मा को पा लेना ही सब कुछ है, और एक कहता है, आत्मा ही असत्य है, इससे मुक्त हो जाना ही मुक्ति है।
लेकिन अगर दोनों सयाने हैं, तो दोनों के शब्दों के अर्थ ठीक से समझने पड़ेंगे। महावीर जिसको आत्मा कहते हैं, बुद्ध उसको आत्मा कहते ही नहीं। बुद्ध हमेशा अहंकार को ही आत्मा कहते है, आपके भाव को आत्मा कहते हैं। आत्मा में वह भी अर्थ है। आत्मा का अर्थ हैः मैं आत्मभाव, अत्ता। तो बुद्ध ने जो शब्द प्रयोग किया है-आत्मा, वह अहंकार के लिये ही किया है। क्योंकि अहंकार के मिट जाने पर, बुद्ध कहते हैं, निर्वाण उपलब्ध होगा। तुम तो रहोगे, मैं भाव न रहेगा।
महावीर ने आत्मा का अर्थ अहंकार के अर्थो में नहीं किया। वह अर्थ भी आत्मा में है। महावीर ने अहंकार का अलग उपयोग किया है। महावीर भी कहते है, जब अहंकार मिट जायेगा तभी तुम आत्मा को उपलब्ध होओगे।
थोड़ा सा विश्लेषण करों। क्योंकि जब दो सयाने विपरीत बात कहते मालूम पड़े, तो तुम जल्दी मत करना। कहीं न कहीं उनकी बातों के भीतर एक ही अर्थ छिपा ही होगा। शब्द होंगे अलग, लेकिन सयाने दो मत नहीं हो सकते।
और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि सयाने एक-दूसरे के विरोध में भी खड़े होते हैं। और तब खेल बहुत गहरा है। उसको समझने के लिये बड़ी गहरी समझ चाहिये।
मैंने सुना है, एक गांव में ऐसा हुआ कि दो हलवाइयों में झगड़ा हो गया। खानदानी हलवाई थे। कोई ऐसे आज के ही हलवाई न थे। जन्मों-जन्मों से सिर्फ मिठाई ही बनाई थी। झगड़ा भी हो गया तो भी पत्थर उठा कर फेंकने की तो आदत ही न थी, स्वभाव ही न था, वह तो खून में न थी बात, तो लड्डू उठा-उठा कर एक-दूसरे की तरफ फेंकने लगे-आमने-सामने दुकान थी। सारा गांव इकट्ठा हो गया। और गांव ने बहुत आनंद मनाया, क्योंकि लड्डू बीच में मिले, गिरे, लोगों ने लूटे। लोगों ने हलवाइयों से कहा कि तुम रोज ही लड़ो तो अच्छा। ऐसी लड़ाई तो कभी देखी नहीं। यह तो आनंद हो गया। यह तो दीवाली आ गई गांव में। सारा गावं इकट्ठा हो गया।
जब महावीर और बुद्ध में कोई विरोध भी होता है तो दो हलवाइयों की लड़ाई है। पत्थर तो वे फेंक नहीं सकते। अगर पत्थर तुम्हें दिखता हो तो तुम्हारी आंख की ही कोई भ्रांति है। वह तुम्हारी नासमझी होगी। वे लड्डू ही फेंक सकते हैं। मिठास उनका स्वभाव है। मिठास उनके खून में हैं, उनकी श्वास में है।
लेकिन हो सकता है तुम्हें समझ में न आये। तुम अपनी नासमझी को सयानों पर मत थोपना। तुम सयानों को तभी पहचान पाओगे जब तुम भी सयाने हो जाओगे, और कोई उपाय नहीं है। इसलिये तुम फिक्र छोड़ दो कि सयाने एकमत है या नहीं। तुम सयाने हो जाओ, अचानक तुम्हें दिखाई पड़ेगा-वे सभी एकमत हों।
