





एक प्रकार से देखा जाये तो यह साधना जीवन सौभाग्य है। इस साधना को सम्पन्न करने से निम्न लाभ होते हैं-
अटूट धन की प्राप्ति
जीवन में यश, मान, धन, पद, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य की प्राप्ति
आकस्मिक धन प्राप्ति
समस्त प्रकार के भोगों की प्राप्ति
स्वयं का भवन
पुत्र-पौत्र उन्नति
शत्रु नाश
उत्तम पति या पत्नी की प्राप्ति
अकाल मृत्यु निवारण
भाग्योदय
राज्य में उन्नति
वास्तव में ही यह साधना मानव जीवन का सौभाग्य है। जिनके पुण्योदय जाग्रत होते है, जो अपने जीवन में पूर्ण सुख सौभाग्य चाहते हैं, जो सही अर्थो में साधक हैं, वे अवश्य ही इस साधना को सम्पन्न करते हैं। इस साधना के द्वारा व्यापार में तेजी से प्रगति होने लगती है, यदि व्यापार में कोई बाधा हो या उन्नति नहीं हो रही हो तो वह बाधा समाप्त हो जाती है, रूका हुआ पैसा प्राप्त हो जाता है और इस नवरात्रि पर्व को सम्पन्न करते करते उसकी मनोकामना पूर्ण होती हुई अनुभव होती है।
इस साधना में नवरात्रि के नौ दिनों में नौ पूजन सम्पन्न होते है, प्रत्येक दिन की देवी, उसका ध्यान और उसका मन्त्र अलग-अलग होता है। इस साधना को साधक अपनी सुविधानुसार दिन या रात में, कभी भी सम्पन्न कर सकते हैं।
साधना सामग्री-
इस साधना में नित्य पूजन क्रम में अलग-अलग यन्त्रों की आवश्यकता होती है जिसका पूजन और प्रयोग अति आवश्यक है। ये यन्त्र अपने आप में अत्यन्त दुर्लभ और महत्त्वपूर्ण हैं और इन्हें पूरे जीवन भर के लिये अपने पूजन कक्ष में स्थापित करना सौभाग्यशाली माना गया है।
शास्त्रों के अनुसार निम्न तिथियों को निम्न यन्त्र की पूजा और मन्त्र जप सम्पन्न किया जाना चाहिये।
पहला दिन – इन्दुरूपिणी विश्वरूपा महादेवी यन्त्र
दूसरा दिन- अग्निरूपिणी दक्षिण काली यन्त्र
तीसरा दिन-तेजस्वरूपा सनातनी देवी यन्त्र
चौथा दिन- अनाहत रूपिणी परादेवी यन्त्र
पांचवा दिन-विशुद्धरूपिणी परमेश्वरी देवी यन्त्र
छठा दिन-आज्ञारूपिणी महाचक्रेश्वरी देवी यन्त्र
सातवां दिन- कामरूपिणी कामेश्वरी यन्त्र
आठवां दिन-शिवरूपिणी त्रिगुण देवी यन्त्र
उपरोक्त प्रकार से ही देवी का ध्यान और सम्बन्धित देवी की पूजा सम्पन्न करते हुये संबंधित मन्त्र का जप किया जाता है। इस साधना के अनुसार नित्य केवल ग्यारह माला मन्त्र जाप करने की आवश्यकता है। इस मन्त्र का जप मनोहरा माला से ही सम्पन्न करने का शास्त्रों में विधान है।
अन्य पूजन सामग्री
निम्न पूजन सामग्री का नित्य प्रयोग किया जाता है-
जलपात्र, कुंकुम, केसर, चावल, पुष्प, अगरबत्ती, शुद्ध घी का दीपक, अबीर-गुलाल, मौली, सुपारी, लौंग-इलायची, फल, दूध का बना हुआ प्रसाद और दक्षिणा। साधकों को चाहिये कि वो पहले से ही इन सभी सामग्रियों को पास में रख ले ताकि साधना काल में आसन से उठना ना पड़े।
साधना विधान
