





जब आप कारण में सुख खोजते हैं- किसी और में, किसी वस्तु में, किसी घटना में, किसी व्यक्ति में, तो अंतिम परिणाम सिवाय दुःख के और कुछ नहीं होता; दुःख ही दुःख होता चला जाता है। पत्नी पति में सुख खोज रही है, माँ बेटे में सुख खोज रही है, बाप बेटे में, बेटी में सुख खोज रहा है, संबंधियों में, धन में, पद में, प्रतिष्ठा में,- कहीं और। अपने को छोड़कर हम सब सुख खोज रहे हैं कहीं और। और मजा यह है कि जिनमें हम सुख खोज रहे हैं, वे खुद कहीं और सुख खोज रहे हैं। हम एक खदान खोद रहें हैं जिसको हम सोचते हैं, हीरे की खदान है, और वो खदान खुद हीरों की तलाश में गई है और वह खदान जहाँ तलाश कर रही है, वे खुद कहीं और किसी के तलाश में गये हैं।
हम उन बैरंग चिट्ठियों की तरह है, जिन पर कोई पता नहीं है खोज रहे हैं! किसकी तरफ जा रहे हैं कोई अता-पता नहीं है और जिसके घर जा रहे हैं पहले पूछा भी नहीं है कि वह खुद भी तो कहीं गये हुए नहीं हैं।
हर आदमी कहीं और है, इसलिए किसी से भी मिलना नहीं हो पाता। जिसके घर जाओ, वह वहाँ नहीं है। जिसका हाथ हाथ में लो, वह वहाँ नहीं है, वह कहीं और गया हुआ है, इसलिए किसी का किसी से मिलना हो ही नहीं पाता; होगा भी नहीं। और जो कारण में खोज रहा है, वह आज नहीं तो कल, गहरे से गहरे दुःख में पड़ता जायेगा। क्योंकि हर बार आशा बंधेगी कि यह कारण सुख देगा, और जब मिल जायेगा, आशा टूट जायेगी।
मस्ती करने से दूसरे से तो दुःख मिलता है, सुख कभी मिलता नहीं; सुख मिलता है सदा अपने से। जब कभी आपको दूसरे से भी मिलता हुआ लगता है, तो मस्ती की परंपरा कहती है कि उसका कारण दूसरा नहीं होता, आप ही होते हैं।
किसी से आपको प्रेम है। उसकी उपस्थिति सुखद मालुम पड़ती है। यह उसकी उपस्थिति के कारण आपको सुख मिल रहा है या आपकी धारणा आपको सुख दे रही है कि मेरा प्रेम है और उपस्थिति से मुझे सुख मिलता है? क्योंकि अगर उस व्यक्ति की उपस्थिति से ही सुख मिलता हो, तो उस व्यक्ति की उपस्थिति से सभी को सुख मिलना चाहिए। लेकिन यह नहीं हो पाता। उसी व्यक्ति की उपस्थिति से किसी को दुःख मिलता है भारी।
अगर पानी से प्यास बुझती है तो सभी की प्यास बुझनी चाहिए। अगर आप कहें कि इस पानी से हमारी प्यास बुझती है और किसी की नहीं बुझती, तो इसमें मामला आप का ही है, पानी का नहीं हो सकता। आब्जेक्टिव ट्रुथ और सब्जेक्टिव ट्रुथ, विषयगत सत्य और आत्मगत सत्यों में फर्क करना सीखना चाहिए। अगर पानी है, तो मेरी प्यास बुझाएगा, आपकी भी बुझाएगा, किसी की भी बुझाएगा; प्यास बुझाएगा आदमियों से कोई संबन्ध नहीं है। जिसकी भी प्यास होगी, बुझ जायेगी।
किसी का सौन्दर्य मुझको सुख देता है, किसी और को नहीं देता। अगर सौन्दर्य है तो जिनको भी सौन्दर्य की तलाश है, प्यास है, उन सबको सुख मिलना चाहिये। यह नहीं होता। उसी सौन्दर्य से किसी को कांटे छिदते हैं और ऐसा लगता है कि भाग खड़े हों, दूर हट जाएं। किसी को पता ही नहीं चलता कि सौंदर्य है भी। किसी को सिर्फ हंसी आती है कि दिमाग खराब है, जहाँ सौन्दर्य देख रहे हो; वहाँ कुछ भी नहीं है। मतलब क्या हुआ इसका? मतलब ये हुआ कि जो सौन्दर्य आपको दिखाई पड़ रहा है वह आपका ही दिया हुआ है; वहाँ कुछ है नहीं आप ही कारण हैं और इसलिये यह हो जाता है कि जिसके सौन्दर्य से सुबह सुख मिला, दोपहर दुःख मिलने लगता है। और आज सुख मिला, कल दुःख मिलने लगता है।
कोई किसी के प्रेम में नहीं पड़ता। दूसरे तो पर्दे होते हैं, हम अपनी ही छाया देखकर उनकें प्रेम में पड़ते चले जाते हैं। जब हमें लगता है कि दूसरे से सुख मिल रहा है, तब भी हमारा ही आभास होता है। जो आदमी यह खोज लेता है कि सुख का स्त्रोत मेरे भीतर है, वह उसे कहीं खोजने नहीं जाता। अपने को ही सुख में डुबा हुआ अनुभव करने लगता है। अपने होने के कारण ही वह नाचने लगता है। श्वास चल रही है यह भी परम आनन्द है, हृदय धड़क रहा है यह भी परम आनन्द है। आध्यात्म की खोज असल में अपने ही प्रेम में पड़ने की खोज है। संसार दूसरे के प्रेम में पड़ने की यात्रा है और आध्यात्म स्वयं के खोज की। स्वयं के ही अर्थ का खोज है, स्वयं का ही रस पाना है।