सयाना होने का अर्थ है, शिखर पर पहुंच जाना। जो रास्ते पहाड़ के चारों तरफ से आते थे, अलग-अलग दिखाई पड़ते थे, वे शिखर पर आकर सब मिल गये हैं। नीचे पहाड़ के खड़े हुए, तलहटी में भटके हुये, अंधेरे में डूबे हुये लोगों को यह मानना असंभव है कि सभी रास्ते शिखर पर पहुंच जायेंगे। क्योंकि कोई रास्ता पूरब की तरफ जा रहा है, कोई पश्चिम की तरफ जा रहा है। दोनों विपरीत मालूम पड़ते है, ये एक ही जगह कैसे पहुंच जायेंगे? लेकिन शिखर एक है, सभी रास्ते एक ही जगह पहुंच जायेंगे।
रास्ते भिन्न हो सकते हैं, शब्द भिन्न हो सकते है, अभिव्यक्ति अलग-अलग हो सकती है- हो सकती है कहना ठीक नहीं, होगी ही। क्योंकि जब बुद्ध बोलेंगे तो अपने ढंग से बोलेंगे। महावीर बोलेंगे तो अपने ढंग से बोलेंगे। कठिनाई तो तब आती है जब तुम जल्दी से अर्थ कर लेते हो, यह बिना ही सोचे कि तुम्हारी दृष्टि का अभी इतना विस्तार नहीं, इतनी ऊंचाई नहीं, जहां कि विपरीत को तुम मिलता हुआ देख सको।
और तुम पर दया करके भी सयाने एक-दूसरे के विपरीत बोले हैं। और तो कोई कारण नहीं है। तुम पर या करके भी, तुम्हारे प्रति महाकरूणा से भी एक-दूसरे के विपरीत बोले हैं, एक-दूसरे के विपरीत हैं नहीं। स्थिति ऐसी है कि अगर महावीर तुमसे कहें कि सभी ठीक हैं, जैसा कि महावीर ने कहा भी। इसलिये महावीर को बहुत अनुयायी न मिल सके। महावीर ने बड़ी चेष्टा की कि वे कुछ भी ऐसी बात न कहें जो गलत हो। तो महावीर से तुम पूछो, ईश्वर है? तो महावीर सात उत्तर देते हैं। क्योंकि सयानों ने सात उत्तर दिये हैं अब तक। उन्होंने सभी सयानों के उत्तर दोहराए, क्योंकि किसी सयाने से विरोध न हो जाये। अविरोध की भावना रखी। अहिंसा उनकी धारणा थी, दृष्टि थी, जीवन-दर्शन था। तो जो भी सयानों ने कहा है, उससे ज्यादा वक्तव्य का उपाय नहीं है। अगर तुम महावीर से पूछो, ईश्वर है, तो महावीर कहते हैं। यह एक वक्तव्य है। महावीर कहते हैं, यह पूरी बात नहीं है। क्योंकि ऐसे भी सयाने हैं, जो कहते हैं, है भी और नहीं भी है। यह भी ईश्वर के संबंध में है। और ऐसे भी सयाने हैं, जो कहते हैं, है भी नहीं, नहीं भी नहीं। यह भी ईश्वर के संबंध में है।
ऐसे सात वक्तव्य महावीर देते हैं। तो महावीर का तर्क सप्तभंगी कहलाता है। उन्होंने सारे सयानों के जितने वक्तव्य हो सकते हैं, वे सब संगृहीत कर दिये। और सात से ज्यादा नहीं हो सकते। क्योंकि उनमें सभी स्थितियां आ गई-होने की, न होने की, दोनों के जोड़ की, दोनों के विरोध की, होने की-दोनों के जोड़ की, होने की-दोनों के तोड़ की, होने की- दोनों के न जोड़ की न तोड़ की। सात स्थितियां, सारा गणित आ गया।
लेकिन महावीर ज्यादा अनुयायी न पा सके। क्योंकि जो आदमी कहे सभी ठीक है, उससे तुम्हारे जीवन में धारणा नहीं बनती। तुम और बिगूचन में पड़ जाते हो। तुम्हारे जीवन में कोई स्पष्ट रूप खड़ा नहीं होता- कि हम मानें क्या? तुम मान्यता खोजने आये हो, धारणा खोजने आये हो। और यह आदमी कहता है, सब ठीक है। मैं जो कहता हूं वह भी ठीक है, मेरे विरोधी जो कहते हैं वह भी ठीक है। तो तुम्हारे सामने सवाल यह है कि तुम चुनो कैसे?
