





हर मानव शरीर में एक तीसरा नेत्र भी होता है, जिसके माध्यम से भूत, भविष्य और वर्तमान को स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है, हमने पढा है कि भगवान शंकर का तीसरा नेत्र खुला हुआ है, योगी जन भी अपना तीसरा नेत्र खोल लेते हैं, और वे सही अर्थों में त्रिकालज्ञ बन जाते हैं।
मनुष्य का तीसरा नेत्र अधिकतर बन्द ही रहता है, क्योंकि हम उसको कभी भी खोलने का प्रयत्न ही नहीं करते, पिछले सैकड़ों वर्षों से हमने यह प्रक्रिया बन्द कर दी है जिसकी वजह से हमारी यह ग्रंथी एक प्रकार से लुप्त हो गई है। यदि हम शरीर के किसी अंग विशेष का उपयोग कुछ वर्षों के लिये ना करें तो वह अंग कमजोर हो कर निष्क्रिय हो जाता है और बाद में हम प्रयत्न करके भी उस अंग का उपयोग नहीं कर पाते, उदाहरण के लिये कुछ हठ योगी अपने दाहिने हाथ को आकाश की तरफ़ उठाये रहते हैं, और साल दो साल बाद वह ठूंठ की तरह हो जाता है, बाद में प्रयत्न करने पर भी वह हाथ वापिस नीचे नहीं आ पाता।
हमारे पूर्वजों को भूत भविष्य का ज्ञान रहता था, क्योंकि उनका तीसरा नेत्र खुला हुआ था, बाद में धीरे धीरे हमने इस ग्रंथी का उपयोग बंद कर दिया, सैकड़ों वर्षों पूर्व व्यक्ति अपनी इच्छा से अपने कान हिला सकता था परन्तु उसे इसकी आवश्यकता नहीं थी, अतः उसने कान हिलाना बंद कर दिया, फ़लस्वरूप वह ग्रंथि निष्क्रिय हो गई और आज हम चाहते हुए भी अपने कान को नहीं हिला सकते। ठीक यही स्थिति हमारे तीसरे नेत्र की हुई, हमने उस ग्रंथि का उपयोग करना सैकड़ों वर्षों से छोड़ दिया, फ़लस्वरूप वह निष्क्रिय सी हो गई, पर यदि हम प्रयत्न करें और उस ग्रंथि को उत्तेजना दें तो निश्चय ही वह सक्रिय हो सकती है, और सक्रिय होते ही उसके माध्यम से भूत और भविष्य को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
यही नहीं अपितु यदि किसी व्यक्ति की यह ग्रंथि सक्रिय हो जाती है, तो उसकी आने वाली पीढ़ी की भी वह ग्रंथी सक्रिय रहेगी और उसमे स्वतः ही भूत और भविष्य को देखने की क्षमता पैदा हो जायेगी।
जिस प्रकार से हम इन दोनों आंखों से सामने स्थित घटना या पदार्थ को देख सकते है, ठीक उसी प्रकार हम तीसरे नेत्र या ग्रंथि से, जो स्थान और काल से परे है, कहीं पर भी घटित होने वाली घटना को देख सकते हैं, इतना ही नहीं, कई वर्षों बाद की घटनाओं को वर्तमान क्षण में देख सकते हैं। यह प्रक्रिया कठिन नहीं है, यद्यपि यह गोपनीय अवश्य रही है, योगी लोग एक विशेष विधि से इस ग्रंथि को उत्तेजित और सक्रिय कर देते हैं फ़लस्वरूप यह ग्रंथि काम करने लग जाती है और इस प्रकार से वे सहीं रूप में दिव्य चक्षु सम्पन्न बन जाते हैं।
इसके लिये साधक चाहें तो अपना तीसरा नेत्र खोलने के लिये प्रयत्न कर सकते हैं, मेरे कई शिष्यों को इसमें सफ़लता मिली है, नीचे जो विधि बताई गई है वह अपने आप में अनुभूत और प्रमाणिक है।
साधक को पद्मासन में बैठ जाना चाहिए और अपने दोनों नेत्रों को बंद कर देना चाहिए। इसके बाद मुंह के अन्दर जीभ को उलट कर तालू की ओर चढ़ा लेनी चाहिए, फि़र ध्यान को दोनों भ़ृकुटी के मेल स्थान से अर्थात नाक की जड़ से दो अंगुल ऊपर जमाना चाहिए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह ध्यान सिर के बाहरी भाग पर ना हो कर भीतरी भाग पर होना चाहिए, ध्यान के समय ‘‘नमः शिवाय’’ मंत्र का जप मन ही मन करते रहना चाहिए। इससे पूर्व साधक को अपनी दोनों आंखें खोल कर नाक के अग्र भाग को देखने का प्रयत्न करना चाहिए। इसके लिए नाक के अग्र भाग पर कोई छोटा सा लाल बिन्दु लगाकर उसे अपनी दोनों आंखों से देखने का अभ्यास करना चाहिए, जब यह बिन्दु साफ़ दिखाई देने लग जाय तब दूसरे चरण में भ़ृकुटी के मध्य में एक लाल बिन्दु लगाकर अपनी दोनों आंखों से देखने का अभ्यास करना चाहिए। जब यह बिन्दु दिखाई देने लगे तब साधक को आंखें बन्द कर जीभ को तालू से सटाकर पीछे लिखे प्रयोग को सम्पन्न करना चाहिए।
इस प्रकार सतत अभ्यास करने से तीसरे नेत्र से संबंधित ग्रंथि उत्तेजित हो जाती है, और कुछ समय बाद ही वह सक्रिय हो जाती है, उसको संसार में किसी भी स्थान पर घटित होने वाली घटना साफ़ दिखाई देने लग जाती है, उसका मन एकाग्र हो जाता है, और स्वास्थ्य उत्तम रहने के साथ साथ देव दर्शन प्राप्त होने लग जाता है।
वस्तुतः यह साधना अत्यन्त सरल होते हुए भी कठिन है। इसके लिए साधकों को असीम धैर्य से सतत अभ्यास करते रहना चाहिए, तभी उन्हें सफ़लता प्राप्त होती है और वे दिव्य चक्षु सम्पन्न हो पाते हैं।
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