





हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति सर्वाधिक प्राचीन हैं, इसका महत्व इस दृष्टि से भी अधिक है, कि यहां लोगों में परस्पर स्नेह, अपनत्व और आदर की भावना है तथा हमारे जीवन के जो भी सूत्रधार रहे है, उनके प्रति मान सम्मान बनाए रखने का चिन्तन हमारे मानस पटल पर अंकित रहता ही है और उन्हें सम्मान प्रदान करते है।
मृत्यु के उपरान्त मानव का क्या होता है? यह प्रश्न अत्यन्त जटिल एवं प्राचीन काल से प्रायः अनुत्तरित चला आ रहा है। इसके विजय में तरह-तरह के विचार लोगों द्वारा दिए जाते हैं। लोग मृत्यु को भयावह समझते हैं और यह माना गया है, कि मृत्यु के समय व्यक्ति जो विचार रखता है, उसी के अनुसार उसकी जीवात्मा का संक्रमण होता है। पुराणों के अनुसार जब व्यक्ति मर जाता है, तो उसकी आत्मा अति वाहिक शरीर धारण कर लेती है, जिसमें केवल तीन तत्व – अग्नि, वायु एवं आकाश की शेष बचे रहते हैं, जो शरीर से ऊपर उठ जाते है और पृथ्वी, जल नीचे रह जाते है।
शव दाह के समय से लेकर 10 दिन तक, जो पिण्डदान किए जाते है, उनसे आत्मा एक दूसरा शरीर धारण कर लेती है, जिसे भोग देह (पिण्ड का भोग करने वालाद्ध कहा जाता है और वर्ष के अन्त में जब सपिण्डी श्राद्ध होता है, तब आत्मा तीसरा शरीर धारण कर लेती है, जिसके द्वारा कर्मों के अनुसार उसकी गति होती है अर्थात् स्वर्ग या नरक प्राप्त होता है।
वस्तुतः श्राद्ध के महत्व को स्पष्ट करते हुए शास्त्रों में कहा गया है, कि जिस मृतक के लिए पिण्डदान अथवा सोलह श्राद्ध नहीं किए जाते है, वह पिशाच की स्थिति में रहता है-
वस्यैतानि न दीयन्त प्रेत श्रद्धानि षोडशः।
पिशाचत्वं ध्रुवं तस्य दत्तैः श्राद्ध शतैरपि।।
ब्रह्म पुराण में इस अवस्था को यातनाएं पाने वाली अवस्था कहा है। पद्म पुराण के अनुसार जो लोग पाप कर्म करते रहते है, वे मृत्यु के उपरान्त भी भौतिक शरीर के समान कष्ट भोगने हेतू एक शरीर पाते है।
भारतीय प्राचीन धर्म ग्रन्थों में पितरों को सम्मान देने का विशेष उल्लेख मिलता है। इनमें ‘पितृ’ का अर्थ है पिता, किन्तु ऋगवेद में पितरः शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है-
1- व्यक्ति के मृतक पूर्वज तथा 2- प्राची पूर्वज, जो पृथक लोक के अधिावासी है। ‘स्कण्दपुराण’ में पितरों की नौ श्रेणियां दी हैं, इसमें- अग्निष्वता, वर्हिषद, आज्यपा, सोमपा, रश्मिपा, उपहूता, आयन्तुन, श्राद्ध भुज एवं नादी मुख।
‘मनु स्मृति’ में भी कहा गया है, कि मानव सन्तति उत्पन्न कर मृत्यु के पश्चात् पितृ बन जाता है और पितर रूप में अपने सत्कर्मों के बल पर देवत्व प्राप्त करता है।
अतः पितृ वर्ग सर्वथा एक अलग वर्ग है, जो अत्यधिक पवित्र और उच्चकोटि का वर्ग है, जिस प्रकार देव वर्ग, ऋषि वर्ग, किन्नर वर्ग आदि उच्चकोटि की योनियां हैं।
पितृ वर्ग की तुलना साक्षात् भगवान ब्रह्मा से की गई है और यह वर्णित किया गया है कि भगवान ब्रह्मा भी इनकी सन्तुष्टि का प्रयास करते है। उक्त नौ प्रकार के पितृ वर्गों में सौमप नामक पितर वर्ग से ही सम्पूर्ण प्रजा सृष्टि का जन्म हुआ है।