तुम चौराहे पर खड़े हो। तुम पूछते हो, कौन सा रास्ता नदी की तरफ जाता है? महावीर कहते है, जो बाएं तरफ जाता है वह भी जाता है, जो दाएं तरफ जाता है वह भी जाता है, जो उत्तर जाता है वह भी, दक्षिण जाता है वह भी, पूरब, पश्चिम, सब रास्ते उसी तरफ जाते हैं।
तुम इस आदमी की न सुनोगे। तुम कहोगे यह आदमी पागल है। तुम किसी आदमी की तलाश में हो जो तुम्हें ठीक-ठीक बता दे कि कौन सा रास्ता नदी की तरफ जाता है। तुम्हें नदी पहुंचाना है। यह आदमी होश में नहीं मालूम पड़ता। सभी रास्ते कहीं एक तरफ गये हैं!
हो सकता है नदीं पहुंच कर तुम्हें भी पता चले कि वह आदमी पागल न था, ठीक था। लेकिन उसको मान कर तुम चलोगे कैसे? क्योंकि वह चारों रास्ते ठीक कह रहा है। वह तुम्हारे लिये चुनाव का मौका ही नहीं छोड़ रहा है।
तुम कोई आदमी चाहते हो जो तुमसे कहे कि बाएं का रास्ता नदी पहुंचता है, बाकी तीन से सावधान रहना! इस आदमी से तुम्हारे जीवन में कृत्य पैदा होता है। तुम कुछ कर सकते हो, कोई उपाय आता है। कहीं जाने की सुविधा बनती है, चुनाव की सुविधा बनती है। अब तुम सोच सकते हो कि जाना या नहीं जाना! तुम और दो-चार से पूछ सकते हो। लेकिन निर्णय के लिये कुछ आसार दिखाई पड़ने शुरू होते हैं अंततः तुम भी यही पाओगे कि जिसे तुमने पागल की तरह पाया था वहीं आदमी सच था। सभी रास्ते जाते थे। लेकिन उस आदमी को मान कर चलना बहुत मुश्किल था। क्योंकि चार रास्तों पर चलोगे कैसे? मंजिल एक हो सकती है, चलने वाला एक है, रास्ते चार हैं, तुम्हें तो चुनना पड़ेगा।
हम तो अहिंसा और करूणा का एक ही अर्थ करते हैं। अहिंसा का अर्थ हैः भीतर तो अहिंसा का भाव है, स्वयं तो अहिंसा से भरे हैं, लेकिन दूसरे की तरफ विचार नहीं है- कि मैं जो कह रहा हूं वह बिलकुल ठीक है, जहां तक मेरा संबंध है, लेकिन जो सुन रहा है, उसके जीवन में क्या होगा?
जैसे कृष्णमूर्ति है, वे ठीक महावीर जैसे व्यक्ति हैं। अहिंसा तो पूरी है, करूणा बिलकुल नहीं है। वे कह रहे हैं जो ठीक है। जो उन्हें ठीक लगता है, वहीं कह रहे हैं, उसको रत्ती भर भी बदलते नहीं हैं। लेकिन सुनने वाला जहां खड़ा है, उस पर क्या गुजर रही है, उसके क्या परिणाम होंगे, इसकी उन्हें चिंता नहीं है।
डॉक्टर अपने ज्ञान की कम फिक्र करता है, मरीज की ज्यादा फिक्र करता है। वह यह देखता है कि मैं जो कहूंगा, उसका मरीज पर क्या परिणाम होगा। यह भी हो सकता है कि उसे दिखाई पड़ रहा हो कि यह मरीज दो दिन बाद मर जायगा, यह दो दिन से ज्यादा टिक नहीं सकता। लेकिन वह मुस्कुराता है और कहता है, सब ठीक है और कल तुम उठ आओगे और चलने-फिरने लगोगे। जानता है कि दो दिन से ज्यादा बच नहीं सकता। लेकिन अगर वह सत्य ही सत्य कह दे कि तू दो दिन में मर जायेगा, तो यह अभी मर जायेगा। यह दो दिन भी नहीं बच सकता फिर। और अगर यह दो दिन बच गया, तो और भी संभावना है। और भी सहारा है, दो दिन का मौका है, इसमें चिकित्सा और की जा सकती है, कुछ और उपाय किये जा सकते हैं।
