





एक भारतीय जीवन का एक अत्यन्त उज्जवल पुष्ठ जब एक तेजस्वी पुरूष ने अपने अदम्य साहस और बल से पूरे भारत वर्ष को नवीन चेतना से प्रकाशित कर दिया, केवल 32 वर्ष की अल्पायु में सम्पूर्ण भारत को एक छोर से दूसरे छोर तक ज्ञान और साधनाओं के स्थान पर उन्हीं साधनाओं को सरलतम तांत्रोक्त अथवा मांत्रोक्त रूप से प्रस्तुत कर, प्रत्येक सामान्य व्यक्ति के लिए, और साधक – संसार से निकाल कर, गृहस्थों के जीवन तक प्रवेश दिया। उनके प्रयोगों के साथ में जुड़ी कथाएं तो रूपक है, जबकि सत्यता यह है कि उनके आग्रह का परिणाम ही रहा, जो हमें अनेक लुप्त साधनाएं और ज्ञान प्राप्त हो सका।
कनकधारा स्तोत्र भी एक ऐसा ही अत्यंत सरस पद है, जब कि भगवतपाद शंकराचार्य ने एक वृद्धा की दरिद्रता पर भावविह्वल होकर मधुर कंठ से भगवती लक्ष्मी की अराधना ही और उन्हें बाधय कर दिया कि वह केवल महालक्ष्मी स्वरूप में उपस्थित हों और जब-जब ऐसे श्रेष्ठ और यति आह्वान करते हैं, तो वे आह्वान ही नहीं करते आदेश करते हैं कि उनके मनोवांछित देवी देवता उस रूप में उपस्थित हों। कनकधारा स्तोत्र ऐसा ही स्तोत्र है। कनकधारा स्तोत्र भगवतपाद की अन्य रचनाओं की भाति ही अनुपम और विलक्षण है, केवल काव्य की दृष्टि से ही नहीं, अपने प्रभाव की दृष्टि से भी आग्रह और प्राणों के बल का ऐसा समायोजन है कि जो भी उसका सस्वर पाठ करें, उसके लिए तो लक्ष्मी हस्तकमलावत हो जाए। हाथ में रखें पुष्प के समान स्पष्ट अत्यंत सुलभ, दरिद्र से दरिद्र व्यक्ति भी मिटा दे अपने दुर्भाग्य की पंक्तियां, और स्वयं अपना भाग्यविधाता बनकर अपने ही हाथों से लिखे अपने सौभाग्य की पंक्तियां –
कंठ में आतुरता भगवतपाद के समान भाव विह्वलता और योगियों के समान आग्रह इन्हीं का संयोजन करके स्तुति का पाठ करने का विधान है।
जैसे भ्रमरी अधाखिले कुसुमों से अलंकृत तमाल-तरू का आश्रय लेती हैं, उसी प्रकार जो श्रीहरि के रोमांच से सुशोभित श्री अंगों पर निरन्तर पड़ता रहता है तथा जिसमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य का निवास है, सम्पूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी का वह कटाक्ष मेरे लिए मंगल-दायी हो।।1।।
जैसे भ्रमरी महान कमल-दल पर मंडराती रहती है, उसी प्रकार जो मृत्यंजय श्रीहरि के मुखारविन्द की ओर बारम्बार प्रेमपूर्वक जाती और लज्जा के कारण लौट आती है, समुद्रकन्या लक्ष्मी की वह मनोहर मुग्ध दृष्टिमाला मुझे धन-सम्पत्ति प्रदान करे।।2।।
जो सम्पूर्ण देवताओं के अधिपति इन्द्र के पद का वैभव-विलास देने में समर्थ है, मधुहन्ता श्रीहरि को भी अधिकाधिक आनन्द प्रदान करने वाली है तथा जो नील-कमल के भीतर भाग के समान मनोहर जान पड़ती है, उन लक्ष्मी जी के अधखुले नेत्रों की दृष्टि क्षण भर के लिए मुझ पर थोड़ी सी अवश्य पड़े।।3।।
