





यदि जीवन के चारों पुरूषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को प्राप्त करना है तो सर्वप्रथम जीवन के सभी ऋणों से मुक्त होना पड़ेगा। जीवन में अनेक प्रकार के ऋण होते हैं लेकिन मानव जीवन सबसे अधिक प्रभावित जिस ऋण से होता है, वह पितृ ऋण है। जिससे मुक्त होना प्रत्येक व्यक्ति के लिये आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।
यह सही है कि आत्मा अविनाशी होती है, पर आत्मा का निवास देह में होता है और मनुष्य के जन्म में आत्मा जिस देह को धारण करती है उस देह के साथ-साथ आस-पास के वातावरण, परिवार, सगे-सम्बन्धियों, संतान इत्यादि से लगाव होना स्वाभाविक है। मनुष्य की कामनाएं, देह की कामना के साथ-साथ, मन की कामनाएं भी होती है, क्योंकि मन, प्राण, आत्मा ही देह को संचालित करते हैं। मूल रूप से संचालक तो मन, प्राण, आत्मा है।
हर व्यक्ति के जीवन में सारी ईच्छायें पूर्ण नहीं होती हैं। वह अपने जीवन में अतृप्त रहता है, कई बार सांसारिक दुःखों, व्याधियों के कारण उसकी मन-आत्मा पर एक बोझ आ जाता है। यह बोझ किसी न किसी कमी का हो सकता है, व्यवहार अर्थात् झगड़े का हो सकता है अथवा अपने से जुड़े हुये लोगों के साथ अतिप्रेम का भी हो सकता है। जब मनुष्य बोझ मुक्त नहीं होता है तो मरते समय असीम पीड़ा का अनुभव करता है और उसकी आत्मा मुक्त नहीं हो पाती। न तो वह परमात्मा में मिल पाती है और न ही कोई नया गर्भ या जीव को धारण करती है।
श्राद्ध के अभाव में हमारे पूर्वज मृत्यु के पश्चात पिशाच योनि धारण कर पृथ्वी पर भटकते हैं, जिस कारण उन्हें अनेक कष्टों का अनुभव होता है। उन्हें उनके कुल-वंश में जन्मे वंशजों से यह आशा होती है कि वे उनकी मुक्ति का कोई सहज उपाय अवश्य ही ढूंढ निकालेंगे। उनके उत्तराधिकारी या वंशजों द्वारा पितृ शांति उपाय करने से उन्हें अत्यंत प्रसन्नता होती है तथा वे अपने वंशजों को शुभाशीर्वाद प्रदान करके चले जाते हैं। परन्तु इसी के विपरित यदि हमारे पूर्वजों की पितृ शांति नहीं की जाती है तो ये अतृप्त आत्मायें अपने कामनाओं तथा ईच्छाओं की पूर्णता हेतु गतिशील रहती हैं।
पितृ दोष का सबसे बड़ा नुकसान भाग्य की हानि है। कभी कभी कोई काम पूर्णता के पथ पर अग्रसर होने के बाद भी पुनः शून्य पर आ जाता है। व्यक्ति के शत-प्रतिशत मेहनत करने के उपरान्त भी उसके परिणाम के लिए भाग्य पर निर्भर रहना पड़ता है। फिर वह भाग्य रेखा भी उसे धोखा दे देती है। इसके अलावा माता-पिता तथा परिवार में कुछ वैचारिक मतभेद होना। पति-पत्नी तथा परिवार में निरन्तर कलह, लड़ाई-झगड़ा, संतान कुगामी पथ पर अग्रसर होता है, लाईलाज रोग-व्याधि-कष्ट-पीड़ायें व्याप्त होना तथा स्वप्न में भूत-प्रेत भय-डर आदि कुस्थितियां भी देखने को मिलती है। इस दोष के कारण जीवन में सफलता नहीं मिलती, धन का अभाव व कर्ज युक्त जीवन बना रहता है।
पितृ दोष के कारण ही वैवाहिक दम्पत्ति को संतान से संबंधित समस्यायें व्याप्त होती हैं। कभी-कभी संतान होने में देरी होती है, तो कभी-कभी गर्भवति स्त्री का गर्भ नष्ट हो जाता है अथवा बच्चा अल्पायु, अपंग तथा मृत्यु के तरफ भी अग्रसर हो जाता है। यह पितृ दोष का सबसे बड़ा नकारात्मक प्रभाव है।
पितरों के लिये पूजन, साधना व दीक्षा सम्पन्न करने के कई प्रमुख लाभ हैं। आपके पूर्वज या पितृ के कारण ही आपको यह भौतिक शरीर की प्राप्ति हुई है, यह मानव देह प्राप्त हुई। यह आपके ऊपर उनका ऋण है, पितृ ऋण है और अगर आप साधना के माध्यम से उनके पुनर्जन्म का मार्ग प्रशस्त करते हैं तो जीवन में सुस्थितियां आती ही हैं। अत: पितृ दोष के बुरे प्रभाव को कम करने के लिये ही यह पूजा-साधना-दीक्षा ग्रहण की जाती है। इसलिये यह प्रत्येक के लिये आवश्यक है कि वह इन आत्माओं को शांति दिलाने का प्रयत्न करें। जिससे जीवन में पितृ रूपी बाधाओं का सामना ना करना पड़े। इस हेतु आप पितृ अमावस्या तक सद्गुरुदेव से फोटो द्वारा या व्यक्तिगत रूप से दीक्षा प्राप्त कर सकते हैं।
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