तो एक तो है शुद्ध ज्ञान का वक्तव्य और एक है प्रेम का वक्तव्य। जिन्होंने ज्ञान का वक्तव्य दिया, उन्होंने कहा, सभी ठीक है। जिन्होंने प्रेम का वक्तव्य दिया, उन्होंने कहा, यही ठीक है। क्योंकि तुम्हें चलना है। तो उन्होंने कहा, बायें से जाओगे तो ही पहुंचोगे।
तुम भयभीत, लोभातुर, अंधेरे में भटके हो। तुम्हें कोई हाथ का सहारा चाहिये। जो बड़ी सुदृढ़ता से कहे कि बचा लूंगा। अगर हाथ कहेः हो सकता है बच भी जाओ, हो सकता है न भी बचो, हो सकता है कोई दूसरा हाथ बचा ले, हो सकता है कोई तीसरा हाथ ठीक हो-ऐसी अगर संदेह की बाते करे बचाने वाला हाथ, तो वह जो डूब रहा है वह कहेगा, इससे अकेले ही डूब जाना बेहतर। और तुम्हारी झंझट कौन सिर पर ले! हम वैसे ही मुसीबत में है, उलझन में है, चित्त डांवाडोल है, तुम और हमें हिलाने आ गये।
तो कई बार तुम्हें वक्तव्य उनके विरोधी भी मालूम पड़ सकते हैं। वे उनकी करूणा से निकले होंगे। बुद्ध ने बहुत बार महावीर का विरोध किया, महावीर ने नहीं किया। क्योंकि महावीर का वार्तालाप एकालाप है। वे दूसरे से बोल ही नहीं रहे हैं। वे अपनी शुद्धता से बोल रहे हैं। वह ऐसे है जैसे एकांत में कोयल कूकती हो। कोयल किसी सुनने वाले के लिये नहीं कूक रही है। कोयल कोई तानसेन नहीं है कि दर्शक, श्रोता की चिंता हो। एकांत में भी चलेगा। कोई सुन ले तो सुन ले, यह उसकी मौज। इसके लिये वही जाने। न सुने तो कोई हर्ज नहीं। लेकिन बुद्ध का वक्तव्य एकांत में गूंजती कोयल जैसा नहीं हैं। बुद्ध का वक्तव्य तानसेन जैसा है। वह तुम्हारे लिये गाया गया है। वह विशेषतः तुम्हारे लिये तैयार किया गया है। तुम ध्यान में हो। क्योंकि बुद्ध कहते हैं, तुम्हारा ही ध्यान न हो, तो तुमसे बोलने का प्रयोजन ही क्या है?
एक बार ऐसा हुआ कि एक गांव में बुद्ध आये, वे बैठ गये, लोग इकट्ठे हो गये, सारा गांव इकट्ठा हो गया, फिर भी चुप है। तो किसी ने पूछा कि अब आप शुरू भी करिये। हम सब आ गये। फिर रात उतरी आती है, फिर अंधेरा हो जायेगा।
पर बुद्ध ने कहा, ‘‘मै जिसके लिये बोलने आया हूं, वह मौजूद नहीं।
लोगों ने चारों तरफ देखा। गांव के सभी पंडित मौजूद थे, धनी-मानी मौजूद थे, प्रतिष्ठावान मौजूद थे। कोई ऐसा दिखाई न पड़ता था जिसकी कि कोई गणना हो सके जो नहीं है।
उन्होंने कहा कि सब मौजूद हैं। आप किसकी बात कर रहे हैं? कौन मौजूद नहीं है?
