





आकाश अनन्त है और कोई बन्धन स्वीकार नहीं करता। इसी प्रकार आकाश तत्व की प्रधनता वाले व्यक्ति प्रायः ही जीवन के सभी क्षेत्रों में आशातीत सफ़लताएं प्राप्त करते है, परन्तु किसी का बन्धन नहीं मानते। इन सभी के विपरीत वायु तत्व की प्रधनता वाले व्यक्ति वायु के समान ही अत्यन्त चंचल होते है और लगातार कोई काम कर ही नहीं पाते। जीवन में सफ़लता के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति में जिस तत्व की प्रधनता है, वह उसी के अनुरूप अपने लिए कार्य का चयन करे। वायु तत्व की प्रधनता वाले व्यक्ति बहुत ही अच्छे टूरिंग-एजेंट, सेल्समैन और भागदौड़ के कार्य करने वाले सिद्ध होते है, तो जल तत्व की अधिकता वाले व्यक्ति प्रायः ही सफ़ल प्रबन्धक सिद्ध होते है। एक ही जगह लगातार बैठे रहकर किए जाने वाले कार्यों को भूमितत्व की अधिकता वाले व्यक्ति अधिक पसन्द करते है, तो अग्नि तत्व की प्रधनता वाले व्यक्ति लगातार कठोर शारीरिक श्रम करते रह सकते है।
आप छोटा सा मकान बनाएं अथवा भव्य भवन, प्लाट मात्र पच्चीस-पचास मीटर को हो अथवा हजारों मीटर का सभी में उपरोक्त पांच तत्व होते है। परन्तु ये पांचों तत्व सम्पूर्ण प्लाट में समान रूप से फ़ैले हुए अथवा मिश्रित अवस्था में नहीं होते। प्लाट में प्रत्येक तत्व के लिए एक दिशा विशेष निर्धारित है, जबकि प्लाट का मध्य भाग आकाश तत्व के लिए निर्धारित होता है। इसके लिए आप दिए गए रेखा चित्र को भली प्रकार अपने मन-मस्तिष्क में बसा लीजिए।
जीवन में त्वरित सफ़लता प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अपनी अभिरूचि और क्षमता अर्थात् तत्व की प्रधनता के अनुरूप व्यवसाय, व्यापार अथवा नौकरी का चयन करे। ठीक इसी प्रकार घर में सुख-शान्ति, रहने वालों की उन्नति और अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है कि मकान में विभिन्न प्रयोगों के लिए कमरे, रसोई घर और भण्डार घर तथा बाथरूम आदि दिए गए चित्र को धयान में रखकर ही बनवाए जाएं। यद्यपि चित्र आपको आधारभूत जानकारियां प्रदान कर रहा है, फि़र भी आपकी विशेष सुविधा के लिए इसकी संक्षिप्त व्याख्या की जा रही है।
1- आकाश तत्व का स्थान प्लाट का मध्य भाग भवन के मध्यवर्ती भाग में खुला हुआ आंगन रखने की परम्परा वैदिक काल से हो रही है। आप कोई भी प्राचीन हवेली देखें अथवा महल, धर्मशाला हो या मन्दिर सभी के मध्यवर्ती भाग में खुला हुआ विशाल आंगन या सहन होता था। इस भाग के ऊपर कोई छत तो होती ही नहीं, इसे प्रयोग भी कम-से-कम किया जाना चाहिए। आजकल भवनों के नक्शे बनाने वाले सबसे बड़ी त्रुटि ही यह करते है कि मकान के आगे, पीछे अथवा साइड में तो खुला हुआ स्थान छोड़ देते है और मध्यवर्ती भाग में सबसे महत्वपूर्ण कमरे बना देते है। आप इस मध्यवर्ती भाग को अवश्य खुला रखिए। यदि प्लाट छोटा है और उस पर पूरी छत डालना आपको विवशता है, तब भी इस मध्यवर्ती भाग में एक जंगला अथवा टट्टर अवश्य लगवाएं।
