





किसी अप्सरा की चर्चा हो, और उसमें रम्भा का नाम न आये, यह तो सम्भव ही नहीं है, क्योंकि रम्भा 108 अप्सराओं की श्रेणी में से सर्वश्रेष्ठ पद पर आसीन है। जिसके रूप-सौन्दर्य को देखकर देवता भी मंत्र-मुग्ध से खड़े रह जाते हैं और उसकी मादक व आकर्षक देह दृष्टि से प्रस्तुत नृत्य को देखने के लिये वे हर क्षण व्याकुल रहते हैं और यदि वह अपनी मनमोहिनी मुस्कराहट से उन्हें मोहित कर अपने रूप-जाल में जकड़ ले, तो वे देवता अपने-आप को गौरवान्वित अनुभव करने लगते हैं।
ये तो देव लोक की बातें है, किन्तु एक पृथ्वी लोक का प्राणी भी उसके रूप-सौन्दर्य का पान कर सकता है और इस सौन्दर्य की साक्षात स्वरूपा को मंत्र-शक्ति के बल से प्रत्यक्ष इन स्थूल आंखों से भी देख सकता है तथा उसके द्वारा जीवन में वह सब कुछ प्राप्त कर सकता है जिससे उसका जीवन सुखमय व सम्पन्नता युक्त बन सके।
यह सत्य मुझे तब ज्ञात हुआ, जब मैंने उसका साक्षात्कार किया और वह भी उड़ीसा के एक मंदिर में, जहां एक बाबा हर क्षण तपस्या में लीन रहते हैं और एक सुन्दर युवती ही उस मंदिर में बाबा की देख-रेख करती है, ऐसा ही सुना था मैंने कुछ लोगों से। मेरी भी जिज्ञासा हुई कि मै उस मंदिर में जाकर उनके दर्शन करूं, यही सोचकर में उस मंदिर में पहुंचा। उस समय तेज वर्षा हो रही थी और घने बादलों के बीच सूर्य-दर्शन की कोई सम्भावना नहीं थी, किन्तु मेरी औतसूक्य प्रवृत्ति ने मुझे ऐसी मूसलाधार वर्षा में भी मंदिर जाने के लिये विवश कर दिया था… जैसे कोई मुझे खींच रहा हो।
मैंने देखा कि एक अत्यन्त रूपवती युवती बाबा के साधना मंदिर की एकमात्र संरक्षिका थी, इस मंदिर की एक विशेषता यह थी कि यहां किसी भी प्रकार की मादक वस्तु का सेवन निषिध था और बाबा की आज्ञा के बिना कोई भी व्यक्ति वहां दो दिन से अधिक नहीं रूक सकता था। ऐसा ही उस युवती ने मुझे बताया, और देखते ही देखते वह मेरी आंखों से ओझल हो गई। तभी मेरी दृष्टि उस मंदिर के ठीक सामने बनी एक अत्यन्त आकर्षक प्रतिमा पर पड़ी, चारों और नील, पीत, वासन्ती और रक्त जवा पुष्पों ये वह प्रतिमा और वह युवती दोनों एक ही जैसे रूप-वर्ण के एक ऐसे रहस्य को प्रकट कर रहे थे, जिसका अनुभव स्वयं में एक रहस्य था। वह निस्सन्देह एक दिव्य, मनोमुग्धकारी अतीन्द्रय अनुभूति थी।
यह एक सबसे बड़ा रहस्य था मेरे लिये, जिसे मैंने पहली बार परिलक्षित किया। वह यह कि उस मूर्ति में और उस युवती की मुखाकृति में अद्भूत साम्य था, दोनों का मुख मानो एक ही सांचे में ढाला गया हो।
मंदिर में कोई नहीं था, मैं मंदिर में स्थित भगवान की मूर्ति के सामने नमन कर ज्यों ही उठने को हुआ अचानक मस्तक पर एक अत्यंत कोमल, सुखद हाथ का स्पर्श हुआ तथा वातावरण और भी सुगन्ध व मादकता से भर गया। मेरे सामने अत्यन्त दिव्य रूप वाले, लम्बी-लम्बी दाढ़ी और गैरिक वस्त्र से सुशोभित, रूद्राक्ष, स्फटिक, मोती, मूंगा और वैजयन्ती माला से विभूषित एक बाबा, नील कांतिमय आभा बिखेरते हुये अभय मुद्रा में खड़े मुस्करा रहे थे।
मैं आत्म-विभोर कब तक बाबा के चरणों में लेटा रहा, कुछ स्मरण नहीं, किन्तु जब उठा तो वहां बाबा नहीं थे, वही एक अपूर्व सौन्दर्यमयी युवती मेरे सामने खड़ी थी, उस मूर्ति की अविकल प्रतिछवि में उसे देखकर आनन्द-विभोर हो उठा और तभी मुझे एक चमत्कारिक अनुभूति हुई। आंख बंद करता तो वे बाबा नजर आते, और आंखे खोलता तो वह युवती….. और कभी-कभी बंद आंखों में भी उस युवती…… और कभी-कभी बंद आंखों में भी उस युवती की प्रतिमा और पुनः आंखे खोलने पर बाबा के होने लगते….. यही क्रम कुछ क्षणों तक रहा।
यहीं से उस मंदिर की प्रथम अनुभव मेरे विश्वास और भक्ति, प्रेम और साधनों के लिये पर्याप्त हो गया था। मैं आंखे बन्द किये ही बाबा के चरणों में बहुत समय तक आंसू बहाता रहा। कण्ठ अवरूद्ध हो गया था, कुछ कह नहीं पा रहा था, यकाएक तभी कानों में एक वीणा विनादित स्वर पुनः सुनाई पड़ा- ‘‘यहां अखण्ड आनन्द और अमृत है, सम्पूर्ण सुख व आनन्द की साधना है तुम निर्मल हो निष्ठापूर्वक तप से तुम्हारे भीतर के संचित कर्मों की राशि उस युवती के नेत्रों की करूणामय अश्रु धारा में लुप्त हो जायेगी, और तुम अधिकारी बन सकोगे अखण्ड प्रेम और आनन्द के! उठो, आंखे खोलो………!
