





गुरु तत्व के सम्बन्ध में कहा गया है कि:
अखंड मंडलाकारं व्याप्त येन चराचरम।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरुवे नमः।।
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाजनं शलाकया।
चक्षुरुनमिलितं येन तस्मे श्री गुरुवे नमः।।
अर्थात जो अखंड मंडलाकारं चराचर विश्व में परम पद का प्रदर्शन करते हैं, वही गुरु हैं और जो अज्ञान रूपी अंधकार से अंधी हुई शिष्य की आंखों को ज्ञान रूप अंजन शलाका से खोल देते हैं, वहीं गुरु है। यह ज्ञान चक्षु साधारण चक्षुओं से परस्पर भिन्न होते हैं। साधारण चक्षु अथवा चर्म चक्षु मूलतः अज्ञान चक्षु होते हैं। इनसे केवल बाहरी जगत के विभिन्न पदार्थों के स्वरूप का ही भान होता है।
किन्तु ज्ञान चक्षुओं से जगत के सब कुछ को साक्षात भाव से देखा जा सकता है। ज्ञान चक्षु एवं अज्ञान चक्षु, दोनों ही प्रकृति की देन हैं। साधारण अवस्था में अज्ञान चक्षु, अर्थात चर्म चक्षु ही खुले हुए रहते हैं। ज्ञान चक्षुओं के खुलने पर यह चर्म चक्षु इसी प्रकार से कार्य करते रहते हैं। लेकिन ज्ञान और अज्ञान दोनों से परे होकर, दोनों का अधिकारी होने से मनुष्य त्रिनेत्र पार अभिजिक्त होने के योग्य होता है।
मनुष्य की शक्ति
साधारण अवस्था में मनुष्य विरूद्ध शक्ति के अधीन रहता है। प्रत्येक स्तर में उसे उस स्तर के अनुरूप विरूद्ध शक्ति का संघर्ष सहना पड़ता है। श्वास-प्रश्वास, प्राण-अप्राण की क्रिया, मान-अपमान का, सुख-दुःख का, अपने पराये का बोधा, आदि द्वन्द भाव मौलिक विरूद्ध शक्ति से उदभूत होते हैं। मनुष्य के दो चक्षु, वास्तव में वाम और दक्षिण रूप में दो परस्पर विरूद्ध शक्तियों के प्रतीक हैं। चक्षु के समान अनन्य इन्द्रियां भी विरूद्ध शक्ति के आस्पद हैं। यह वाम और दक्षिण शक्ति पर्याय क्रम से प्रधान्याय प्राप्त करती हैं। काल के आवर्त्तन और गुण के आवर्त्तन में भी वाम प्रधान होती है, दक्षिण अभिभूत रहती है तो कभी दक्षिण प्रधान होती है और वाम अभिभूत रहती है। मनुष्य देह में और उसके प्राणमय और मनोमय कोष में, विश्व की सभी भुवनावली में, यहां तक कि अणुपरमाणु में भी इन दोविरोधी शक्तियों का चल रहा खेल देखा जा सकता हैं। इस विरूद्ध शक्ति को पार किए बिना शांति, प्रेम, समन्वय, मैत्री इत्यादि किसी भी सद्गुण के विकास की सम्भावना नहीं रहती। इसलिए सर्वत्र की मनुष्य को खास करके जिन्होंने पूर्णता की ओर लक्ष्य स्थिर किया है, उनका एकमात्र कर्त्तव्य है जिस उपाय से भी हो, इस द्वन्द को पार करना, द्वान्दतीत होना। इसलिए देह का आश्रय कर के कर्मपथ में प्रविष्ट होने से सबसे पहले इन दो विरूद्ध शक्तियों का संघर्ष मिटाना ही कर्म का उद्देश्य हो जाता है।
ज्ञान चक्षु अर्थात व्यापक ज्ञान का प्रकाश होने से आत्मा संभवतः ही अनात्मा से अलग हो जाती है। उस समय देहआत्म बोधा नहीं रहता, सिर्फ देह की क्यों, प्राण मन, बुद्धि यहां तक कि प्रकृति सत्व तमाम से यह आत्मबोध उपसंहित हो कर शांत के रूप में अभिव्यक्त होता है। यही चिदाकाश का प्रकाश और ज्ञान का उन्मूलन है।
सद्गरु अपनी शक्ति द्वारा शिष्य को अर्थात शिष्य चैतन्य को सभी प्राकृतिक आवरण से मुक्त करके इस शांत स्वरूप में स्थापित करते हैं। लौकिक भाषा में जिसे काशीमृत्यु कहते हैं- वह वस्तुतः इस ज्ञान के उदय से देहआत्म बोध का उल्लंघन भर है, चैतन्य भू के बीच तक षटचक्र का विस्तार है।
गुरु की कृपा से आत्म चैतन्य भ्रू के मध्य का भेद कर लें तो देहात्मबोध से छुटकारा मिल जाएगा। अब प्रश्न यह है कि क्या सद्गुरु के अलावा और कोई जीवन के आत्म चैतन्य को इस अख्ंड प्रकाश की स्थिति में पहुंचा सकता है?
