





भगवान विष्णु के अवतार देवर्षि नारद विभिन्न लोक जिनमें पृथ्वी, आकाश और पाताल लोक शामिल है उनकी यात्रा कर देवी-देवताओं तक संदेश व संवादों का आदान-प्रदान किया करते हैं। भगवान विष्णु की विशेष कृपा से उनके परम भक्त अजर-अमर नारद मुनि सभी लोकों में कहीं भी प्रकट हो सकते हैं। देवर्षि नारद अपने भक्तों का मार्गदर्शन नारायण (भगवान विष्णु) के प्रति निष्काम प्रेम, पूर्ण समर्पण और भगवत साधना के द्वारा करते हैं। ये साधकों एवं भक्तों को अहंकार त्यागकर, सांसारिक मोह-माया से विरक्त रहने और जीवन के हर क्षण में ईश्वर का स्मरण करने की शिक्षा देते हैं।
सदा ही ‘नारायण-नारायण’ का जप करने वाले नारद मुनि द्वारा दी गई सूचनाओं से भले ही कई बार तात्कालिक रुप से देवताओं या असुरों के बीच तनाव पैदा हो जाता था परन्तु अंत में उसका परिणाम सदा ही सृष्टि के कल्याण और सत्य के विजय के रुप में ही निकलता था। देवर्षि नारद के साधना-पूजन से साधक को बेहतर संवाद कौशल, वाक्चातुर्यता, ज्ञान, बुद्धिमता का आशीर्वाद प्राप्त होता है साथ ही जो भी साधक नाट्य कला, संगीत, काव्य, रंगमंच से जुड़े हैं वे “महर्षि नारद वाक् कला सिद्धि दीक्षा” प्राप्त कर अपने क्षेत्र में पूर्णतया दक्ष बन अपार सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
“श्री नारद वाक् कला शक्ति साधना” सम्पन्न कर साधक प्रखर बुद्धि, मंत्रमुग्ध कर देने वाली वाक् शक्ति से युक्त होता है जिससे सामने वाले व्यक्ति प्रभावित हुये बिना रह ही नहीं सकते, व साधक कला के हर क्षेत्र में सफल सिद्ध होते ही हैं साथ ही तनाव रहित, अहंकार मुक्त, लोभ-लालच से अनासक्त होकर सरल जीवन मार्ग की ओर अग्रसर होते हैं।
श्री विष्णु पूजन:
साधक पहले पवित्रीकरण की क्रिया सम्पन्न करें। तत्पश्चात् भगवान विष्णु का ध्यान करते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।
तुलसीदल अर्पणः
ऊँ इदं विष्णोर् विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्।
समूढ़मस्य पा (गूं) सुरे स्वाहा।।
तुलसीं हेमरूपां च रत्नरूपां च मञ्जरीम्।
भवमोक्षप्रदां तुभ्यमर्पयामि हरिप्रियाम्।।
श्री नारायण नारद वाक् कला शक्ति साधनाः
साधना सामग्रीः वाक् कला सिद्धि यंत्र, श्री नारायण शक्ति माला तथा शक्ति चक्र
साधना विधानः साधक सर्वप्रथम प्रातः काल स्नानादि से निवृत्त हो जायें तथा गुरु पूजन सम्पन्न कर, गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप संपन्न करें। तत्पश्चात् साधक को चाहिये कि वह शक्ति चक्र पर कुछ समय तक त्राटक का अभ्यास करे।
यंत्र तथा माला को ताम्र पात्र में रख कर धूप, दीप, पुष्प, अक्षत तथा नैवेद्य अर्पित करें। फिर पूज्य सद्गुरुदेव से प्रार्थना करें कि हे सद्गुरुदेव! मैं अपने जीवन में बेहतर संवाद कौशल, वाक्चातुर्यता, ज्ञान, बुद्धिमता को आत्मसात करने हेतु यह साधना कर रहा हूँ अतः आप मुझे आशीर्वाद दें जिससे मैं रचनात्मकता, नाट्य कला, संगीत, काव्य, रंगमंच आदि में श्रेष्ठता से अग्रसित हो सकूं। साधक ‘श्री नारायण शक्ति माला’ से निम्न मंत्र का सात माला मंत्र जप 14 दिनों तक करे।
मंत्र
।। ऊँ नमोः भगवते नारायणाय तत्वाय तन्नो नमो नमः।।
Om Namo Bhagwate Narayanay Tatvay Tanno Namo Namah
साधना समाप्ति के बाद गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप तथा विष्णु आरती सम्पन्न करें। यंत्र को अपने साधना स्थली में ही रहने दें तथा जब भी आप रंगमंच अथवा किसी भी कार्यक्रम में जायें तो तेजस्वी ‘श्री नारायण शक्ति माला’ को गले में अवश्य धारण कर लें।
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