इस जगत का अस्तित्व जितना हमारे चक्षुओं से दिखाई पड़ता है यह उतना ही सीमित नहीं है, अपितु सूक्ष्म जगत में अनेक भेद छुपे हुए है, जिन्हें तर्क और बुद्धि से नहीं अपितु चेतना, साधना और प्रज्ञा से ही अनुभव किया जा सकता है। पितृ वर्ग का सम्पूर्ण क्रिया-कलाप इसी प्रकार की घटना है। शास्त्रों में स्पष्ट किया गया है, कि पितर श्रेणी धारण करने पर पूर्वजों की शान्ति एवं तृप्ति के लिए श्राद्ध कर्म किए जाते है। ‘ब्रह्म पुराण’ के अनुसार जो कुछ काल, पात्र एवं स्थान के अनुसार विधि विधान पूर्वक पितरों को लक्ष्य करके श्रद्धा पूर्वक ब्राह्मणों को दिया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है।
‘गरुड़ पुराण’ व अन्य पुराणों में स्पष्ट लिखा है, कि पितरों को श्राद्ध में दिए गए पिण्डों से पितर संतुष्ट होकर अपने वंशजों की जीवन, सन्तति, सम्पत्ति, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष आदि सभी सुख देते है।
श्राद्ध कर्म की उत्पत्ति के विजय में धार्म शास्त्रकारों का कहना है, कि प्राचीन समय में मनुज्य तथा देव इसी लोक में रहते थे। देवगण ‘यज्ञों’ के फ़लस्वरूप स्वर्ग जा सके, अतः जो लोग देवों के अनुसार यज्ञ सम्पन्न करते हैं, वे स्वर्ग में देवों तथा ब्रह्मा के साथ निवास करते है। इसमें जो लोग पीछे रह गए, उनके लिए मनु ने श्राद्ध क्रिया पद्धति प्रारम्भ की है, जो पितरों को मुक्ति एवं आनन्द प्रदान करने में सहायक है।
‘स्कन्द पुराण’ के अनुसार ‘श्राद्ध’ नाम इसलिए पड़ा है, क्योंकि इसके मूल में श्रद्धा निहित है।
‘गरुड़ पुराण’ के अनुसार श्राद्ध में जो कुछ दिया जाता है, वह पितरों द्वारा प्रयुक्त होने वाले उस भोजन में परिवर्तित हो जाता है, जिससे वे कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धान्त के अनुसार नए शरीर के रुप में पाते है। श्राद्ध कर्म के अधिाकारी के सम्बन्धा में कुछ धार्म शास्त्रें जैसे विज्णु धार्म सूत्र आदि में कहा गया है, कि जो कोई मृतक की सम्पत्ति प्राप्त करता है, उसे मृतक के लिए श्राद्ध करना चाहिए।
‘मनुस्मृति’ में स्पष्ट किया गया है, कि अल्पवयस्क पुत्र भी यद्यपि वह उपनयन विहीन होने के कारण वेदाधययन रहित है, फि़र भी वह अपने पिता को जल तर्पण कर सकता है। याज्ञवल्क्य ने पौत्र को भी श्राद्ध का अधिाकारी माना है।
वस्तुतः श्राद्ध का अर्थ केवल ब्राह्मणों को भोजन कराना ही नहीं होता है, यह तो श्रद्धा व्यक्त करने का स्थूल रूप है। शास्त्रें में श्राद्ध के 12 प्रकार वर्णित किए गए है और उससे स्पष्ट होता है, कि श्राद्ध कर्म तो ऐसी प्रक्रिया है, जिसे प्रत्येक शुभ व मंगल अवसर पर किया जाता है। विवाह, सीमान्तोन्नयन, पुंसवन आदि संस्कारों के समय भी श्राद्ध की क्रिया सम्पन्न करने का विधाान है। इसका आशय यह है, कि हमारे जीवन की प्रत्येक घटना चाहे वह कितनी भी छोटी क्यों न हो, हमारे पितरों की सूक्ष्म उपस्थिति में घटित हो, हमें उनका आशीर्वाद प्राप्त हो तथा सबसे बड़ी बात, हमें उनसे सदैव सुरक्षा चक्र प्राप्त हो।