इस को इस तरह समझ सकते हैं कि ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति पूर्ण रूप से अधिकार में नहीं होने से यह उत्क्रमण व्यापार संभंव नहीं है।
सर्वज्ञ होने पर भी जब तक कर्त्तव्य प्राप्त कर के क्रिया शक्ति को वश में नहीं किया जाता, तब तक स्वयं मुक्त होकर भी दूसरों की मोचन क्रिया का अधिकार नहीं मिलता। क्योंकि श्रीगुरु की कृपा से दीक्षारूपी क्रिया शक्ति के प्रभाव से अधिकारी विशेष में पौरूष अज्ञान मिटने पर भी जीव का बुद्धिगत अज्ञान ना मिटने तक शिवतत्व लाभ कर के भी अपने आप को शिव रूप में नहीं पहचान पाता और इसलिए जीवन मुक्ति साक्षात्काररूप का आनंद की सम्य रूप में उपलब्धि नहीं कर सकता। भोग के अंत में देहपात होने से शिवत्व में जरूर प्रतिष्ठा होती है, इसमें संदेह नहीं।
सदगुरु अपनी अनंत करूणा द्वारा प्रेरित होकर पूर्ण ज्ञान शक्ति और पूर्ण क्रियाशक्ति के प्रभाव से अनादि काल से बंधो जीव को जगा देता हैं और उसकी आंखों पर से पर्दा हटा कर उसे शिवपद पर स्थापित करते हैं। जो गुरु अखंड पद पार प्रतिष्ठित नहीं कर सकते, वह गुरु के रूप में परिचित होते हुए भी सदगुरु नहीं हैं। इसलिए अखंड मंडल रूप परम पद ही गुरु को भी दिखाना चाहिए और वही शिष्य को पाना चिाहए।
यह अखंड पद मायीक जगत, मायातीत विशुद्ध ज्योतिर्मयी जगत एवं अनंत शक्तिमय महामाया जगत, और उसके भी परे शक्ति जगत समन्वित अखंड मंडलाकार प्रकाश है। विशुद्ध ज्ञान चक्षु के उन्मीलन से अखंड रूप में यह अद्वैत सत्ता संत्रिश्तः के साथ अभिन्न भाव से खुल जाती है। जिन्होंने अपनी महिमा और अपार करूणा से इस अखंड सत्ता से अभेद की उपलब्धि द्वार खोला है, वही गुरु हैं, वही नमस्य हैं।
असद्गुरु हों, चाहे सद्गुरु दोनों ही प्रवृतियों के मूल में भगवद इच्छा है। असली बात यह है कि शक्तिपात की प्रवृति क्रमिक हैं। इसलिए कोई कोई असद्गुरु और पूर्णता प्रतिपादक शास्त्र का सहारा लेने के बाद सद्गुरु की कृपा प्राप्त कर लेते है। शक्तिपात की विचित्रता से ही गुरु और शास्त्रगत सदसत भाव की विचित्रता होती है। पूर्ण सत्य का प्रतिपादक शास्त्र और गुरु ही सचछसत्र और सदगुरु और सदगुरु हैं। जो वास्तविक मोक्ष नहीं है वह भी मोक्ष जैसा लगता है और मोक्ष मान कर उसे ही पाने की जो स्पृहा पैदा होती है, इसका एकमात्र कारण माया ही है। माया पिशाची ही इस प्रकार जीवन को भटका कर निरंतर कष्ट देती है। परन्तु माया के पीछे भगवान की करूणा भी जगी हुई है। इसलिए दरिद्र संस्कारवश साधक का चित्त उस प्रकार से शास्त्र और गुरु पर आस्था रखते हुए भी भगवान की कृपा से उसमें सतर्क और परामर्श ज्ञान का आविर्भाव हो सकता। ऐसे में यह समझने में कठिनाई नहीं होती कि कौन सा सार है और कौन सा असार। इस तरह शुद्ध विद्या के प्रभाव से, ज्येष्ठ शक्ति के अधिष्ठान से पवित्रता आती है तथा निर्विघ्न सत्पथ पाने का सामर्थ्य जागता है।
