





कैसी रही होंगी राधा, जो अपने जीवन में भगवान श्री कृष्ण जैसे अद्वितीय युग पुरूष ही नहीं भारतीय संस्कृति के सर्वाधिक सांस्कृतिक व्यक्तित्व की अभिन्न हृदया बन बैठीं। कैसी रहीं होगी उनकी छवि, कैसा रहा होगा उनका रूप माधुर्य और कैसी रही होगी उनकी कोई अनूठी बात कि भगवान श्रीकृष्ण की वे वक्षस्थलस्थिता बनीं, उनकी प्राण स्वरूपा बनीं और श्रीकृष्ण की पूर्णत्सव सी बन उठीं।
आंखों के सामने एक चित्र सा खिंच जाता है कि वे कोई गौर वर्ण की दुबली पतली, तीखी नासिका और अत्यंत भोली मुखमुद्रा लिये ऐसी ब्रज की नारी हैं जिनके चेहरे पर तो स्मित हास्य है और आंखों में केवल और केवल श्रीकृष्ण। जो अपने घने और सुंदर बालों की जल्दी-जल्दी में यों ही कोई चोटी सी गूंथ उसे पीठ पर फेंक घर से बाहर दौड़ कर आ गई हैं क्योंकि उन्होंने किसी को ‘कृष्ण’ कहते जो सुन लिया! भोली भाली वे क्या जाने कि कोई उनका यों ही नाम ले उठा था, पर उनके तो प्राण हर क्षण प्रतीक्षा में जो लगे रहे।
भारतीय जीवन की जो सबसे मधुरतम यादें हैं उसके इतिहास के जो सबसे काव्यात्मक पृष्ठ हैं वे भगवान श्री कृष्ण और राधा को लेकर ही तो हैं, प्रेम की अनूठी बानगी, मिलन की अनोखी अदा, दोनों को लेकर यदि उनके जीवन के एक एक क्षण कहे जायें तो उससे सुंदर कोई महाकाव्य हो ही नहीं सकता। क्या नारी सौन्दर्य और क्या पुरूष सौन्दर्य और फिर प्रेम का सौन्दर्य सभी कुछ उनके वर्णन में उसी कदम्ब वृक्ष की तरह फूलों से भर जाता है जिसे कहतें कि वह किसी सौन्दर्यवती की पदाघात से ही फूलता है, भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ प्रकृति भी सौन्दर्य बोध से ही भर उठी!
ऐसी कोमल प्रेमी की जीवन संगिनी राधा यूं ही नहीं बन गयीं। उनके हृदय की तड़फ, प्रेमिका की विरह और नारीत्व की मधुरता के साथ ही साथ उनके पास कोई विशिष्ट साधना भी थी। राधा ने अपने जीवन में एक-और केवल एक ही साधना की और वह थी ‘प्रिय वश्य साधना’। उन्होंने इसी साधना को अपने आंठों से अपने शरीर और अपने प्राणों में उतार लिया वे डूब गयी इस साधना में अपनी सुन्दर आंखों को बड़ी-बड़ी पलकों से तो बंद कर लिया, उनके ओंठ भी सिल उठे और सच तो यह है कि उन्हें ओठों की आवश्यकता फिर रही कहा, उनके तो शरीर के रोम-रोम ने इस मंत्र का जप किया। उनके सहस्त्र रोम ही सहस्त्र मुख बन गये।
उन्होंने पाना चाहा कृष्ण को प्रेमिका बन कर पर मन नहीं भरा वे और आगे बड़ी उन्होंने कृष्ण को उतार लिया अपने जीवन में उनकी पत्नी बन कर, पर प्रेम में तो पाने की इच्छा कभी जाती ही नहीं, फिर तो शेष रह गये उनके प्राण और उन प्राणों ने उनकी देह से अधिक तीव्र नृत्य कर श्रीकृष्ण को प्राप्त कर लिया पुरूषोत्तम रूप में।
इसी से आज राधा का नाम अमर है। उनके नाम का स्मरण, उच्चारण पवित्रता और मिठास की नदी बह जाने जैसा है। प्रेम की वे जैसी मिसाल बनी वैसी तो अब कभी होगी ही नहीं और इसी से आज वे भगवान श्री कृष्ण से पूर्व स्मरण की जाने वाली बन बैठीं।
उन्होंने जीवन में जिस मंत्र का जप किया वह मंत्र था-
।। ऊँ पूर्ण प्राप्य प्रियं वै ऊँ ।।
।। Om Purna Prapya Priyam Vai Om।।
यह कोई साधना के आसन पर बैठ कर जप जाने वाला मंत्र नहीं। यह अहर्निश जपा जाने वाला मंत्र है शरीर के रोम-रोम से जपा जाने वाला मंत्र है यह प्रेम का मंत्र है और प्रेम तो भला ओठों से कहने की बात की कहां?
इस साधना में जिस आवश्यक माला को कंठ में धारण किया जाता है उसको इसी साधना के ही अनुरूप ‘‘प्रिय वश्य माला’’ कहा गया है, अर्थात् प्रिय को वश में कर लेने की कला।
इसी साधना से, इसी मंत्र से कोई भी प्रेमी अपनी प्रेमिका को या कोई भी प्रेमिका अपने प्रेमी को पूर्णता के साथ निश्चय पूर्वक प्राप्त कर ही लेता है, क्योंकि यह अपने आप में विलक्षण उच्च एवं दिव्य साधना है।
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