मैंने आंखे खोलीं, सामने अब न कोई मूर्ति थी और न वह युवती। एक व्याघ्र चर्म था, जिस पर बाबा पद्मासन लगाये बैठे मुस्करा रहे थे। एक अपूर्व दिव्य मुस्कराहट, एक अपूर्व दिव्य मुस्कान थी वह। उन्होंने मुझे अपने नजदीक आने को कहा और बोले-मैंने ही तुम्हारे अंतः मन को जाग्रत कर तुम्हें यहां आने के लिये विवश किया था क्योंकि मेरा और तुम्हारा पूर्वजन्म का सम्बन्ध रहा है। उस समय मैं तुम्हारा गुरू था और तुम मेरे शिष्य, मैं तुम्हारे भक्ति, प्रेम और समर्पण में बंध गया था और तब मैंने तुम्हें एक मनोकामना मांगने के लिये कहा था, किन्तु किसी कारणवश मै। उसे पूरा न कर सका। और यही कारण है कि मैंने इस जन्म में तुम्हें अपने उस वचन को साकार करने के लिये ही अपनी मंत्र-शक्ति के बल से यहां खीचा है। पर मेरे मन में अब उस रूपसी युवती के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त कर लेने की अभिलाषा शेष नहीं रह गई थी, क्योंकि उसके सौन्दर्य ने मुझे मंत्र – मुग्ध जो कर दिया था। बाबा ने जैसे मेरी अभिलाषा को पढ़ लिया हो, वे काल्पनिक मुस्कान से मुस्कराए और उस युवती का रहस्य मेरे सामने खोला और कहा-यह ‘रम्भा’ हैं, जो इन्द्र लोक की अप्सरा है। एक विशेष-मंत्र प्रयोग द्वारा मैंने एक रूपसी की मूर्ति बनाकर मंदिर के सामने उसे कीलित कर दिया था और तभी से यह सिद्धि रूपा, अपूर्व सौन्दर्य की स्वामिनी मेरे जीवन के सभी कार्यो को पूरा करती है, जिसकी वजह से मैं इतने वर्षों से यहां बैठा तपस्यारत हूं। इसने मुझे सारी सुख-सुविधाओं से पूर्ण किया है, क्योंकि इस अप्सरा साधना को इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु ही किया जाता है, जिससे कि जीवन की दरिद्रता और अभाव समाप्त हो सकें, तथा एक ओजस्वी और सौन्दर्य युक्त शरीर का निर्माण हो सके, जो कि इसी साधना के द्वारा सम्भव था और मैं ही नहीं इसे कोई भी कीलित साधना सम्पन्न कर सिद्ध कर सकता है।
यह विद्या सामान्य मानव के लिये एक गोपनीय बात होगी, क्योंकि झूठे लोगों के अन्धविश्वास के कारण मानव-मन में मंत्र-शक्ति के प्रति आस्था और विश्वास खत्म हो चुका है, किन्तु मैं चाहता हूं कि तुम इस साधना को सिद्ध कर जन-मानस में फैली भ्रांतियों को दूर कर सको।
उन्होंने मेरे मन की अभिलाषा जानकर और अपनी इच्छा को प्रकट कर, कमण्डल से गंगाजल निकाल कर मेरे ऊपर छिड़का। बाबा का ऐसा करना था कि मेरा सारा शरीर रोमांचित हो उठा, मन में एक कल्पनातीत अपूर्व अनुभूति होनी शुरू हो गई और साथ ही समस्त शरीर में अविस्मरणीय पुलकन, परिवर्तन….बाबा ने कुछ संस्कृत मंत्रों के अक्षर मेरे कानों में फूंके और मैं ध्यानस्थ हो गया, मैं उसी मंत्र को एक स्वर से दोहराता जा रहा था।
