





मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन का मूलभूत सत्य यह है कि हम केवल शरीर नहीं, बल्कि ईश्वर का अंश यानि आत्मा हैं, जो अमर, जन्म-मृत्यु रहित और शुद्ध ऊर्जा है। इसका उद्देश्य सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठते हुये अपने वास्तविक आत्मज्ञान स्वरुप को पहचानकर आंतरिक पवित्रता प्राप्त करना और उस परम सत्य की सत्ता से जुड़ना है। हमारे उपनिषदों में एक पूर्ण, सच्चा व शुद्ध आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए तथा आत्म साक्षातकार हेतु एक पूर्ण सद्गुरु की आवश्यकता बताई गई है। जिसके माध्यम से मनुष्य को ज्ञान प्राप्त हो सके तथा उस ज्ञान के माध्यम से वह सांसारिक व्यसनों से मुक्ति प्राप्त कर सके।
विष्णु पुराण के दो प्रसिद्ध सूत्र हैं-“ऋतेज्ञानान्नमुक्ति”अर्थात्“ज्ञानकेबिनामुक्तिसंभवनहींहै।”और“साविद्यायाविमुक्तये”अर्थात्”सच्ची विद्या वही है जो मुक्ति दिलाये।”
ज्ञान का तात्पर्य बाहरी अथवा किताबी ज्ञान नहीं बल्कि अपने जीवन में अज्ञान की परत को हटाकर आंतरिक खोज में संलग्न होना है, आत्म-ज्ञान, आत्म-बोध (Self-Realization) प्राप्त करना है तथा स्वयं के वास्तविक स्वरुप को जानना है, जो शरीर, मन और विचारों से अलग है। आध्यात्मिक ज्ञान सिखाया नहीं जाता, यह एक आन्तरिक अहसास है, इसे केवल स्वयं के अनुभव से ही प्राप्त किया जा सकता है। यह अनुभव नियमित ध्यान, नकारात्मक भावों का त्याग करके तथा निरन्तर सद्गुरु की चेतना और स्वयं की ओर ध्यान मोड़कर प्राप्त किया जा सकता है, जिससे साक्षी भाव जागृत होता है और व्यक्ति अपने चेतना के दिव्य प्रकाश का अनुभव करता है। अज्ञान का मतलब ज्ञान का अभाव नहीं होता है, अज्ञान का मतलब होता है झूठे ज्ञान की उपस्थिति।
ज्ञान की अपनी कोई परिभाषा नहीं है। ज्ञानी का व्यवहार शास्त्र मर्यादा की अवहेलना नहीं करता। पढ़े लिखे लोग और चिन्तकों में यही फर्क है कि पढ़े लिखे लोग केवल याद कर लेते हैं जबकि चिन्तक उस विषय में गहन विचार बनाते हैं। समय के साथ लोग इन चिन्तकों के ही विचार सुनना पसंद करते हैं। यह चिन्तन ही ज्ञान की वृद्धि करते हैं। जैसे-जैसे हम जानते हैं वैसे-वैसे हम मुक्त होते हैं। जब हमारे अन्दर की जिज्ञासा पूर्ण होने लगती हैं तो हमें तृप्ति का अनुभव होता है। वस्तुतः ज्ञान के दो पक्ष हैं एक वह जो तुम नहीं हो और दूसरा जो तुम हो। तुम पंचमहाभूतों से बने शरीर नहीं हो, तुम चैतन्यरुप हो और साक्षी हो। चैतन्यरुप होने का अर्थ है-‘स्वप्रकाश होना।’ ‘अप्प दीपो भव’, ‘आत्मदीपो भवः’ अर्थात् आपको प्रकाशित होने के लिए अन्य किसी की अपेक्षा नहीं है। आप अपने प्रकाश स्वयं हैं; व्यक्ति को अज्ञानता के अंधकार से निकलने के लिए खुद प्रयास करना चाहिए, न कि किसी के बाहरी शक्ति पर निर्भर रहना चाहिए।
‘न हि ज्ञानातिरिक्तोऽन्योऽपि आत्मा अस्ति’ अर्थात् आत्मा, ज्ञान से भिन्न कोई वस्तु नहीं है, बल्कि स्वयं ज्ञान स्वरुप है। इसीलिये बाहरी ज्ञान से मुक्त होकर, सभी वस्तुओं से अपना ध्यान हटाकर साक्षी बन जाना, श्रवण, मनन, चिन्तन तथा अध्ययन में संलग्न हो जाना ही आत्मज्ञान की प्राप्ति का सहज मार्ग है। नित्य यह क्रियायें करने के उपरान्त जब साधक के अन्दर बिना किसी कारण के आनंद और प्रेम की अनुभूति होने लगे, विचारों में स्पष्टता और मन में शान्ति व्याप्त होने लगे तथा स्वयं के प्रति जागृति (सचेतनता) हर समय बनी रहे, तब उसे समझना चाहिये कि वह आन्तरिक रुप से ज्ञान की उच्चता की ओर अग्रसर हो रहा है।
जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु के बारे में सोचता है तो उनसे आसक्ति (किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति जुड़ाव अथवा लगाव) उत्पन्न होती है। जब कोई व्यक्ति ध्यान के क्षेत्र में किसी विशेष इंद्रिय विषय के प्रति सजग होते है, चाहे वह विषय कुछ भी हो, तो मन उस विशेष विषय से जुड़ जाता है और उससे आसक्त हो जाता है। मन के इस जुड़ाव के साथ एक विशेष भावना और प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है जो अक्सर इच्छा होती है। उस वस्तु को प्राप्त करने, उसे अपने वश में करने और उस पर अधिकार करने की इच्छा एक लहर की तरह उठती है। इसके साथ ही उस व्यक्ति के स्वभाव और चरित्र में प्रेरणा और आक्रामकता का जन्म होता है।
तंत्र का दूसरा पहलू मुक्ति है, यानी स्वतंत्रता। व्यक्ति में उन बंधनों से मुक्त होने की सहज इच्छा और प्रेरणा होती है जो उसकी अभिव्यक्ति को सीमित और प्रतिबंधित करते हैं, ताकि वह अधिक कुशल, रचनात्मक और पूर्ण बन सके। इन लक्ष्यों को प्राप्त करना ही मुक्ति की अवधारणा है, जहाँ व्यक्ति उस खोल से बाहर निकलता है जो जीवन में सकारात्मक गुणों की अभिव्यक्ति को सीमित करता है। मुक्ति अपने स्वभाव और जीवन में रचनात्मकता के विकास का अनुभव है। ऐसा कहा गया है कि आध्यात्मिक परंपराओं का उद्देश्य भौतिक संलयन के रूप में भुक्ति से मुक्ति की ओर बढ़ना है, जो स्वयं की पूर्ण स्वतंत्रता है। इस प्रकार, विकास में भौतिकता और भोग के पहचान से मुक्ति और पारलौकिकता की ओर बढ़ना शामिल है।
मुक्ति में, मन इंद्रियों और इंद्रिय विषयों से अलग हो जाता है; यह बाहरी घटनाओं से स्वयं को नहीं जोड़ता, बल्कि अपने अंतर्मन का अनुभव करने लगता है। भुक्ति और मुक्ति दोनों की तांत्रिक प्रक्रिया चेतना के विकास और परिपक्वता के क्रमिक अनुभवों से गुजरने में सहायक होती है।
मनुष्य के कष्ट और पीड़ा का कारण इच्छा और इस भौतिक संसार में चेतना द्वारा निर्मित संगति है। यदि मनुष्य अपनी संगति और इच्छाओं को समझ ले, तो जीवन में आने वाली अधिकांश कठिनाइयाँ, संघर्ष और समस्याएँ दूर हो जायेगी। तंत्र कहता है कि मनुष्य दो दिशाओं में जा सकता है, एक है आनंद का मार्ग, जिसे भुक्ति कहा जाता है, और दूसरा है मुक्ति का मार्ग ।
अधिकांश मनुष्यों के जीवन का मूल उद्देश्य सुख, तृप्ति और प्रसन्नता की खोज करना है। यह सर्वविदित है कि जब मानव जीवन का जन्म होता है, तो इंद्रियाँ, मन, बुद्धि और भावनाएं जीवन को समझने और अनुभव करने के प्रमुख साधन बन जाते हैं। जीवन को समझने और अनुभव करने की इस प्रक्रिया में, ये साधन विभिन्न इंद्रिय-विषयों से जुड़ जाते हैं और उनसे संबंध स्थापित करते हैं। इंद्रियों और मन का इंद्रिय-विषयों से यह जुड़ाव सुख और दुःख दोनों की अनुभूतियों को जन्म देता है।