बुद्ध ने कहा, मैं आता था रास्ते पर, एक जवान लड़की खेत की तरफ जाती थी। उसने मुझसे कहा कि देखो, रूकना, मैं आती हूं। और उसने इतने भाव से कहा कि उसके अभाव में मैं न बोल सकूंगा। और ऐसा भाव यहां किसी का भी आंख में नहीं है। ये सब होंगे गणमान्य गांव के, ये सिर्फ आ गये हैं लोकोपचार से कि बुद्ध गांव आये हैं, सुनने जाना पड़ेगा कर्तव्यवश। सभी गणमान्य मौजूद होंगे, हम न मौजूद होंगे, प्रतिष्ठा को धक्का लगेगा। ये भीड़-भाड़ को दिखाने आ गये है। लेकिन उस युवती ने मुझसे कहा था, रूकना। वह अभी तक आई नहीं है। मुझे रूकना पड़ेगा।
जब वह युवती आ गई थी। गांव के गणमान्यों ने तो कभी उसे देखा भी नहीं था कि यह गांव में रहती है। पहली तो बात स्त्री, वह भी दीन-हीन, गरीब, फटे कपड़े। लेकिन जैसे ही वह आ गई, बुद्ध ने बोलना शुरू कर दिया।
बुद्ध का गीत तानसेन जैसा है। कोयल के गीत की भी अपनी खूबी है। तानसेन के गीत का भी अपना मजा है। वे तुम्हारे लिये गा रहे हैं।
इसलिये बुद्ध धर्म विराट हो गया। सीमांए तोड़ कर बहा। ईसायत भी उसका मुकाबला नहीं कर सकती, इस्लाम भी मुकाबला नहीं कर सकता। क्योंकि इस्लाम ने तलवार का सहारा लिया धर्म को फैलाने में, जबरदस्ती की। ईसायत ने आर्थिक प्रलोभन दिये। लेकिन बुद्ध धर्म ने न तो तलवार का सहारा लिया, न आर्थिक प्रलोभन दिये। बुद्ध धर्म ने तो सीधा एक गीत गाया बुद्ध का। उस गीत में ही खूबी ऐसी थी कि सारा एशिया डूब गया। महावीर टापू की तरह रह गये।
मैं यह नहीं कहता कि टापू नहीं होने चाहिये। कोयल भी जरूरी है। तानसेन ही तानसेन काफी न होंगे। कभी तानसेन से भी मन ऊब जाता है। और कोयल के गीत में बड़ी मिठास है, निसर्ग है। लेकिन कोयल का गीत ही संगीत का आधार नहीं बन सकता। कभी किसी दुपहरी में शांत सुन लिया, ठीक! संगीत की कला का जन्म तो तानसेनों से होगा।
इन दोनों के वक्तव्य अलग-अलग होंगे। क्योंकि बुद्ध तुम्हारे लिये बोलेंगे। महावीर अपने कारण बोलेंगे, बुद्ध तुम्हारे कारण बोलेंगे। महावीर अहिंसक है, बुद्ध महा करूणावान हैं। यह दोनों के व्यक्तियों का भेद है।
लेकिन जो वे कह रहे हैं, अंतिम घड़ी में तुम पाओगे, वे बिलकुल एक हैं-सबै सयाने एकमत। पर वह अंतिम घड़ी में तुम पाओगे। उसके उदघाटन के लिये तुम्हें भी शिखर पर पहुंच जाना होगा। तब तुम समझ लोगे कि बुद्ध की करूणा थी कि उन्होंने बदले वक्तव्य।
तुम कभी सोचे हो, आनंद के संबंध में तुम कभी पूछते -कहां से आया? तुम भोगते हो। दुःख के संबंध में तुम पूछते हो-कहां से आया? अगर तुम प्रसन्नचित हो तो तुम यह नहीं पूछते कि प्रसन्नता कहां से आई? लेकिन अगर तुम उदास हो तो तुम जरूर खोजते हो कि उदासी कहां से आई? क्योंकि कारण तो हम उसी का खोजते हैं, जिसे हम मिटाना चाहते हैं। जिसे हम मिटाना नहीं चाहते उसका कारण हम क्यों खोजें? कोई नहीं खोजता कारण।
मृत्यु का कारण हम खोजते हैं, जीवन का कारण कोई नहीं खोजता। तुम शांत हो, स्वीकार करते हो। अशांत हो, चिकित्सक के पास जाते हो। बीमारी है, निदान करवाते हो। स्वास्थ्य का निदान करवाते हो? तुम डॉक्टर से जाकर पूछते हो कि ठीक-ठीक बताओं मैं स्वस्थ क्यों हूं? क्या कारण है मेरे स्वास्थ्य का? जब तक मुझे कारण पता न चल जाये और जब तक ठीक से निदान न हो जाये कि मेरा स्वास्थ्य किस प्रकार का है, तब तक मुझे चैन न मिलेगी।
