





‘जिस प्रकार पुष्पों का सार मधु, दुग्ध का सार घृत और रस का सार दुग्ध है, उसी प्रकार वेदों का सार गायत्री को कहा जाता है।’
प्राचीन वैदिक संस्कृति में स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, शील, गुण, कर्तव्य, अधिकार, गरिमामयी उच्च स्थान और सामाजिक भूमिका का जो सुन्दर वर्णन पाया जाता है, वैसा संसार के किसी धर्मग्रंथ में अन्यतम है। वेद उन्हें घर की सम्राज्ञी कहते हैं तथा देश की शासक, पृथ्वी की सम्राज्ञी तक बनने का अधिकार देते हैं। यहाँ तक की वेदों में स्त्री यज्ञीय है अर्थात् यज्ञ समान पूजनीय। तथा नारी को ज्ञान की अधिष्ठात्री, सुख-समृद्धि प्रदायक, तेजस्वीता प्रदान करने वाली, विदुषी, सरस्वती, इन्द्राणी, उषा जो सबको जागृत अवस्था प्रदान करती है।
वेदों में नारी देवी हैं, विदुषी हैं, प्रकाश से परिपूर्ण हैं, वीरांगना हैं, वीरों की जननी हैं, आदर्श माता हैं, कर्तव्य निष्ठ धर्मपत्नी हैं, सद्गृहणी हैं, सम्राज्ञी हैं, संतान की प्रथम शिक्षिका हैं, अध्यापिका बनकर कन्याओं को सदाचार और ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देनेवाली हैं, उपदेशिका बनकर सबको सन्मार्ग बतानेवाली हैं, मर्यादाओं का पालन करनेवाली हैं, जग में सत्य और प्रेम का प्रकाश फैलानेवाली हैं। यदि गुण-कर्मानुसार क्षत्रिय हैं, तो धनुर्विद्या में निष्णात होकर राष्ट्र रक्षा में भाग लेती हैं। स्त्री मातृ स्वरूपा, संस्कारों की सिंह वाहिका, समाज की रीढ़, सिर की पगड़ी, राष्ट्र की नाड़ी, परिवार की धुरी, सन्तान की प्रथम गुरु, समृद्धि एवं खुशहाली की देवी है।
आज कल के भारतीय आधुनिक शिक्षित वर्ग मानसिक और शारीरिक सुख-शान्ति की प्राप्ति के लिये विदेशों में जाते हैं, किन्तु उन्हें वहाँ वास्तविक सुख-शान्ति प्राप्त नहीं होती। पश्चिम के देशों में विविध लौकिक सुख-साधनों की उपलब्धि तो सम्भव है, किन्तु वहाँ मनुष्य की बुद्धि को सुसंस्कृत करने का कोई साधन उपलब्ध नहीं है। हमारी संस्कृति में मनुष्य की बुद्धि को सुसंस्कृत करने के लिये ‘धियो यो नः प्रचोदयात’, का वह अमूल्य साधन है, जो कि मनुष्य की बुद्धि को जागृत कर सन्मार्ग में प्रवृत्त करता है। सन्मार्ग में बुद्धि के प्रवृत्त होने से ही मनुष्य आत्मशान्ति और आत्म सन्तोष का अनुभव कर सकता है।
गायत्री भारतीय दर्शन की आत्मा है। इसे उच्च प्रेरणा का स्रोत माना जाता है। गायत्री में गहन ऊर्जा के साथ-साथ दिव्य चेतना भी निहित है, जो चेतना और ज्ञान से परिपूर्ण है तथा विभिन्न उद्देश्यों के लिए उपयोग की जाती है इसीलिए इसे ब्रह्मवर्चस कहा जाता है।