शेषशायी भगवान विष्णु की धर्मपत्नी श्रीलक्ष्मी जी का नेत्र हमें ऐश्वर्य प्रदान करने वाला हो, जिसकी पुतली तथा बरौनियां अनंग के वशीभूत (प्रेमपरवश) हो, अधखुले किन्तु साथ ही निर्निमेष नयनों से देखने वाले आनन्दकंद श्रीमुकुन्द को अपने निकट पाकर कुछ तिरछी हो जाती है।।4।।
जो भगवान मधुसूदन के कौस्तुभमणि-मण्डित वक्ष स्थल में इन्द्रनील-मयी हरावली सी सुशोभित होती है तथा उनके भी मन में काम (प्रेम) का संचार करने वाली है, वह कमल-कुंजवासिनी कमला की कटाक्ष माला मेरा कल्याण करे।।5।।
जैसे मेघों की घटा में बिजली चमकती है, उसी प्रकार जो कैटभशत्रु श्रीविष्णु के काली मेघमाला के समान श्यामसुन्दर वक्ष-स्थल पर प्रकाशित होती हैं, जिन्होंने अपने अविर्भाव से भृगुवंश को आनन्दित किया है तथा जो समस्त लोकों की जननी हैं, उन भगवती लक्ष्मी की पूज्नीय मूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करें।।6।।
समुद्र-कन्या कमला की वह मन्द, अलस, मन्थर और अर्धौन्मीलित दृष्टि, जिसके प्रभाव से कामदेव ने मंगलमय भगवान मधुसूदन के हृदय में प्रथम बार स्थान प्राप्त किया था, यहां मुझ पर पड़े।।7।।
भगवान नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी का नेत्र रूपी मेघ दयारूपी अनुकूल पवन से प्रेरित हो दुष्कर्म (धनागम-विरोधी अशुभ प्रारब्ध) रूपी धाम को चिरकाल के लिए दूर हटाकर विजाद रूपी धर्मजन्यताप से पीडि़त मुझ दीनरूपी चातक पर धनरूपी जल धारा की दृष्टि करे।।8।।
विशिष्ट बुद्धि वाले मनुष्य जिनके प्रीति पात्र होकर जिस दया दृष्टि के प्रभाव से स्वर्ग पद को सहज की प्राप्त कर लेते हैं, पद्मासना पद्मा की वह विकसित कमल-गर्भ के समान कान्तिमयी दृष्टि मुझे मनोवांछित पुष्टि प्रदान करे।।9।।
जो सृष्टि लीला के समय वाग्देवता (ब्रह्मशक्ति) के रूप में विराजमान होती हैं तथा प्रलय-लीला के काल में शाकम्भरी (भगवती दुर्गा) अथवा चन्द्रशेखरवल्लभा पार्वती (रूद्रशक्ति) के रूप में अवस्थित होती हैं, त्रिभुवन के एकमात्र पिता भगवान नारायण की उन नित्ययौवना प्रेयसी श्रीलक्ष्मी जी को नमस्कार।।10।।
मातः! शुभ कर्मों का फ़ल देने वाली श्रुति के रूप में आपको प्रणाम हैं। रमणीय गुणों की सिन्धु रूपा रति के रूप में आपको नमस्कार हैं। कम लवन में निवास करने वाली शक्ति स्वरूपा लक्ष्मी को नमस्कार है तथा पुष्टि रूपा पुरषोत्तमप्रिया को नमस्कार हैं।11।।
कमल वदना कमला को नमस्कार है और सिन्धु संभूता श्री देवी को नमस्कार है, चन्द्रमा और सुधा की सगी बहन को नमस्कार है। भगवान नारायण की वल्लभा को नमस्कार है।।12।।
कमल सदृश्य नेत्रों वाली माननीय मां! आपके चरणों में किए गए प्रणाम सम्पत्ति प्रदान करने वाले, सम्पूर्ण इन्द्रियों को आनन्द देने वाले, साम्राज्य देने में समर्थ और सारे पापों को हर लेने के लिए सर्वथा उद्यत हैं, वे सदा मुझे ही अवलम्बन दें (मुझे ही आपकी चरण वन्दना का शुभ अवसर सदा प्राप्त होता रहे।)।।13।।