2- जल का स्थान उत्तर-पूर्व अधिकांश व्यक्ति सबसे बड़ी त्रुटि ही यह करते है कि प्लॉट के किसी भी बेकार कोने में, सीढि़यों के नीचे अथवा बेडरूमों के साथ ही बाथरूम आदि बना लेते है। इन कार्यों के लिए उत्तर-पूर्व दिशा का प्रयोग करना ही उचित है। यद्यपि छोटे प्लॉटों में जिनका मुख्य द्वार दक्षिण अथवा पश्चिम दिशा में होता है, उनमें उत्तर पूर्व का कोना इतना अन्दर की तरफ़ होता है कि उधर बाथरूम, लेट्रीन, हैण्डपम्प और भूमिगत जलाश्य (underground water tank) बनाना सहज ही संभव नहीं हो पाता। छोटा प्लाट होने पर इसका एक आसान समाधन यह है कि आप छत के ऊपर रखी जाने वाली पानी की टंकी इस दिशा में रख लें।
3- अग्नि का स्थान दक्षिण-पूर्व जल के स्थान उत्तर-पूर्व में रसोईघर भूलकर भी न बनवाएं। घर में रसोईघर और रसोईघर के भण्डार (Kitchen and Store) के लिए सबसे अच्छा स्थान दक्षिण-पूर्व दिशा का कोना है। कारखानों में भट्टियों, बायलर, बिजली के स्विच बोर्ड का कमरा आदि इस दिशा में बनाना ही उचित है। अग्नि और जल में परस्पर वैर है अतः इन दोनों की ही दिशाओं में ध्यान रखना आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है।
4- स्थाइत्व का प्रतीक दक्षिण-पश्चिम प्लाट का दक्षिण-पश्चिम का हिस्सा भूमि तत्व का स्थान है। इस जगह जो भी वस्तुएं रखी जाती है, वे सभी घर में स्थिर रूप में वास करती रहती है। यही कारण है कि घर की महत्वपूर्ण वस्तुएं और धन सम्पत्ति रखने का कमरा तो इस दिशा में होना चाहिए, गृहस्वामी और पुत्रों के शयनकक्ष भी दक्षिण-पश्चिम दिशा में बनवाएं जाने चाहिए। परन्तु मेहमानों की बैठक और कुंवारी लड़कियों के शयनकक्ष इस दिशा में भूलकर भी न रखें। जिन परिवारों के शयनकक्ष दक्षिण-पश्चिम दिशा में होते है, उनमें लड़कियों की शादी में अकारण ही विलम्ब उत्पन्न होते रहते है।
5- वायु सदृश्य चंचल उत्तर-पश्चिम दक्षिण-पश्चिम भूमि तत्व का स्थान है, तो उत्तर-पश्चिम वायुदेव का स्थान। चंचलता और हर समय बहते रहना वायु का सहज स्वभाव है और यही कारण है कि धन-सम्पत्ति, घर या कार्यालय की कीमती और महत्वपूर्ण वस्ततुएं रखने तथा गृहस्वामी के बेडरूम के लिए दिशा उचित नहीं। परन्तु मेहमानों के ठहरने व खाने और कुंवारी कन्याओं के बेडरूम तथा घर की बैठक के लिए यह दिशा सर्वश्रेष्ठ है। दुकानों में काउन्टर और स्टोर तथा कारखानों में तैयार माल का स्टोर इस दिशा में रखना सर्वश्रेष्ठ रहता है, क्योंकि इस दिशा में रखी हुई वस्तुएं तेजी से बिक जाती है। संतुलित शोर संगीत कहलाता है, परन्तु कोई भी एक वाद्ययन्त्र बेसुरा बजे तो संगीत का सारा आनन्द और आकर्षण समाप्त हो जाता है और सुर-ताल में बज रहे वाद्य भी बेसुरे होने लगते है। ठीक यही स्थिति भवन का नक्शा बनाते, भवन का निर्माण करते अथवा निर्मित भवन में सुधार करके वास्तु दोषों का समायोजन करते समय इन पंच तत्वों के संतुलित समन्वय की है। वैसे भी वास्तुशास्त्र का मूलाधार है पंच तत्वों और उनकी दिशाओं का यह ज्ञान। अगले अंक में हम चर्चा करेंगे अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं की।
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