





यन्त्र का विधन तो प्राचीन काल से है, श्री यन्त्र, कनकधारा यन्त्र आदि इसी परम्परा से है। उड़ीसा में रहने वाले एक साधु के पास भोज पत्र पर लिखी हुई एक पुस्तिका प्राप्त हुई, जिसमें लक्ष्मी से सम्बन्धित अचूक प्रयोग दिये हुए थे।
उन्हीं प्रयोगों के माध्यम से वह साधु जंगल में भी आनन्दपूर्वक रहता था। उसके पास धन की कोई कमी नहीं थी, झोली से वह जितना भी और जो भी चाहता वह उसे प्राप्त हो जाता था। बातचीत के प्रसंग में उस साधु ने यह स्वीकार किया कि इस पुस्तिका में जो लक्ष्मी से सम्बन्धित यन्त्र एवं प्रयोग दिये है, उसको करने से ही मेरे जीवन में यह अनुकूलता प्राप्त हुई है और मैनें जिन-जिन शिष्यों को या ग़ृहस्थ भक्तों को यह साधनाएं बताई है, उन्होनें ऐसा करके पूर्ण सफ़लता प्राप्त की है और उनके जीवन में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहा।
उसी पुस्तिका में दिये हुए कुछ प्रयोग आपके सामने स्पष्ट किये जा रहे है।
किसी भी सोमवार को यह प्रयोग सम्पन्न किया जा सकता है, पर यदि कार्तिक मास में किसी सोमवार को यह प्रयोग सम्पन्न करें तो यह ज्यादा अनुकूल रहता है।
रात्रि के समय साधक केवल एक धोती पहन कर बैठे, यदि स्त्री साधिका हो तो केवल एक साड़ी पहने, जो कि पीले रंग में रंगी हुई हो। उसके बाद सामने पांच तेल के दीपक लगा ले, और किसी थाली में निम्न प्रकार से चिरस्थायी लक्ष्मी यन्त्र बनाये। यह अंकन त्रिगन्ध से हो, त्रिगन्ध में कुंकुम, केसर, कपूर होता है। इसमे मात्र कम ज्यादा हो सकती है। थाली स्टील या लोहे की न हो, इसके अलावा किसी भी धातु की हो सकती है।
यन्त्र
| 1 | 3 |
| 5 | 7 |
यन्त्र बनाते समय साधक ऊँ महालक्ष्म्यै नमः का निरन्तर उच्चारण करता रहे, और फि़र इस यन्त्र के चारों ओर चार दीये रख दें, और एक दीया बीच में रख दें। फि़र इस यन्त्र के आगे पांच चावल की ढ़ेरिया बनाये और प्रत्येक ढ़ेरी पर एक एक रुद्राक्ष, जो कि गोल आक़ृति का हो, रख दें। इस प्रकार इस प्रयोग में पांच एक मुखी रुद्राक्ष का प्रयोग होता है।
इसके बाद इनकी जलसे, कुंकुम से पूजा करें और पांचों पर एक एक गुलाब का पुष्प चढ़ाये, और फि़र सामने बैठ कर कमल गट्टे की माला से 11 माला मन्त्र जप निम्न मन्त्र की करें।
जब मन्त्र जप पूरा हो जाय, तो साधक उन पांचों रुद्राक्षों के सामने दूध का बना हुआ प्रसाद चढ़ाये, और फि़र थोड़ा थोड़ा प्रसाद स्वयं ग्रहण कर लें। रात को वहीं पर सोये, दूसरे दिन सुबह उठ कर वह प्रसाद तो बालकों में और परिवार के लोगों में वितरित कर दें और उन पांचों रुद्राक्षों तथा चावल को घर में ही जमीन मे गाड़ दें, तो चिरस्थायी लक्ष्मी प्रयोग सम्पन्न होता है, और आगे के पूरे जीवन में घर में लक्ष्मी का वास निरन्तर बना रहता है।
