





मूलाधार चक्र को कुण्डलिनी जागरण का आधार चक्र भी कहा जाता है क्योंकि यह प्रथम चक्र है, जिसके जाग्रत होने से कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। यह चक्र भौतिक अनुभवों का आधार है और यह रीढ़ की हड्डी के नीचे, गुदा प्रदेश एवं जनेन्द्रिय के बीच स्थित होता है। यह चक्र प्रथम चक्र है और कुण्डलिनी इस स्थान पर सुसुप्त अवस्था में एक सर्प की तरह साढ़े तीन बार कुण्डली डाल कर स्थित रहती है।
इस चक्र का रंग गहरा लाल है, और इसका प्रतीक चार पंखुडि़यों वाला एक कमल है। वर्ग पृथ्वी का प्रतीक है और उसके मध्य में स्थित त्रिकोण ऊर्जा के प्रवाह की दिशा को दर्शाता है। यह चक्र पृथ्वी तत्व का प्रतीक है और यह हमारे शरीर और हमारे चारों ओर की भौतिक दुनिया से संबंधित है। मूलाधार चक्र पृथ्वी की शक्ति को पैरों के माध्यम से शरीर में प्रवाहित करता है और उसे संतुलित बनाए रखता है।
इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी मूलाधार चक्र पर आकर मिलतें हैं और इस मिलन स्थान को मुक्त त्रिवेणी कहा जाता है। गंगा, यमुना और सरस्वती मानव शरीर में इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी में निवास करती हैं। इस मिलन स्थान को ब्रह्म ग्रंथी भी कहा गया है।
इस चक्र के मधय में इष्टदेव ब्रह्मा विराजमान हैं, जिनका रंग गेहुंआ है, जो पीले रंग की धोती पहने हुए हैं और उन्होंने हरे रंग का दुप्पट्टा ओढ़ा हुआ है। उनके चार मुख और चार हाथ हैं। उनके ऊपरी बाएँ हाथ में कमल का फ़ूल है और निचले बाएं हाथ में पवित्र शास्त्र को धारण कर रखा है । निचले दायें हाथ में उन्होंने एक अमृत कलश को धारण कर रखा है और चौथा हाथ अभय मुद्रा में है।
ब्रह्मा की शक्ति डाकिनी हैं। वो गुलाबी वस्त्रों से सुसज्जित हैं। अपने चारों हाथों में उन्होंने खोपड़ी, तलवार, ढाल और एक त्रिशूल, जो कि निर्माता, परिरक्षक और विधवंसक ताकतों का प्रतीक है, को धारण कर रखा है। इस चक्र के देवता भगवान गणपति हैं। इस चक्र का बीज मन्त्र ‘‘लं’’ है।
मानव में धैर्य और लालच की भावना को प्रवाहित करना इस चक्र के गुण हैं। मानव में अपने अस्तित्व को कायम रखने की भावना भी इसी चक्र के माध्यम से प्रवाहित होती है। यहां ध्यान अस्तित्व कायम रखने पर है – भोजन, वस्त्र, धन और आश्रय प्राप्त करने की भावना इसी चक्र के माध्यम ये प्रवाहित होती है। जब ऊर्जा स्वतंत्र रूप से इस क्षेत्र में प्रवाह नहीं करती है तब हम पेट में गैस, कब्ज, रक्त विकार, कमजोर हड्डियों और जोड़ों के दर्द, थकावट और वजन से सम्बन्धित शारीरिक रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं।
भावनात्मक रूप से हम स्वयं को अक्षम मानने लगते हैं, डर से पीडि़त रहते हैं, स्वार्थ की भावना हम पर हावी होने लगती है और हम भौतिक चीज़ों को प्राप्त करने में ही लीन हो जाते हैं।
लाभ
इस चक्र के जाग्रत होने पर मनुष्य तनाव से मुक्ति, सच्चा सुख, सौन्दर्य, उत्तम स्वास्थ और चुम्बकीय व्यक्तित्व को प्राप्त कर लेता है।
मूलाधार जाग्रण विधि
इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कई साधान हैं – मंत्र के माध्यम से, दीक्षा के माध्यम से (या गुरु द्वारा प्रदत्त दिव्य ऊर्जा से), क्रिया योग, रस विज्ञान और यहां तक कि आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों और औषधि से। मूल बन्ध, उड्डियान बन्ध, जालंधार बन्ध और प्राणायाम के माध्यम से भी मूलाधार चक्र को जाग्रत किया जा सकता है।
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