





वास्तु शब्द वास में अस्तु प्रत्यय जोड़कर निर्मित हुआ है। वास शब्द निवास अर्थात् रहने के स्थान का पर्याय है। परन्तु यहां विशेज ध्यान रखने की बात यह है कि वास्तुशास्त्र के अन्तगर्त केवल निवास कि लिए प्रयोग किए जाने वाले भवनों का ही विवेचन नहीं होता।
फ़ैक्ट्री अथवा कारखाना, दूकान और गोदाम, व्यवसायिक परिसर और मन्दिर-धर्मशाला जैसे सार्वजनिक स्थलों आदि सभी का विवेचन वास्तुशास्त्र के अन्तर्गत हुआ है। हमारे देश में लगभग सभी मन्दिर और देवालय, महल और किले ही नहीं, अधिकांश सामान्य मकान भी वास्तुशास्त्र के नियमों को ध्यान में रखकर बनाए जाते रहे हैं। यह बात दूसरी है कि आज अधिकतर इस मामले मे सलाह मन्दिरों के पुजारियों, कर्मकाण्डी ब्राह्मणों और ज्योतिषियों से ली जाती है। जहां तक व्यावहारिकता का प्रश्न है, इनमें से अधिकांश को वास्तुशास्त्र का यथेष्ठ ज्ञान नहीं, और वे अपने आप वंश परम्परा से प्राप्त ज्ञान से ही यह कार्य कर रहे है। जन सामान्य के सभी नहीं तो भी अधिकांश कष्टों और दुखों का यदि एकमात्र नहीं, फि़र भी सबसे बड़ा कारण यह अज्ञान ही है।
वास्तुशास्त्र तथा ज्योतिष का सम्बन्ध हमने धर्म के साथ ज्योतिष को इस प्रकार जोड़ दिया है कि प्रत्येक व्यक्ति हर एक पुजारी को अपना हाथ और जन्मपत्री दिखलाने के लिए लालायित रहता है। परन्तु वास्तव में धर्म और ज्योतिष में परस्पर रंचमात्र भी सम्बन्ध नहीं। धर्म एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें सम्पूर्ण महत्व ही श्रद्धा और विश्वास का है।
इसके विपरीत ज्योतिष एक विज्ञान है और साथ ही जीवन्त कला भी। ज्योतिष का सम्बन्ध सूर्य-चन्द्रमा, ग्रह-नक्षत्रों और हस्त रेखाओं से है जबकि धर्म का आधार ईश्वर और ईश्वर के अवतार तथा देवी-देवता हैं। इसी प्रकार हम लोगों ने वास्तुशास्त्र को भी धर्म और ज्योतिष के साथ जोड़ दिया है, जो पूरी तरह गलत है।
ज्योतिष वास्तुशास्त्र का एक सहायक अंग मात्र है, सम्पूर्ण वास्तुशास्त्र नहीं। एक वास्तुशास्त्री ग्रहों और नक्षत्रों का विचार करता भी है, तब उसका अभिप्राय इनके ज्योतिष से सम्बन्धित प्रभावों का विश्लेषण करना नहीं होता।
वह तो मुख्य रूप से दिशाओं, पर्यावरण, भूमि के गुणों, प्लाट की आकृति, सौरऊर्जा के प्रभाव आदि का विश्लेषण करके ही किसी भूखण्ड के अच्छा अथवा बुरा होने की घोषणा करता है।
भवन निर्माण में दिशाओं का बहुत ही अधिक महत्व है। यदि यह कहा जाए कि वास्तुशास्त्र का सम्पूर्ण भवन ही दिशाओं के ज्ञान और उनके सटीक उपयोग पर टिका है तो कुछ गलत नहीं होगा। भवन का मुख्यद्वार किस दिशा में हो, बैठक या ड्राइंगरूम किस दिशा में होना चाहिए, सोने के कमरे किधर हो और रसोई किस दिशा में हो ऐसी सभी बातों का निर्धारण करना वास्तुशास्त्र का मुख्य विजय है।
अच्छे और अनुभवी आर्किटेक्ट किसी भी भवन का नक्शा बनाते समय इन सभी बातों का ध्यान रखते हैं। सबसे अच्छा तो यही रहता है कि यदि आप बने-बनाए मकान में रह रहे हैं और अधिक तोड़-फ़ोड़ भी नहीं करना चाहते तब भी थोड़े से परिवर्तन करके और कमरों के उपयोग बदलकर अधिकांश वास्तुदोषों का बड़ी सीमा तक निराकरण कर सकते है।
स्वयं ईश्वर द्वारा उद्भाजित तथा हमारे धर्म और संस्कृति के आधार ग्रन्थ वेदों में वास्तुशास्त्र और वास्तुविज्ञान का विशद वर्णन उपलब्ध है। इस सम्पूर्ण संसार में सबसे प्राचीन ग्रन्थ वेद हैं और पर्याप्त उन्नत थी वैदिक सभ्यता, इसे तो आज का विज्ञान भी मानता है। नगर बसाने और भवनों का निर्माण करने के लिए भूमि के चयन, भूमि के शुद्धिकरण और फि़र भवन के विभिन्न खण्ड किस-किस दिशा में हों, इस बारे में ऋगवेद में अनेक ऋचाएं उपलब्ध है। अथर्ववेद में तो सैकड़ों ऋचाओं और श्लोकों का एक पूरा खण्ड ही वास्तुशास्त्र के बारे में है। वेदों का कथन है कि इस वास्तुज्ञान के नियमों की रचना और उनका व्यावहारिक प्रयोग सबसे पहले देवताओं के शिल्पी और भगवान कृष्ण की द्वारिका तथा रावण की लंका सहित अनेक पुरियों और नगरों के निर्माता स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने किया था। यही कारण है कि प्राचीन काल में लगभग सभी ऋषि-मुनि अपने आश्रमों के लिए भूमि के चयन से लेकर यज्ञशाला, पशुशाला, अध्ययन कक्षों और रहने के लिए कमरों का निर्माण ही नहीं, कुआं खोदने तथा वृक्ष लगाने तक में वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करते थे।
मोहनजोदाड़ों और हड़प्पा की सभ्यताएं वैदिक कालीन हैं अथवा उससे भी प्राचीन इस पर मत भिन्नता हो सकती है परन्तु संसार की छह प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है मोहनजोदाड़ों और हड़प्पा की सभ्यता। वहां खुदाइयां करने पर भवनों, सड़कों और सार्वजनिक स्थलों के जो अवशेष प्राप्त हुए हैं, वे सभी वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों को ध्यान में रखकर बनाए गए थे, इस बात में रंचमात्र भी संदेह नहीं। चीन में ह्नांगहों नदी के किनारे विकसित हुई सभ्यता भी प्राचीनतम छह सभ्यताओं में एक है। वहां के निवासी तो हमारे यहां से भी अधिक वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों का पालन करते थे। यह बात दूसरी है कि चीनी भाषा में वास्तुशास्त्र को फ़ेंगशुई कहा जाता है।
नील नदी के किनारे विकसित नींलघाटी की सभ्यता में भी सभी बड़े भवन और पिरामिड वास्तुशास्त्र के नियमों के आधार पर ही निर्मित किए गए थे। कहने के भाव यही है कि वास्तुशास्त्र न तो कोई नई अवधारणा है और ना ही कोई सनक बल्कि जीवन को सुखी बनाने, दुर्भाग्य को कम करके, सौभाग्य बढाने वाली एक प्राचीनतम कला है और इसका पालन हमारी आज की अधिकांश समस्याओं का समाधान कर सकता है।
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