दीपक सारी रात जलते रहें, सुबह उन दीपकों को घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर फ़ेंक दें। इस प्रकार यदि इस प्रयोग को कार्तिक मास के किसी भी सोमवार को सम्पन्न किया जाय तो इसके तुरन्त आश्चर्यजनक परिणाम देखने को मिलते हैं ।
इस प्रयोग को किसी भी शुक्रवार को सम्पन्न किया जाता है, और यह अचूक है। इस प्रयोग को करने से घर की दरिद्रता समाप्त होती ही है और आश्चर्यजनक रूप से व्यापार व़ृद्धि, आर्थिक उन्नति, प्रमोशन और लाभ प्राप्त होने लगते है। वास्तव में ही यह प्रयोग कलियुग में एक वरदान स्वरूप है।
शुक्रवार की रात्रि को साधक स्नान कर के पीली धोती पहन कर बैठ जाय, और सामने भोज पत्र पर निम्न भाग्योदय लक्ष्मी यन्त्र का निर्माण त्रिगन्ध से करें, भोज पत्र चार अंगुल लम्बा तथा चार अंगुल चौड़ा होना चाहिए ।
जब इस भोज पत्र पर यन्त्र का निर्माण हो जाय तो इस यन्त्र के चारों ओर 108 बार श्रीं अक्षर लिखें और यन्त्र के मध्य में बिल्ली की नाल स्थापित कर दें ।
इसके बाद बिल्ली की नाल को भगवती लक्ष्मी का स्वरूप मान कर उसकी जल से, केसर से, चावलों से, पुष्पों से, और नैवेद्य से पूजा करें और फि़र उसके सामने ही तीन तेल के दीपक लगाये जो कि सारी रात जलते रहने चाहिए। इसके बाद वहीं पर बैठ कर तीन माला मन्त्र जप कमल गट्टे की माला से करें ।
जब मन्त्र जप पूरा हो जाय तो साधक वहीं पर रात्रि को सो जाय और सुबह उठ कर उस बिल्ली की नाल को भोज पत्र में लपेट कर अपने सन्दूक में रख दें, तो कुछ ही दिनों में आश्चर्यजनक रूप से आर्थिक उन्नति और व्यापार व़ृद्धि अनुभव करेंगें।
यदि साधक का व्यापार हो तो व्यापारिक स्थल पर भी इस प्रकार के भोज पत्र को बिल्ली की नाल में लपेट कर रख सकता है ।
वास्तव में ही यह प्रयोग अपने आप में अचूक और अद्वितीय है। कार्तिक मास में यह प्रयोग करने पर विशेष अनुकूलता अनुभव होती है ।
यह प्रयोग किसी भी मंगलवार को सम्पन्न किया जाता है। उस पुस्तक मे बताया गया है कि मंगलवार की आधी रात को साधक लाल धोती या स्त्री साधिका हो तो लाल साड़ी पहन कर बैठ जाय और सामने एक बड़ा सा तेल का दीपक लगा दे । इसके बाद एक कांसे की थाली या कांसे की प्लेट को दीपक की लौं के ऊपर थोड़ी देर रखने पर उस थाली में कालिख सी लग जायेगी ।
फि़र किसी तिनके से उस कालिख में ही भगवती लक्ष्मी का चित्र बनाये। यदि आप अच्छे चित्रकार न हो तो इसमे चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। एक स्त्री की आक़ृति बना दे जो लक्ष्मी जैसी हो। फि़र इस थाली को अपने सामने रख दें, और उस लक्ष्मी के चित्र के चारों ओर 21 कमल के बीज रख दें ।
इसके बाद उस लक्ष्मी के चित्र और उन कमल बीजों की पूजा करे, उसके सामने भोग लगाये और निम्न मन्त्र की 21 माला मन्त्र जप करें। इस मन्त्र जप मे मूंगे की माला का ही प्रयोग किया जाता है ।
