





श्री सदगुरु को नमस्कार है। आचार्य शंकर कहते हैं कि यदि शरीर सुन्दर, स्त्री भी सुन्दर, अद्भुत विशद यश और सुमेरु पर्वत के समान विपुल धन प्राप्त है, पर उसका मन श्री सदगुरु के चरण कमलों में नहीं लगा हो तो उससे क्या लाभ ? जिसे स्त्री, धन, पुत्र-पौत्र आदि सारा कुटुम्ब, ग़ृह बान्धव, ये सभी भले ही प्राप्त हो गये, जिसके मुख में छहों अंगों सहित वेद तथा छहों शास्त्रों की विद्या विद्यमान है और सुन्दर गद्य-पद्यवाली कविता भी करता है।
जिसका विदेशों में भारी सम्मान है, स्वदेश में भी जो धन्य माना जाता है तथा जिसके समान दूसरा कोई सदाचारी नहीं है, भूमण्डल के सभी राज समूहों द्वारा जिसका चरण कमल सदा सेवित है, दान के प्रताप से दिशाओं में यश व्याप्त है, सारी वस्तुएं करतलगत है, चित्त न भोग में लगता है, न योग में, न धन में आसक्त होता है, पर उसका मन श्री सदगुरु के चरण कमलों में नहीं लगा हो तो उससे क्या लाभ ?
यद्यपि मेरा मन न वन में, अपने घर में, न कार्य में और न बहुमूल्य शरीर में ही लगता है, फि़र भी यदि वह श्री सदगुरुदेव के चरणों में ना लगा हो तो क्या लाभ? जिसका मन गुरु के उपर्युक्त वाक्य में लगा हुआ है, ऐसा जो पवितकाय सन्यासी, राजा, ब्रह्मचारी और ग़ृहस्थ इस गुर्वष्टक स्तोत्र का पाठ करेगा, उसे अभीप्सित ब्रह्मनामक पद की प्राप्ति होगी।
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