गायत्री मन्त्र के प्रणेता भगवान सूर्य हैं, जो अपने उपासक को सद्बुद्धि प्रदान करते हैं। गायत्री मंत्र में सद्बुद्धि की प्राप्ति के लिये प्रार्थना की गयी है। मनुष्य के जीवन में सद्बुद्धि की विशेष आवश्यकता है। सद्बुद्धि से ही मनुष्य अपना और संसार का कल्याण कर सकता है। जिस व्यक्ति में सद्बुद्धि का अस्तित्व होता है, वह सर्वदा उचित-अनुचित का उचित विचार कर आत्मकल्याण कर सकता है तथा जिस मनुष्य में सद्बुद्धि का अभाव होता है, वह आत्म कल्याण नहीं कर सकता। अतः मनुष्य में सबुद्धि का होना परम आवश्यक है। सद्बुद्धि की प्राप्ति गायत्री की उपासना से ही हो सकती है। अतः प्रत्येक साधक, शिष्य, भक्त अथवा मनुष्य को सद्बुद्धि की प्राप्ति हेतु गायत्री की उपासना करनी चाहिये।
गायत्री तु परं तत्त्वं गायत्री परमागतिः।
अर्थात्, गायत्री ही परम तत्त्व है और गायत्री ही परमगति है।
वेद भी उनकी स्तुति करते हुए कहते हैं-
श्वेतवर्णा समुद्दिष्टा कौशेयवसना तथा श्वेतविलेपनैः पुष्पैरलङ्कारैश्च भूषिता।
आदित्यमण्डलस्था च ब्रह्मलोकगताऽथवा अक्षसूत्रधरा देवी पद्मासनगता शुभा।।
‘माता गायत्री श्वेत रेशमी वस्त्रों से विभूषित, सफेद चन्दन, पुष्प और आभूषणों से शोभित, सूर्य मण्डल में स्थित अथवा ब्रह्मलोक में विराजमान, अपने हाथ में माला को धारण किये हुए पद्मासन में स्थित हैं। इस प्रकार की देवी का मैं ध्यान करता हूँ।’
एकाक्षर ब्रह्म है। एकाक्षर ब्रह्म स्वरूप ‘ऊँ’ में अ, उ और म ये तीन वर्ण हैं। ऊँ के प्रत्येक वर्ण की व्याख्या गायत्री का एक-एक पद है, जो कि ‘त्रिपदा गायत्री’ कही जाती है। त्रिपदा गायत्री के एक-एक पद से ही एक-एक वेद का प्रादुर्भाव हुआ, जो कि ‘वेदत्रयी’ रूप से परिणत हुए। अतः ‘ऊँ’ को वेदों का बीज और गायत्री को वेदों की माता कहा गया है। परमेष्ठी प्रजापति ने ऋग्वेद, यर्जुवेद और सामवेद से गायत्री का एक-एक पाद निकाला। इसलिये वह ‘त्रिपदा गायत्री’ कही जाती है।
वेदमाता गायत्री की साधना-आराधना का प्रभावः
‘गायत्री वै प्राणः’ अर्थात् गायत्री ही प्राण है। गायत्री मन्त्र का जप करने से पूर्ण प्राण की धारणा होती है।
‘गायत्री के प्रभाव से क्षत्रिय कौशिक (विश्वामित्र) ने विश्व का वशीकरण कर राजर्षि पद का त्याग कर ‘ब्रह्मषि’ पद प्राप्त किया और उन्होंने गायत्री के प्रभाव से ही अनेक उत्कृष्ट जगत् के निर्माण की अपूर्व शक्ति प्राप्त की। अतः जो साधक विधि पूर्वक गायत्री की उपासना करता है, उसे माता गायत्री सर्वस्व प्रदान करती हैं।’
सतुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्।
आयुः प्राणं प्रजां पशु कीर्ति द्रविणं ब्रह्मवर्चसं मह्यं दरवा व्रजत ब्रह्मलोकम्।।
‘वेदों की माता गायत्री अपने उपासक को दीर्घायु, स्वस्थता, सन्तति, यश, कीर्ति, गौ आदि पशु, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करती है तथा अन्त में ब्रह्मलोक में पहुँचाती हैं।’
गायत्री और सूर्य संबंधः