जिनके कृपाकटाक्ष के लिए की गई उपासना उपासक के लिए सम्पूर्ण मनोरथों और सम्पत्तियों का विस्तार करती है, श्रीहरि की हृदयेश्वरी उन्हीं लक्ष्मी देवी का मैं मन, वाणी और शरीर से भजन करता हूं।।14।।
भगवति हरिप्रिय! तुम कमल वन में निवास करने वाली हो, तुम्हारे हाथों में नील कमल सुशोभित है। तुम अत्यन्त उज्जवल वस्त्र, गन्ध और माला आदि से सुशोभित हो। तुम्हारी झांकी बड़ी मनोरम है। त्रिभुवन का ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी! मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।।15।।
दिग्गजों द्वारा सुवर्ण-कलश के मुख से गिराए गए आकाश गंगा से निर्मल एवं मनोहर जल से जिनके श्री अंगो का अभिषेक कार्य सम्पादित होता है, सम्पूर्ण लोकों के अधिश्वर भगवान विष्णु की गृहिणी और क्षीरसागर की पुत्री उन जगत् जननी लक्ष्मी को मैं प्रातः काल प्रणाम करता हूं।।16।।
कमल-नयन केशव की कमनीय कामिनी कमले! मैं अंकिचन (दीन-हीन) मनुष्यों का अग्रगण्य हूं, अत:एव तुम्हारी कृपा का स्वाभाविक पात्र हूं। तुम उमड़ती हुई करूणा की बाढ़ की तरह तरंगों के समान कटाक्षों द्वारा मेरी तरफ़ देखो।।17।।
जो लोग इन स्तुतियों द्वारा प्रतिदिन वेदत्रयी-स्वरूपा त्रिभुवन जननी भगवती लक्ष्मी की स्तुति करते हैं, वे इस भूतल पर महान गुणवान और अत्यंत सौभाग्यशाली होते है तथा विद्वान पुरूष भी उनके मनोभाव को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं।।18।।
आदि गुरू शंकराचार्य ने ‘श्री विद्या रहस्य’ में लिखा है कि ‘कनकधारा यंत्र’ लक्ष्मी का ही साकार रूप है और यह यंत्र ताम्रपात्र पर अंकित हो, रजत पर अंकित हो अथवा स्वर्ण धातु पर, मूल बात यह है कि यह मंत्र सिद्ध एवं प्राण प्रतिष्ठायुक्त होना चाहिए और जहां भगवती महा लक्ष्मी का साक्षात् स्वरूप ‘कनकधारा यंत्र’ स्थापित होता है वहीं से जीवन में अनुकूलता एवं मधुरता का प्रारम्भ हो जाता है। इसका चैतन्य स्वरूप साधक का अपार आनन्द देने वाला है जिससे वह द्वन्द रहित होकर जीवन में निरन्तर प्रगति पथ पर अग्रसर हो सकता है।
जहां मंत्र द्वारा साधना एवं स्तोत्र पाठ द्वारा अराधना का सुखद संगम होता है, वहीं लक्ष्मी का प्रादुर्भाव होता है। जैसा कि इस स्तोत्र से स्पष्ट है कि इस में भगवती लक्ष्मी की आराधना है। अतः इस स्तोत्र का पाठ कनकधारा यंत्र स्थापित कर यदि उसके समक्ष किया जाए तो यह स्तोत्र मात्र स्तोत्र न रह कर साकार रूप धारण कर लेता है, ऐसा कुछ विशिष्ट साधकों ने अपने अनुभव से ज्ञात किया है, क्योंकि इसमें कनकधारा यंत्र स्थापना का विशेष महत्व है, और उसके सामने इस स्तोत्र का पाठ करना ज्यादा फ़लदायक माना गया है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,