





आकर्षण ही कृष्ण का सबसे प्रबलतम स्वरूप है। श्रीकृष्ण हमारी संस्कृति के एक अद्भुत एवं विलक्षण महानायक हैं जिसकी तुलना न किसी अवतार से की जा सकती है और न ही संसार के किसी महापुरुष से। भगवान श्री कृष्ण का आकर्षण संसार की समस्त माया को भेदने में समर्थ्य है। उनके जीवन के प्रत्येक कार्य में, प्रत्येक घटना में ऐसा विरोधाभास छिपा होता है जो साधारणतः समझ में नहीं आता है।
इस प्रकार की सुस्थितियाँ प्रबल आकर्षण और सम्मोहन के फलस्वरुप ही व्याप्त हो पाती हैं। प्रत्येक कार्य-व्यापार, संप्रेषण कला, साक्षातकार, किसी प्रकार का वाद-विवाद, भाषण और यहाँ तक कि आम बोल-चाल में भी हमारे वाणी में, हमारे कार्य में, हमारे व्यवहार और व्यक्तित्व में सम्मोहन व्याप्त होना अत्यंत आवश्यक है। जब हम इस प्रकार की स्थितियों से युक्त हो सकेंगे तब ही हमें प्रत्येक क्षेत्र में, प्रत्येक कार्य में पूर्ण रुपेण सिद्धि मिल सकेगी।
वर्तमान युग का मनुष्य पूर्णतः भाग-दौड़ तथा जीवन के तमाम प्रकार के गतिविधियों में इतना उलझ चुका है कि उसे इन व्यक्तित्वों को विकसित करने का समय ही नहीं मिल पाता है। परन्तु इस आधुनिकता में, इस प्रकार की क्षमताओं को विकसित करना परम आवश्यक है। अतः प्रथमतः तो एक रास्ता ये है कि साधक स्वयं ही इन स्थितियों के निर्मित करने हेतु आगे बढ़े परन्तु आज के युग में स्वयं इस प्रकार की चेतना को प्राप्त कर पाना असंभव सा प्रतित होता है।
दूसरा विकल्प यह है कि साधक को इन शक्तियों से युक्त, मंत्र सिद्ध, चैतन्य वस्तु प्रदान की जाये जिसे ग्रहण करने मात्र से ही साधक के अन्दर वह समस्त शक्तियाँ व्याप्त हो जाये जिसकी उसे नितान्त आवश्यकता है।
यह कृष्ण जन्माष्टमी इस प्रकार की ही ‘कृष्णत्व सम्मोहन कला युक्त कार्य सिद्धि’ का क्षण है जब साधक इस गुटिका को आत्मसात कर पूर्णतः सम्मोहन कला से परिपूर्ण होते हुये कार्य सिद्धि से युक्त हो सकता है।
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