नहीं, तुम पूछते ही नहीं। जब तुम स्वस्थ हो तब तुम भोगते हो। जब तुम अस्वस्थ हो तब तुम पूछते हो निदान, मार्ग, कारण, उपाय। दुःख का कारण खोजा जाता है।
सयाने बहुत प्रकार के हैं, लेकिन सब सयानों का मत एक है। सयाने बहुत रंग-रूप के हैं। तुमने अगर उनका वेश देखा तो तुम भटक जाओगे। तुमने अगर उनके शब्द ही सुने, उनके निशब्द में न उतरे, तो तुम भूल जाओगे, वे जो कहते हैं वही तुमने सुना, तुमने उनके प्राणों की धुन न सुनी जो कहने के पीछे बज रहीं है, तुमने भीतर की अंतर्वीणा न सुनी, तो तुम भटक जाओगे। तुमने अगर अंतर्वीणा सुनी, तो तुम पाओगे कि वीणा के ढंग कोई भी हों, आकार-रूप कोई भी हों, वीणा का स्वर एक है। सभी वीणाओं से वही स्वर उठ रहा है।
आकृति का क्या अर्थ है? कोई मूल्य नहीं। और बुद्ध अपने ढंग से चलेंगे, महावीर अपने ढंग से चलेंगे, कृष्ण अपने ढंग से चलेंगे। उनके ढंग भिन्न हैं, लेकिन उनका मत भिन्न नहीं है।
ऐसा ही समझो कि मैंने अपनी अंगुली उठाई चांद की तरफ, मेरी अंगुली अलग है। महावीर ने अंगुली उठाई चांद की तरफ, निश्चित ही उनकी अंगुली अलग होगी। लंबी होगी, छोटी होगी, बड़ी होगी, सुंदर होगी, न सुंदर होगी। बुद्ध ने उठाई अपनी अंगुली, अंगुली अलग होगी। जिस चांद की तरफ ये हजारों अंगुलियां उठ रहीं हैं सयानों की, वह चांद एक है।
तुमने अगर अंगुली को पकड़ लिया और अंगुली का विश्लेषण करने लगे और अंगुली काट कर पहुंच गये अस्पताल में और जांच-पड़ताल करने लगे, तो सभी अंगुलियों से अलग-अलग बातें मिलेंगी। किसी की हड्डी लंबी होगी, किसी की छोटी होगी। किसी के खून में बीमारी होगी, किसी के खून में नहीं होगी। किसी का नाखून छोटा होगा, किसी का बड़ा होगा। किसी की चमड़ी स्वस्थ होगी, अस्वस्थ होगी। वह तुम जो सब निकाल कर कागज पर लिख कर लौट कर आ जाओगे, उससे ही रह जायेगा और जिससे दिखाया था उस पर आंखे अटक जायेंगी।
जब कोई चांद को अंगुली दिखाए, तो चांद को देखना, अंगुली को भूल जाना। तब तुम पाओगे, सभी सयाने एकमत। और अगर अंगुलियां देखी तो तुम बड़ी उलझन में पड़ जाओगे। और तब अंगुली ही चांद और तुम्हारे बीच बाधा बन जायेगी। उसी के कारण तुम फिर चांद को न देख पाओगे। और अगर उस अंगुली को ही अपनी आंखों में रख लिया, तो अंधे हो जाओगे। यही हुआ है। बुद्धपुरूषों के वचन तुमने अपनी आंखों में रख लिये है।
जिन्होंने अंगुलियां पकड़ीं, शब्द पकड़े, सिद्धांत पकड़े, शास्त्र पकड़े, उनके कृत्य हैं। इस पृथ्वी पर कोई तीन सौ धर्म है। अब धर्म भी तीन सौ हो सकते हैं? धर्म तो एक ही हो सकता है। और एक होगा, अनाम होगा। उसका कोई नाम नहीं होगा। ये तीन सौ धर्म तीन सौ अंगुलियां है। चांद तो एक है।
कितना ही विरोध मालूम पड़े बुद्धपुरूषों के वचनों में, तुम धोखा मत खाना। वे तुम्हें ठीक लड़ते हुये भी मालूम पड़ें, तो तुम गौर से देखना, लड्डू फेंक रहे होंगे। मिठास ही फेंक सकते हैं।
परम् पूज्य सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
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