आनंद स्वरुप आत्मा को स्वस्वरुप जानकर इस आत्मा में ही बाहर और भीतर सदा आनन्द रस का स्वाद लेना है। विषयों से दूर जाना यही परम तृप्ति है। और आत्मा का जो आनन्द है वह स्वयं ही अनुपम है। हमें संसार से कोई भी सुख नहीं मिलता, दूसरे से कभी कोई शान्ति नहीं मिलती। आँख खोलकर खोजने की जरुरत है। डर के मारे कि सत्य का पता न चल जाये, हम जन्मों-जन्मों से आँखें बंद कर लेते हैं।
हमारा आँख बंद कर लेना सप्रयोजन है क्योंकि हमें भय है कि जो भी हम देख रहे हैं, वह वहाँ है नहीं। हम अपने घावों को छिपाए रहते हैं, कोई उघाड़ कर देखे तो पता न चल जाये। घाव छिपाकर ऊपर सोने का कंगन बाँध लिया है। कंगन दिखाई पड़ता, घाव दिखाई नहीं पड़ता। वह घाव नासूर बनता चला जाता है। हिमारी जिंदगी आत्म-प्रवंचन है, जहाँ कुछ भी नहीं है लेकिन यह भी डर लगता है कि इसी के सहारे जी रहे हैं, अगर आँख खोलकर देखा और दिखाई पड़ा कि यह भी नहीं है, तो जियेंगे कैसे?
आँख बन्द किये रहते हैं कि जहाँ चल रहे होते हैं वही स्वर्ग है। नर्क में भी चल रहे हैं तो भी स्वर्ग है। आँख बन्द रहती है तो क्या फर्क पड़ता है कि स्वर्ग है या नर्क। हम भीतर अपना स्वर्ग बनाए रखते हैं। कभी-कभी मजबूरी में टक्कर लग जाती है, पैर टकरा जाता है, कहीं पत्थर से चोट खा जाते हैं, आँख खुल जाती है। फिर से तत्काल बंद कर लेते हैं कि स्वर्ग है। क्योंकि वह आँख जब खुलती है तब नर्क दिखाई पड़ता है।
आपको भी रोज मौके आते हैं नर्क देखने के, फिर आप आँख बन्द कर लेते हैं, चेष्टा से आँख बन्द रखते हैं। आपको यह डर है और इसलिए वैराग्य उत्पन्न नहीं हो पाता है, नहीं तो प्रत्येक के जीवन में वैराग्य उत्पन्न कर दे।
जीवन ऐसा है कि वैराग्य उत्पन्न होगा ही, आपको वैराग्य उत्पन्न करने के लिये कोई अथक चेष्टा नहीं करनी है। वैराग्य उत्पन्न न हो, आप इसके लिये अथक चेष्टा कर रहे हैं। सारी जिंदगी वैराग्य की तरफ जा रही है। जिंदगी का सन्देश वैराग्य है, इंगित वैराग्य है। सब तरह से जिंदगी दुःख देती है, तोड़ती है सब तरह से, खण्ड-खण्ड कर देती है, अंग-भंग कर देती है, फिर भी वैराग्य उत्पन्न नहीं होता, यह अपने-आप में एक चमत्कार है नहीं तो जिन्दगी का सहज स्वर ही वैराग्य का है।
राग में है जीवन का जन्म, वैराग्य में है परिणति। राग से हम पैदा होते हैं, लेकिन अगर राग में ही मर जाये तो उसका मतलब है कि जीवन का संदेश हमें सुनाई नहीं पड़ा। वैराग्य ही जीवन का स्वर है, एक दृष्टि में देखें तो आपको वैराग्य के तरफ ले जाने के लिए सब सहयोगी हैं और वैराग्य का फल ज्ञान है।
जिस दिन आप विराग में खड़े हो जाते हैं और इस जगत के प्रति कोई वासना नहीं रह जाती, इस जगत से कोई मांग नहीं रह जाती, इस जगत की व्यर्थता सामने स्पष्ट हो जाती है, इसका ही फल ज्ञान है। तब आप जागते हैं, तब आप प्रज्ञान से भरते हैं, तब पहली बार प्रज्ञा का उदय होता है, तब आपके भीतर दीया जलता है।
वैराग्य की स्थिति में ज्ञान का दीया जलता है और अगर ज्ञान का दीया ना जले तो समझना की वैराग्य झूठा है। यह सूत्र का दूसरा हिस्सा है, कि अगर दूसरी बात घटित न हो तो पहली झूठी है, असफल है।
हमारे समाज में विरागी कम नहीं हैं, लेकिन ज्ञानी खोजना मुश्किल है। विरागी तो हर मठ मंदिर में बैठे हुए हैं। वर्षों से भागे हुए हैं लेकिन फिर भी कहते हैं; अभी कुछ नहीं हुआ; ज्ञान नहीं हुआ। मगर वे यह भी मानने को तैयार नहीं हैं उनका वैराग्य मिथ्या है, इसलिए ज्ञान नहीं हुआ। वे मानते हैं वैराग्य तो हमारा पूरा है, ज्ञान नहीं हुआ।
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