





शिष्य का लक्षण, शिष्य का चिन्तन, शिष्य का विचार, शिष्य बनकर सेवा मैंने की है। इसलिये मैं गर्व के साथ शिष्य के लक्षण और शिष्य के चिन्तन सुना सकता हूं, समझा सकता हूं।
तुम्हारे पास केवल तीन रास्ते हैं, जिससे तुम लोहे से कुन्दन बन सकते हो, और वह है सेवा, समर्पण और श्रद्धा और इन सबका समन्वय है- प्रेम।
ध्यान लगाने से आत्मा परमात्मा में विलीन नहीं हो सकती है। आत्मा मंत्र जप से परमात्मा में लीन नहीं हो सकती, क्योंकि आत्मा का परमात्मा तक पहुंचने का जो रास्ता है वह वेदना है, तड़फ का है, विरह का है, समुद्र में डूब जाने का है।
जब आंखों से बहकर आंसू गालों पर लुढ़कने लगे तथा उन आंसुओं से गुरू चरणों को प्रक्षालित करोगे, तब समझ लेना कि तुमने गुरू के दर्शन कर लिये। उस तड़फ में, आसुओं की झिलमिलाहट में निहारोगे, तो तुम्हें गुरू सामने ही मंद मंद मुस्कुराते हुए साफ साफ दिखाई दे जायेंगे।
समुद्र तो बाहें फैलाए रहता हैं, नदी वेग से आती है… और बीच में रूकावट आती है, पर वह नदी रूकती नहीं…. गांव आते हैं, तो गांव को बहा देती है…. समाज, किनारे के अन्दर नदी को बांधने की कोशिश करता है, तो नदी उन किनारों को तोड़ देती है। नदी तो तेजी से भागती है, अपने प्रियतम से मिलने….और जिस क्षण समुद्र में विलीन हो जाती है, बिल्कुल शान्त हो जाती है, तब उसकी लहरों से संगीत फूट पड़ता है, जिसे साधना और शिष्यता की पूर्णता कहा है, ब्रह्म की उपलब्धि कहा है।
प्रेम का तात्पर्य है ईश्वर, और जब तक प्रेम के रस में भीगोगे नहीं, ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती, गुरूदेव से साक्षात्कार नहीं हो सकता… और यह अन्दर उतर कर प्रभु से साक्षात करने की क्रिया ही तो प्रेम है।
समुद्र खुद आगे चलकर गंगोत्री के पास नहीं जायेगा, कि गंगा तुम आओ मुझे मिल लो, गंगोत्री से गंगा खुद उतर कर समुद्र तक जायेगी। उस गंगा को जाना है समुद्र तक, यदि गंगा नहीं जायेगी, बीच में सूख जायेगी, तब भी समुद्र अपनी जगह को नहीं छोड़ेगा। समर्पण तो शिष्य को ही करना पड़ेगा।
यदि कोई शिष्य चाहे, कि मैं गुरू को हृदय में समेट लूं, गुरू को अपने जीवन में पा लूं, गुरू को अपने में आत्मसात कर लूं और यदि उसके हृदय में प्रेम की सरिता नहीं है, यदि उसके हृदय में प्रेम-नहीं है, तो वह अपने जीवन में, अपने हृदय में प्रेम की सरिता नहीं है, यदि उसके हृदय में प्रेम-रस नहीं है, तो वह अपने जीवन में, अपने हृदय में गुरू को उतार भी नहीं सकता।
जुदाई तो अपने आप में एक तपस्या है, किसी का इंतजार है, अपने आप में पूर्ण साधना है। किसी को याद करना, किसी के चिन्तन में डूबे रहना, अपने आप में ईश्वर की साधना है।
अगर भगवान को साक्षात देखना है, उस प्रभु के सामने नृत्य करना है, उस प्रभु को अपनी आंखों में बसा लेने की क्रिया करनी है, तो स्त्री हृदय धारण कर ही देखा जा सकता है। स्त्री का अर्थ है, जिसका हृदय पक्ष जाग्रत हो, क्योंकि हृदय पक्ष को जाग्रत करने की क्रिया प्रेम है।
यह तड़फ जिन्दगी का सार है, जिन्दगी का आधार है, जीवन की मस्ती है, और इसी पगडण्डी पर चलकर तुम मुझे प्राप्त कर सकते हो। पूरे शरीर में, रोम-रोम में गुरू को बसा लेने की क्रिया है, गुरू में डूब जाने की जो क्रिया है, वह प्रेम के माध्यम से ही संभव है।
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