यह विश्वास है, कि परिवार के मृत सदस्य प्रत्येक अमावस्या को सन्तुष्टि प्राप्ति हेतू अपने वंशजों के द्वार पर उपस्थित होते हैं, किन्तु पितृ पक्ष में तो ये पूरे पंद्रह दिन तक सूक्ष्म रूप में अपने वंशजों के द्वार पर खड़े रहते है। यदि उस अवधिा में उन्हें अपने वंशजों से तर्पण आदि प्राप्त नहीं होता है, तो वे पितृ पक्ष बीत जाने के उपरान्त भी प्रतीक्षा करते रहते हैं और जब तक सूर्य का संक्रमण वृश्चिक राशि में नहीं हो जाता है, तब तब वे घोर पीड़ा के साथ प्रतीक्षा करते रहते हैं तथा अन्त में निराश होकर वापस लौट जाते हैं, जिसका प्रभाव परिवार पर अच्छा नहीं पड़ता है।
यहां पर यह बात धयान देने योग्य है-यह आवश्यक नहीं है कि परिवार के मृत सदस्य प्रेत योनि में ही हो। वे जन्म तथा मरण के मधय एक विचित्र सी अतृप्तावस्था में भी रह जाते है। जो प्रेत-योनि में चले जाते है, उनकी मुक्ति के उपाय परिवार के सदस्यों द्वारा न किए जाने पर वे उस परिवार में भयंकर उत्पात एवं कलह उत्पन्न कर देते है।
अतः हमारे धर्म शास्त्रों में मनुष्य की मृत्यु के उपरान्त उसकी आत्मा के कल्याण के लिए शास्त्रोक्त विधिा-विधान दिए है, मृतक सदस्य को पितृ वर्ग में सम्मिलित करने के लिए उपाय वर्णित किए गए है और प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने के उपाय स्पष्ट किए गए है। यह भी एक विडम्बना है, कि जहां कोई श्रद्धालु व्यक्ति अपने पूर्वजों की तृप्ति हेतु शास्त्रोक्त क्रिया पद्धति सम्पन्न नहीं कराना चाहता है, तो वहां उसे केवल भोजन ग्रहण करने वाले ब्राह्मण ही मिलते है। शास्त्रों के ज्ञाता और उच्चकोटि के विद्वान तो बहुत ही कम रह गए है। महानगरों के विस्तार के कारण भी ऐसा सुलभ नहीं रह गया है, कि उसे कर्मकाण्डी ब्राह्मण मिल ही जाए। ऐसी स्थिति में साधनात्मक मार्ग अपनाया जा सकता है।
कृष्ण पक्ष की अश्विन महीने की प्रतिप्रदा से अमावस्या तक के दिन श्राद्ध कहलाते है। जिस महीने की जिस तिथि को किसी भी सम्बन्धी का देहान्त हुआ हो, उसी तिथि को उसका श्राद्ध किया जाता है। यदि अपने पूर्वजों की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, तो वे सर्व पितृ दिवस अमावस्या को पितृ सन्तुष्टि साधना सम्पन्न कर सकते है।
1- यह साधना आप 13-9-2011 से 27-9-2011 के बीच कभी भी सम्पन्न कर सकते है।
2- इस साधना में आवश्यक सामग्री ‘पितृ सन्तुष्टि यंत्र’ गुटिका तथा हकीक माला है।
3- साधक सफ़ेद वस्त्र धारण करें तथा सफ़ेद ऊनी आसन पर बैठें।
4- लकड़ी के बाजोट पर सफ़ेद वस्त्र बिछाकर उस पर कुंकुम से रंगे चावलों के द्वारा अष्टदल कमल बनाएं। उस पर पुज्प की पंखुडि़यां डालते हुए यंत्र का स्थापन करें।
5- ‘पितृ सन्तुष्टि यंत्र’ गुटिका का पूजन कर धयान करें।
6- पितरों का धयान करते हुए पुज्प यंत्र और गुटिका पर चढ़ाएं।
7- ‘हकीक माला’ से निम्न मंत्र की 31 माला मंत्र जप करें।
अगले दिन समस्त साधना सामग्री नदी में विसर्जित कर दे। श्राद्ध के दिन हम शुद्ध पवित्र होकर भोजन बनावें और यथा योग्य एक या अधिक ब्राह्मणों को बुलाकर भोजन करावें अथवा किसी मन्दिर में भोजन सामग्री (चावल, दाल, आटा, आदि) अपनी सामर्थ्यानुसार दान करें।
विधिपूर्वक श्राद्ध कर्म करने से पितर तृप्ति प्राप्त करते है, जिससे उनके वंशजों को पुण्य प्राप्ति के साथ-साथ उनके जीवन में सुख-सन्तोष का आगमण होता है।
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