यस्मान महेश्वरः साक्षात् कृत्वा मानुषविग्रहम।
कृप्या गुरुरूपेण मग्राः प्रोद्धरति प्रजाः।।
अर्थात स्वयं परमेश्वर ही माना मूर्ति धारण करके कृपापूर्वक, गुरु रूप में, माया में मग्र जीवों का उद्धार करते हैं। वास्तव में सिद्ध गुरु और दिव्य गुरु भी हैं, परन्तु मूल में सर्वात परमेश्वर ही एकमात्र अनुग्राहक हैं। उनके सिवाय और कोई भी अनुग्रह नहीं कर सकते परन्तु गुरु के जो प्रकार भेद किए गए हैं उसका कारण है। ज्ञानेंद्री आदी का प्रणाली भेद मूलक जिस किसी उपाय से हो अथवा बिना उपाय के हो, ज्ञान उत्पन्न होते ही उसका कार्य होगा ही।
अतएव, सदगुरु का मतलब साक्षात परमेश्वर अथवा उनका अनुग्रह प्राप्त उन्हीं को साध्मयापन्न जीवन मुक्त अधिकारी पुरुष समझना चाहिए। यह अधिकारी देवता, सिद्ध और मनुष्य तीनों हो सकते हैं। गुरु शब्द का वास्तविक अर्थ लेने से इस प्रकार की शंका हो सकती है। यदि गुरु शब्द का संकुचित अर्थ ले तो कहा जा सकता है कि माया से उद्धार ना कर सकने पर भी जो उधर्व लोक का भोग ऐश्वर्य, अजरत्व-अमरत्व आदि परिमित सिद्धि दे सकते हैं। व्यवहारिक दृष्टि से उन्हें भी गुरु कहा जा सकता है। मायिक जगत में भी विभिन्न उधर्वस्तरों में आनन्द और भोग की कमी नहीं है। पृथ्वी तत्व से लेकर कला तत्व एक प्रत्येक तत्व में ही भोग्य विजय और भोग उपकरण वाले नाना भुवन हैं। उन भुवनों में भी गुरु हैं।
ऐसे भी गुरु हैं जो ज्ञान दे सकते हैं पर भोग या विज्ञान नहीं दे सकते। ज्ञान देकर वह माया से मुक्त कर देते हैं, पर विज्ञान के अभाव से ज्ञानी अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता। वह स्वयं मुक्त होते हैं परन्तु दूसरों को मुक्त नहीं कर सकते, इसलिए परोपकार करने में समर्थ नहीं होते। यह गुरु ज्ञानी होते हैं, योगी नहीं।
वास्तविक सद्गुरु यह भी नहीं। सिद्ध योगी होने के नाते जो योगी और ज्ञानी दोनों ही होते हैं, वहीं सद्गुरु हैं। वह विज्ञान दान कर सकते हैं इसलिए शिष्य के भोग और मोक्ष, दोनों ही आवश्यकताओं का विधान कर सकते हैं। पूर्णत्व उन्हीं की कृपा से पाया जा सकता है।
।। ब्रह्मानन्दम परम सुखदम।। कहकर सद्गुरु को जो नमस्कार किया जाता है, गुरु प्रणाम में जिनको ‘तत’ पद का प्रदर्शक कह कर और ज्ञानांजन शलक से अज्ञानतिमिरंध में ज्ञान की – आंखें खोलने वाला बताया जाता है, वे दोनों एक ही हैं। साधारण तौर पर गुरु शब्द से सद्गुरु ही समझा जाता है, क्योंकि गुरुरूपी भगवान अथवा गुरु की देह में अधिष्ठित भगवान अपनी क्रिया शक्ति के द्वारा पशु दीक्षा के स्वतः सिद्ध दिव्यज्ञानरूप आंखों से अवरोधक मॉल को हटा देते हैं। परिणाम स्वरूप उसका पशुत्व मिटकर, सर्वज्ञत्व और सर्वकर्त्तव अभिव्यक्ति होता है और शिव साधभ्या की प्राप्ति होती है।