मुझे कुछ भी सुध-बुध नहीं थी, केवल अलौकिक, दिव्य नीले प्रकाश के भीतर से फूटती शुभ्र किरणें और उस मंत्र को दोहराती न थकती मेरे भीतर की जाग्रत-शक्ति। मैं जब अपनी इस अवस्था में पहुँच चुका था, तभी कुछ समय पश्चात् पुनः समस्त शरीर में एक आनन्ददायक स्फुरण हुआ…. मेरे सामने वही प्रत्यक्ष सौन्दर्य की प्रतिमान मूर्ति विराजमान थी और उस साधना को सिद्ध कर मैंने देखा कि वह दिव्य नील वस्त्रालंकारों से अलंकृत हो मेरे सामने प्रत्यक्ष खड़ी थी, मेरे जीवन के समस्त अभावों को समाप्त करने के लिये मुझे सुख, समृद्धि व सम्पन्नता प्रदान करने के लिये। कैसा अद्भूत आश्चर्य था मेरे जीवन का यह… मैंने अपनी इस अभिलाषा की पूर्ति के बाद बाबा के चरण-कमलों को प्रणाम किया और उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त कर घर लौट आया….. मैंने देखा कि जब मैं किसी दुविधा में फंसा होता, तो वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में उसे दूर कर देती, उसने तो मेरे पूरे जीवन को ही संवार दिया था… और साथ ही मुझे सौन्दर्यशाली व्यक्तित्व प्रदान कर मेरे नीरस और बेस्वाद जीवन को भी अपने प्रेम और मधुर वार्तालाप से रसमय व आनन्द युक्त बना दिया था। यह साधना अपने-आप में अद्वितीय एवं सटीक है इसलिये इसे यथा सम्भव हर साधक को करने का प्रयास करना ही चाहिये।
अपनी इस प्रामाणिक सिद्धि को मैं जन-सामान्य के समक्ष रख रहा हूं, क्योंकि यह ‘‘रम्भा अप्सरा कीलन स्थायित्व साधना’’ है, जिसे कोई भी साधक पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ सम्पन्न कर अपने जीवन को सुन्दरता, प्रेम, आनन्द और सौहार्द से परिपूर्ण कर सकता है। इस साधना को सम्पन्न कर साधक अपने इस मानवीय जीवन में देव तुल्य बन सकता है और मन को हरण करने वाली ‘रम्भा’ के प्रत्यक्ष दर्शन कर जीवन के सभी मनोरथों को पूर्ण कर सकता है।
साधना विधि-यह साधना रात्रिकालीन है। साधक स्नानादि से निवृत्त होकर के पीली धोती पहिन लें तथा पीले आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठ जाये और अपने सामने चौकी पर पीला कपड़ा बिछा लें। एक प्लेट में ‘विशिष्ट रम्भा यंत्र’ को स्थापित करके अक्षत, पुष्प, धूप व दीप से यथाविधि पूजन सम्पन्न करें। उस यंत्र के दायें-बायें दोनों ओर पीले चावल की दो ढेरियां बनाकर उनके ऊपर दोनों ‘रम्भायुक’ स्थापित कर दें।
साधक गुलाब की पंखुड़ियों से अपनी अंजुलियों को भरकर खड़े हो जायें और आह्वान मुद्रा में पांच मिनट तक आसन पर खड़े होकर गुरू मंत्र का जप करें। बाद में उन पंखुड़ियों को ‘विशिष्ट रम्भा यंत्र’ पर चढ़ा दें। इसके बाद ‘रम्भा माला’ से निम्न मंत्र का ग्यारह माला मंत्र जप करें।
साधकों को चाहिये कि साधना करने से पूर्व अपने साधना कक्ष को स्वच्छ एवं सुगन्धित कर लें, क्योंकि अप्सरा साधनाओं में यह सबसे आवश्यक प्रक्रिया है। अपने -आप को भी इत्र लगा लें, वस्त्रों में यदि आप धोती न पहिनना चाहें, तो सफेद पायजामा-कुर्त्ता भी पहिन सकते हैं।
मंत्रः-
।। ऊँ ह्रौं रम्भा उर्वश्यै मम आज्ञां पालय वशमानाय ह्रौं फट्।।
(Om Hroom Rambha Urvarshe Mam Aagyaam Palya
Vashmaanay Hroom Phat)
साधक किसी भी शुक्रवार या रविवार को यह साधना सम्पन्न कर सकते हैं, यदि प्रथम बार में साधना में सफलता न मिले, तो इन्हीं यंत्र और माला से तीन बार साधना सम्पन्न की जा सकती है। तीन बार साधना करने के बाद यंत्र, माला व अन्य सामग्री को एक वस्त्र में बांध कर किसी नदी या कुएं में विसर्जित कर दें।
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