





जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और बदलाव, श्रम, तप, साधना व चमत्कार से ही संभव है! वह परिवर्तन जो हम अपने साथ, अपनी परिस्थिति के साथ, अपने अभावों के साथ होने की अपेक्षा करते हैं। वह परिवर्तन जो आपको धनवान बनाये, आपको ऐश्वर्यवान बनाए, आपके हर उस कष्ट को समाप्त करे जो आपके दुःखों का, विषमताओं का कारक है। कष्ट आपको आपके कर्म से, पितृ दोष से, आपके सगे-सम्बन्धी से व आपकी नकारात्मक सोच के फलस्वरुप भोगना होता है।
परन्तु वह परिवर्तन संभव कैसे होगा?
श्रम से, जो आप संभवतः कर ही रहे हो, जो पूरे जीवन करना ही होगा।
तप अर्थात् अपने जीवन में कुछ पाने के लिए, कुछ बनने के लिए जलना, निरन्तर कार्यरत रहना।
साधना जो आपको अपनी आकांक्षाओं की पूर्णता के लिये आपको तैयार कर, हर उस संसाधन को उपयोगी बनाये।
साथ ही चमत्कार की प्राप्ति!
वो ऊर्जा-वो चेतना जो आपकी हर नकारात्मकता को, हर विषमता को, हर प्रतिकूल स्थिति के बावजूद भी विजयश्री बनाये। वह चमत्कार संभव तब होगा, जब सम्पूर्ण ब्रह्मांड आपके लिए कार्यरत हो, आपकी उस इच्छा की प्राप्ति के लिए शामिल हो। आपके श्रम को, आपके तप को, आपकी साधना को दिव्यता प्रदान करें। आपको वो स्पष्टता प्रदान करे, आपको एक शिक्षा प्रदान करे। वह चमत्कार, वह चेतना व ऊर्जा आपके गुरु ही तो हैं जो सदैव आपके साथ एक सारथी के रुप में चलते रहेंगे। श्रम-तप-साधना आपको स्वयं ही करनी है, आपके लिए कोई करेगा भी नहीं। आपके साथ सदैव गुरु रहेंगे, सभी रिश्ते-नाते मरने के उपरान्त समाप्त हो जायेंगे परन्तु गुरु-शिष्य का नाता जन्म-जन्मान्तर तक रहेगा जब तक आप पूर्ण न हो जाओ, मोक्ष प्राप्त न कर लो।
गुरु तो निरन्तर आपको चेतना प्रदान करते हैं। आपको तो उस चेतना को आत्मसात करना है। आपके मन की निरन्तरता को, हर उस आभाव को पूर्ण किया जा सकता है, आपको तो केवल अपना हाथ बढ़ाना है, स्वयं को सौंप देना है, गुरु केवल आपको आगे बढ़ाते हैं, जीवन्त बनाते हैं, आपको भय मुक्त करते हैं।
गुरु आपको आत्मिक रुप से, मानसिक रुप से सबल व मजबूत बनाते हैं, तभी आप अपनी स्थिति को सुचारु बनाने योग्य बनते हैं।
आपको उस चमत्कार को प्राप्त करना है। तो यह निर्णय अभी लेना होगा कि आपकी भक्ति, आपकी निष्ठा कितनी अपने गुरु के प्रति है या फिर अपने आस-पास होने वाली हर उस घटना से, हर उस विज्ञापन से विचलित होकर अपने भाव-चिन्तन, श्रद्धा गुरु से विमुख कर देते हो। गुरु तो सदैव साथ हैं पर निर्णय तो आपको लेना है। गुरू सदैव अवसर प्रदान करते है कि आपके जीवन में भी वह चमत्कार हो आप भी उस सुरत, उस आनन्द की प्राप्ति करें। आपको तो केवल अपने गुरू को आत्मसात करना है अपने मन-भाव के चिन्तन को गुरुमय करने हेतु 27-28-29 जुलाई को त्रिपुष्कर योगमय भगवती नारायण सौभाग्य धनदा साधना महोत्सव रायपुर (छ.ग.) में अवश्य सम्मिलित हों।
आपका अपना
विनीत श्रीमाली
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