सुख, प्रसन्नता और तृप्ति की खोज इच्छा से प्रेरित होती है। हालांकि, जब भी मन में इच्छा उत्पन्न होती है, तो यह इस बात का संकेत है कि भीतर कुछ कमी है। यदि इच्छा सुख का अनुभव करने की है, तो इसका कारण यह है कि सुख का कभी अनुभव नहीं हुआ है, और इसलिए उसी की खोज की जा रही है। यदि इच्छा शांति प्राप्त करने की है, तो इसका कारण यह है कि शांति का अनुभव नहीं हुआ है; यह केवल एक अवधारणा बनकर रह गई है। अतः भुक्ति अभाव और प्राप्ति दोनों को समाहित करती है। उस अभाव या कमी की भावना को पूरा करने के लिए, इच्छा स्वयं को प्रकट करती है ताकि वांछित वस्तु को प्राप्त करने की प्रक्रिया शुरू हो सके और जीवन में उस कमी की भावना को भरकर स्वयं को संतुष्ट किया जा सके। चूंकि इच्छा ही इंद्रिय जगत से जुड़ाव का कारण है, इसलिए यह सुख और अस्वीकृति, सुख और दुख के विभिन्न अनुभवों को जन्म देती है।
भुक्ति वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति आनंद, प्रसन्नता, संतोष और परमानंद का अनुभव कर सकता है, लेकिन यह उसे पीड़ा, कष्ट और व्यथा के प्रभावों के अधीन भी करती है। सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार के अनुभव होते हैं। चेतना के व्यवहार पर इस भुक्ति अवस्था का प्रभाव, जिसमें सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार के अनुभव होते हैं, को समझना तंत्र का एक पहलू है।
बोध और आनंद ही भुक्ति का मार्ग है, और इसके द्वारा भी विकास संभव है, बशर्ते कि अपने वास्तविक स्वरूप को न भुलाया जाये। यह द्रष्टा, साक्षी, प्रेक्षक के भाव से आनंद का अनुभव करते हुए स्वयं के प्रति सजग रहकर प्राप्त किया जा सकता है। उचित साक्षी भाव से भुक्ति मानव चेतना के उत्थान और मुक्ति का मार्ग बन जाती है, क्योंकि यह व्यक्ति को चेतना के उन पहलुओं से जोड़ती है जो सौंदर्य और संतोष की अनुभूति कराते हैं। यदि आनंद को सही ढंग से समझा जाए, तो यह सौंदर्य और संतोष की आवश्यक अनुभूति उत्पन्न कर सकता है। हालांकि, यदि आनंद को उचित साक्षी भाव से न देखा जाये, तो व्यक्ति आनंद और आनंद के भंवर में फंस जाता है और उच्चतर स्रोत से विमुख हो जाता है। तब व्यक्ति केवल उस विशेष क्षण के आनंद का अनुभव करता है। क्षण बीत जाने के बाद, नई इच्छाएं उत्पन्न होती हैं ताकि उस अनुभूति को फिर से जिया जा सके जिसे अब सुख की अवस्था से जोड़ दिया गया है। इससे और अधिक बंधन उत्पन्न होता है। इसलिए, दृष्टा भाव के साथ, आनंद चेतना के सुंदरम और शिवम पहलुओं, सुंदरता और शुभता का अनुभव करने का मार्ग बन सकता है ।
अपने विपरित अथवा मायावी रुप (शरीर/मन) का त्याग करके, अपने शुद्ध वास्तविक आत्म स्वरुप में स्थित हो जाना मुक्ति अथवा मोक्ष का वास्तविक अर्थ है। मुक्ति कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे बाहर खोजा जाये। यह हमारे भीतर ही विद्यमान है, इसे केवल जानने और अनुभव करने की आवश्यकता है। जब मनुष्य को यह अनुभव हो जाता है कि वह स्वयं ब्रह्मम स्वरुप है और जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। मुक्ति का अनुभव किसी विशेष स्थान या समय में नहीं होता। साधक को अपना दृष्टिकोण बदलना चाहिए। जैसे ही हम कर्ता के बजाय दृष्टा बन जाते हैं, हम स्वतंत्र हो जाते हैं। संसार के बन्धनों, ईच्छाओं और ईष्या की कुंठा से ऊपर उठ कर निष्काम भावना से कर्म करते हुए सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाते है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,