भारतीय ज्ञान परंपरा में गायत्री और सूर्य का संबंध केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चेतना, ऊर्जा और ब्रह्मांड की व्यवस्था का गहन दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रतीक है। गायत्री मंत्र को वेदों का सार कहा गया है और सूर्य को प्रत्यक्ष देवता जो जीवन, प्रकाश और ऊर्जा का स्रोत है। गायत्री और सूर्य (सविता) का संबंध अत्यंत गहरा और अभिन्न है, जिसे वैदिक संस्कृति में ‘सविता’ (सूर्य देव) को गायत्री मंत्र का देवता और ‘गायत्री’ को सूर्य की प्राण-शक्ति कहा गया है।
गायत्री मंत्र में वर्णित ‘तत्सवितुर्वरेण्यम्’, जिसके माध्यम से सूर्य (सविता) की उपासना की जाती है, जो जीवन, प्रकाश और ज्ञान के प्रदाता हैं। प्रत्येक साधक को गायत्री और सूर्य की उपासना अवश्य करनी चाहिये। जो साधक गायत्री और सूर्य की प्रतिदिन उपासना करते हैं, वे जीवन में अभ्युदय (सांसारिक उन्नति) और परलोक में निःश्रेयस (मुक्ति) को प्राप्त करते हैं।
गायत्री के 24 वर्णों के 24 ऋषि :
देवीभागवत में माता गायत्री के चौबिस वर्णों के चौबिस ऋषि बताये गये हैं, जो निम्नवत हैं-
गायत्री के 24 वर्णों की 24 शक्तियाँः
देवी भागवत में गायत्री के 24 वर्णों की 24 शक्तियों का वर्णन है जो इस प्रकार है-
‘1. वामदेवी, 2. प्रिया, 3. सत्या, 4. विश्वा, 5. भद्रविलासिनी, 6. प्रभावती, 7. जया, 8. शान्ता, 9. कान्ता, 10. दुर्गा, 11. सरस्वती, 12. विमा, 13. विशालेशा, 14. व्यापिनी, 15. विमला, 16. तमोऽपहारिणी, 17. सूक्ष्मा, 18. विश्वयोनि, 19. जया, 20. वशा, 21. पद्मालया, 22. पराशोभा, 23. भद्रा और 24. त्रिपदा। ये 24 वर्णों की 24 शक्तियाँ कही गयी हैं।’
गायत्री के 24 वर्णों के 24 तत्व:
देवीभागवत में गायत्री के 24 वर्णों की 24 तत्वों का वर्णन है जो इस प्रकार है-
गायत्री और ओङ्कार का संबंधः
गायत्री को प्रकृति और ओंकार को पुरुष कहा है। गायत्री और ओंकार के संयोग होने से समस्त संसार की उत्पत्ति होती है।
गायत्री साऽभवत् पत्नी प्रणवोऽभूत् पतिस्तदा।
पुनरन्योन्यदाम्पत्यादिति ताभ्यामभूज्जगत्।।
गायत्री स्त्री हुई और प्रणव पति हुआ। इन दोनों के दाम्पत्य-भाव से संसार की उत्पत्ति हुई।’ अतः प्रत्येक साधक को ओंकार को पिता और गायत्री को माता समझना चाहिये।
आधुनिक ‘क्वांटम भौतिकी’ भी यही कहती है कि ब्रह्मांड की हर वस्तु ऊर्जा और कंपन का रूप है। ओंकार (‘ऊँ’) और गायत्री मंत्र दोनों इस कंपन में गहराई से जुड़े हैं। इन दोनों के उच्चारण से उत्पन्न कंपन साधक के चेतना को ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ने का माध्यम बनाता है। गायत्री मंत्र को ‘वैज्ञानिक प्रार्थना’ कहा जाता है। इसमें सूर्य की ब्रह्मांडीय ऊर्जा को बुद्धि और आत्मा के प्रकाश से जोड़ा गया है।
ओंकार और गायत्री मंत्र केवल धार्मिक ध्वनियां नहीं, बल्कि क्वांटम चेतना को जाग्रत करने वाले ऊर्जा-कोड हैं।
जहाँ ‘ऊँ’ हमें शून्य और समग्रता से जोड़ता है, वहीं “गायत्री”हमेंप्रकाशऔरबुद्धिकीदिशामेंप्रेरितकरतीहै।इनदोनोंकासंगममानवचेतनाकोक्वांटमब्रह्मांडकेसाथएकाकारकरदेताहै।
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