यह क्रियाशील दर्शन आदि विभिन्न उपायों से प्रयुक्त हो सकती है और उसके अनुसार दीक्षा के भी भेद होते हैं। शिष्य के उद्धार का सामर्थ्य गुरु का लक्षण है। योग वशिष्ठ में आया है:
दर्शनात र्स्पशनात शब्दात कृप्या शिष्यदेहके।
जनयेत यः समावेशं शाम्भवं स हि देशिकः।।
अर्थात जो दरस, परस और शब्द के द्वारा शिष्य की देह में शिवभाव के आवेश को जगा सकते हैं, वही देशिक या गुरु हैं कुण्डलिनी प्रबुद्ध होकर, षटचक्र का भेदन करके ब्रह्मरंध्र में परम शिव के साथ मिल जाने से यह आवेश होता है। सत्य संकल्प गुरु केवल एकबार कृपा दृष्टि दल कर भी इस महत्व कार्य को कर सकते हैं।
योग्य शिष्य का उद्धार और अयोग्य को योग्य बना कर उद्धार करना, यही गुरु का काम है।
बोधसार में नरहरी ने कहा है:
त्त तद्विवेक वैराग्ययुक्त वेदान्त्युक्तिभी।
श्रीगुरुः प्राप्यातेव अपदममपि पदमताम।।
प्रापय्य पदमतामेनं प्रबोधयति ततक्षणआत।।
अर्थात श्रीगुरु विवेक वैराग्य युक्त, वेदान्त युक्ति से अपदम को भी पदम् रूप में परिणत कर सकते हैं। उसके बाद उसे पल में जगा देते हैं। भास्कर राय ने ।। ललिता सहस्रनाम।। के भाष्य में स्पष्ट उल्लेख किया है कि –
अयोग्येपी योग्यतामापाधा श्रीगुरु सूर्यः बोधयति ।।
अर्थात श्रीगुरु रूपी सूर्य अयोग्य को योग्य बना कर प्रबद्ध करते हैं।
परन्तु योगी गुरु भी हैं। यह सही है कि ज्ञानी योगी से श्रेष्ठ हैं। कही ज्ञानी गुरु का कर्त्तव्य का, तो कहीं योगी गुरु कर्त्तव्य का त्याष्य हैं। आचार्य अभिनव के गुरु शम्भुनाथ ने इसे इस प्रकार स्पष्ट किया है। वे कहते हैं कि जो मोक्ष ज्ञानार्थी हैं, उसके गुरु का स्वभ्यस्त होना जरूरी है। दूसरे प्रकार का गुरु मिलने पर भी उसके लिए वह गुरु अनिवार्य है क्योंकि –
अमोदार्थी यथा भृंग पुष्पात पुष्पान्तरम व्रजेत।
विज्ञानार्थी तथा शिष्यो गुरोगुर्ववंतरम व्रजेत।।
अर्थात जो गुरु विज्ञान दान में असमर्थ हैं, वह शक्तिहीन हैं। जो स्वयं अज्ञ हैं वह दूसरों का उपकार कैसे कर सकता है? प्रश्न हो सकता है कि भावना ही तो मुख्य है, अज्ञ गुरु में भी शिष्य को भावनावशतः सफ़लता मिल सकती है। फ़लतः अज्ञ गुरु के त्याग की आवश्यकता हैं। जो उत्तरोत्तर उत्कर्ष देख कर भी अधम पद में रहता है, वह अभागा है, जो मोक्ष और विज्ञानप्रार्थी है उसके गुरु का स्वभ्यस्त योग सिद्ध होना जरूरी है। यही तीसरे प्रकार के योगी है जिनके गुरु ज्ञानी होते हैं और जो मोक्ष और विज्ञानार्थी हैं। इस गुरु से भोग सिद्धि नहीं होती, और जो मित्योगी हैं, अर्थात जो योगी घटमान और सिद्धावस्था के बीच के हैं, वह गुरु तो हैं पर सिर्फ भोगंश देने में समर्थ हैं। वह मोक्ष या विज्ञान दान नहीं दे सकते