साधक नवरात्रि के प्रथम दिन स्नान कर के, पीली धोती पहिन कर पीले आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुंह कर के बैठ जाये। अपने सामने एक थाली में कुंकुम या केसर से स्वास्तिक बना ले और उस पर प्रथम दिन इन्दुरूपिणी विश्वरूपा महादेवी यंत्र को स्थापित करें। फिर यन्त्र को जल से स्नान करा के पोछ कर केसर का तिलक करे। अक्षत, पुष्प, नैवेद्य चढ़ायें और फिर मनोहरा माला से विश्वरूपा महादेवी मन्त्र का ग्यारह माला जप करें।
साधक को प्रत्येक दिवस को इसी प्रकार से सम्बन्धित देवी के यन्त्र की पहले पूजा करनी चाहिये और फिर बाद में उस से संबंधित मन्त्र का जाप करना चाहिये। आगे प्रत्येक दिवस से सम्बन्धित देवी के मन्त्र का उल्लेख किया जा रहा है।
पहला दिन- इन्दुरूपिणी विश्व रूपा महादेवी यन्त्र का स्थापन
ध्यान
अभयं वरदं चैव हस्तं च सुर-सुन्दरि।
धनुर्वाणधरा देवी पापांकुश-धरा पुनः।।
मन्त्र
।। ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं जूं सः अमृते विश्वरूपा महादेव्यै नमः।।
दूसरा दिन-अग्निरूपिणी दक्षिणी काली यन्त्र का स्थापन
ध्यान
अभयं च वरं चैव दक्षिणे धारिणी सदा।
खड्ग मुण्ड च वामेऽस्मिन्धारयन्ती सनातनीमा।
मन्त्र
।। ऊँ कां कालाग्नि रूद्राय अग्निरूपिणी दक्षिण काल्यै नमः।।
तीसरा दिन-तेज स्वरूपा सनातनी देवी यन्त्र का स्थापन
ध्यान
सर्व सिद्धि प्रदां देवी जगतं मोहिनी पुनः।
महामायां मोहिनी च ज्ञानिनां ज्ञानदां सतीम।।
मन्त्र
।। ऊँ काम-प्रद षोडशी कलात्मने तेजस्वरूपा सनातनी देव्यै नमः।।
चौथे दिन-अनाहत रूपणी परादेवी यन्त्र का स्थापन
ध्यान
अष्ट-भुजा महा-देवीं रक्त-वर्णा त्रि-शक्तिकाम।
धनुर्बाणं च खडगं च चक्रं च दधर्ती शिवे।।
मन्त्र
।। ऊँ ह्री ऐं ईश्वरी अनाहत रूपिणी परादेव्यै नमः।।
पांचवां दिन- विशुद्ध रूपिणी परमेश्वरी देवी यन्त्र का स्थापन
ध्यान
दश भुजा महा-देवी पती वर्णा सनातनी
कपालं खेटक शंखं दर्पण चामरं तथा।।
मन्त्र
।। ऊँ अं अर्थ प्रद-द्वादश कलात्मने विशुद्ध रूपिणी परमेश्वरी देव्यै नमः।।
छठा दिन -आज्ञारूपिणी महाचक्रेश्वरी देवी यन्त्र का स्थापन
ध्यान
रक्त वस्त्र परीधानां कमला-पति सेविताम।
संसार-दुःख शमनी संसारार्णव तारिणीमा।
मन्त्र
।। ऊँ चं कुण्डलिनी जाग्रतं आज्ञारूपिणी महाचक्रेश्वरी देव्यै नमः।।
सातवां दिन -कामरूपिणी कामेश्वरी यन्त्र का स्थापन
ध्यान
पद्मासनां महा-मायां-पद्मासन स्थितां।
एवं संचिन्तयेद देवी ब्रह्म मार्गेण त्रिगुणा गामिनीमा।
मन्त्र
।। ऊँ कं कामरूपिणी कामेश्वरी देव्यै नमः।।
आठवां दिन-सहस्त्रार रूपिणी दिव्यैश्वरी यन्त्र का स्थापन
ध्यान
चिन्मयं पर शिवं देवि ध्यान-गम्यं स्नातनं।
सारत सार तर देवी परवेतत्व गोचर।।
मन्त्र
।। ऊँ अमृते अमृतोद्भवे अमृतेश्वरि सहस्त्रार रूपिणी दिव्यैश्वरी नमः।
नवां दिन-शिव रूपिणी त्रिगुणा देवी यन्त्र का स्थापन
ध्यान
नित्यानन्द निरन्तरं निरूपमं वेदैरपारं परम।
शिव शक्ति वंर देवि निर्गुणं सगुणात्मकम।।
मन्त्र
।। ऊँ पं परमतत्वायै शिवरूपिणी त्रिगुणात्मिका देव्यै नमः।।
इस प्रकार से नित्य उपरोक्त बताये हुई विधि से सम्बन्धित देवी यन्त्र स्थापन करें, उनका पूजन करें और सम्बन्धित मन्त्र जाप करें।
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