और जो योगी केवल समाप्त और घटमान अवस्था में हैं, वह शिष्य के मोक्ष और विज्ञान-विधान की बातें तो दूर, उसे भोगमात्र भी देने में समर्थ नहीं हैं। वह सिर्फ उपदेश कुशल हैं। जो मितयोगी भी नहीं हैं, ऐसे योगभ्यासी से बल्कि मितयोगी भी गुरु दृष्टि से श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वह ज्ञान के उपाय उपदेश द्वारा क्रमशः मुक्त करने में सफ़ल होते हैं।
इस तरह निरंतर मितज्ञानी गुरु हों तो शिष्य का कर्त्तव्य क्या है? एक पूर्ण ज्ञानशील गुरु अर्थात सद्गुरु नहीं होने से भिन्न-भिन्न परिमित ज्ञान गुरु से अन्शंशिका क्रम से ज्ञान आहरण करके स्वात्मा में अखंड मंडल पूर्ण ज्ञान सम्पादन करेगा।
मितज्ञानी से पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता इसलिए स्वकीय ज्ञान प्राप्त करने के लिए विशेष प्रयत्न से असंख्य गुरु करने की आवश्यकता होती है। भगवान कृपा के बिना सद्गुरु नहीं मिलते। तीव्र शक्तिपात से पूर्ण ज्ञान वाले गुरु मिलते हैं, जिनकी कृपा से अनायास स्वताम्ज्ञान पूर्ण रूप से उदित होता हैं। ऐसे में बार-बार गुरुकरण की आवश्यकता नहीं रहती।
सदगुरु वास्तव में परमेश्वर हैं, इसमें संदेह नहीं। तन्नमत से वही परम शिव हैं। वे स्वातंत्रय शक्तिमय हैं। पंचकृत्यकारित्व उन्हीं का असाधारण काम है। इन पंच कृत्यों में जीवन का अनुग्रह अन्यतम है। अन्यतम क्यों, यही प्रधान हैं। मतलब कि उनके और कृत्य इसके अंगीभूत हैं, यह भी कहा जा सकता है। वे साक्षात अनुग्रह करते हैं या किसी गुरुदेह में अधिष्ठित होकर अनुग्रह करते हैं।
उनका साक्षात अनुग्रह निराधिकरण और दूसरा साधिकरण हैं। शास्त्र कहते हैं कि जब जब तमः और अनादि प्रवृत मल का तथा वामाख्य भागवत शक्ति का आवरणत्मक अधिकार निवृत होता है, तो जीव का कैवल्याभिमुख भाव उदित होता है। इस भाव के उदित होने से जगत-उद्धार-प्रवण अणु-आत्मा की अनंत दक्शक्ति तथा क्रियाशक्ति, यानि चैतन्य को प्रकट कर देते हैं। द्रिक क्रिया की अनंतता पशुओं में भी है, पर मल के अवच्छेद से वह ढ़की रहती है। परिणाम के फ़ल से आवरण हटने से वह अभिव्यक्त होती है।
परमेश्वर सब समय अनुग्रह कर सकते हैं, और करते हैं। जगत का स्वाप, संहार, सृष्टि और स्थिति सभी अवस्थाओं में उनका अनुग्रह आत्मप्रकाश करता है। पर अनुग्रह के फ़ल के फ़ेर बदल होता है। हां, अनुग्रह का मुख्य फ़ल मुक्ति है, और वह तो होती ही हैं।
लेकिन निराधिकार भी हो सकती है और साधिकार भी। निराधिकार मुक्ति ही शिवत्व है और साधिकार मुक्ति विद्येश्वर अधिकारी का पद विशेष हैं। किन्ही-किन्ही का ख्याल है कि स्वयं भगवन जिन लोगों पर अनुग्रह करते हैं, वे सभी जगत के आदिगुरु हैं। यह बात सत्य नहीं हैं, क्योंकि गुरु पद भी विशुद्ध वासनामय अधिकार पद है। जीव का उद्धार और लोक कल्याण की आकांक्षा नहीं रखने से कोई गुरु पद प्राप्त नहीं कर सकता। जिन आत्माओं का मलपाक बहुत अधिक होने से परम वैराग्य उत्पन्न होता है, वे साक्षात भगवदनुग्रह प्राप्त करने के कारण एक बार पूर्णत्व प्राप्त करते हैं।
वे जगत के अतीत होते हैं। आगम के सत्व से वे परमेश्वर का अधिकार अवस्था तथा भोग अवस्था को भेद करके बिल्कुल लयावस्था प्राप्त कर सकते हैं। इस अवस्था में बिंदु क्षोभ नहीं रहता, इसलिए यह सृष्टि की अतीत अवस्था है। द्वैत दृष्टि से विचार करने पर इनका जगत व्यापर से नाता नहीं रहता। ये मुक्त शिव हैं।
मलहीन होने के कारण यह भी परम शिव की भांति सभी शक्तियों से युक्त तथा स्वतंत्र होते हैं। यह सत्य हैं और यह स्वतंत्रता उस समय अनावृत होती है, यह भी सत्य हैं। फि़र भी चूंकि ये वासना मुक्त होते हैं इसलिए जगत के अधिकार आदि से उपरत तथा स्व-स्वरूप में प्रतिष्ठित होते है।
निर्मल मुक्त पुरूष की शक्ति अर्थात अव्यय स्वयं समवेद्य संवित सभी वस्तुओं को, जैसे हैं उसी रूप में ग्रहण करती हैं। ये समर्थ होते हैं परन्तु सर्वज्ञत्व ओर सर्वकर्त्तव्य के बावजूद इनमें प्रवृति नहीं होती क्योंकि नित्यमुक्त परमेश्वर ही विश्व के कार्यों में निर्वाहक हैं। ये रोग द्वेष हीन हैं। अद्वैत की दृष्टि से ये सभी परमेश्वर रूप में प्रतिष्ठित हैं।
दीक्षा से साधक के सभी पाश छिन्न अवश्य होते हैं परन्तु शिवत्व की अभिव्यक्ति नहीं होती। उसके लिए कालांतर भावी अभिषेक आवश्यक है। वही अपर निर्वाण है जो साधक के लिए सधिन्ये और परनिर्वाण का द्वार स्वरूप है। परमेश्वर की अर्चना आदि अविनाभूत शास्त्र चर्चा के द्वारा अभिषेक संपन्न होता है।
इसे आरोग्य स्नान की तरह समझना चाहिए। साधक मात्र की ही निर्वाण दीक्षा पहले ही हो चुकी होती हैं। वही ज्ञान साधक साधकत्व का सम्पादक हैं। उससे चूंकि पशुत्व की निवृत्ति नहीं होती इसलिए शिवत्व की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। शिवत्व सर्वज्ञत्व आदि षड्गुण सभी आधारों में नहीं खिल पाता। जहां कला आदि छः अभ्यासों की शुद्धि से तीनों पाशों का छेदन नहीं हुआ होता हैं, वहां शिवत्व की अभिव्यक्ति असंभव है क्योंकि पूर्ण ज्ञान की साधना वहां कैसे हो सकती है? तीसरी या निर्वाण दीक्षा का प्रायोजक अधिक मलपाक निबन्धन तीव्र शक्तिपात हैं। शक्तिपात के माध्यम से ही सद्गुरु शिष्य के भीतर ज्ञान चक्षु जाग्रत कर, उसकी प्रवृतियों को निर्मल मुक्त बनाते हुए शक्ति का संवहन करते हैं। यही साधना का पथ है, यही गुरु का अनुग्रह है, यही गुरु का अधिकार है जिससे शिष्य पूर्णतः शिवत्व भाव को ग्रहण कर सके। यह शिवत्व भाव ही शिष्य को गुरु का सादृश्य स्वरूप बना देता हैं।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,