जब मन्त्र जप पूरा हो जाय तब चढ़ाये हुए प्रसाद को थोड़ा सा ग्रहण कर ले और रात्रि को वहीं सोये। दीपक रात भर जलता रहना चाहिए। सुबह उठ कर कमल बीजों को अपने घर में जमीन में गाड़ दे तो आगे के जीवन भर के लिये घर में लक्ष्मी का वास बना रहता है, और साधक अपने जीवन में निरन्तर उन्नति करता रहता है ।
इस लेख में जहां जहां पर भी जमीन में गाड़ने का विधान आया है, यदि साधक चाहे तो लाल वस्त्र में उन वस्तुओं को बांध कर घर के किसी कोने में रख दे तो वह भी गाड़ा हुआ ही माना जाता है ।
यह प्रयोग अपने आप में अत्यन्त महत्वपूर्ण है और चमत्कारिक है, यदि साधक कार्तिक मास में इस प्रयोग को करे तो और ज्यादा अनुकूलता प्राप्त होती है ।
यह एक ऐसा प्रयोग है जिसके माध्यम से यदि साधक चाहें तो जुए में विशेष सफ़लता प्राप्त कर सकता है। यह प्रयोग किसी भी रविवार की रात्रि को सम्पन्न किया जा सकता है। यदि कार्तिक मास में यह प्रयोग करें तो और विशेष अनुकूलता प्राप्त होती है ।
साधक को चाहिए कि वह रविवार की रात्रि को सर्वथा नग्न हो कर स्नान करे और फि़र पहले से ही धो कर सुखाये हुए वस्त्र को पहन ले। इसमे किसी भी प्रकार का वस्त्र पहना जा सकता है ।
इसके बाद सामने एक सफ़ेद कगज का टुकड़ा रख दे और उस पर केसर से निम्न यन्त्र का अंकन करे ।
यन्त्र श्री
फि़र यन्त्र के मध्य में मन्त्र सिद्ध हत्था जोड़ी को रख दे। यह हत्था जोड़ी असली, प्रामाणिक और लक्ष्मी मन्त्रों से सिद्ध हो ।
| श्रीं | श्रीं | श्रीं |
| श्रीं | श्रीं | श्रीं |
| श्रीं | श्रीं | श्रीं |
हत्था जोड़ी तो भगवती लक्ष्मी का साक्षात स्वरूप मानी गयी है। फि़र हत्था जोड़ी को सिन्दूर से रंग दे, साधक को चाहिए कि वह सिन्दूर पहले से ही मंगा कर रखे और तेल या घी में सिन्दूर को घोल कर इस हत्था जोड़ी पर लगा दे और उसे यन्त्र के मध्य में स्थापित कर दें ।
इसके बाद जल, केसर, चावल, पुष्प और प्रसाद से हत्था जोड़ी और यन्त्र का पूजन करें और कमल गट्टे की माला से निम्न मन्त्र की 1 माला फ़ेरे। ऐसा करने पर हत्था जोड़ी पूर्ण सिद्ध हो जाती है ।
रात्रि को साधक वहीं पर सोये पास में एक डायरी और पेन रख दें, जिससे कि रात्रि को जिस प्रकार का स्वप्न आये, या स्वप्न में जो आदेश मिले, उसको कागज पर याद रखने के लिये लिख सके ।
दूसरे दिन सुबह उठ कर स्नान कर जिस कागज पर यन्त्र अंकन किया था, उस कागज में उस हत्था जोड़ी को लपेट ले और उस पर गुलाबी रंग का धागा लपेट कर बांध दें।
इसके बाद साधक जब भी जुआ खेलने जाय, या घुड़ दौड़ या इसी प्रकार के किसी कार्य में जाय तो उसे पूरी सफ़लता मिलती है, और जब वह जुआ खेलता है, तो बराबर जीतता जाता है। यह अपने आप मे अदभुत और प्रामाणिक प्रयोग है, इस प्रयोग के माध्यम से कई साधकों ने लाभ उठाया है ।
वास्तव में ही भारतीय साधना साहित्य में कई ऐसे महत्वपूर्ण प्रयोग है, जो अपने आप में आश्चर्यजनक हैं, आवश्यकता है, धैर्य की, विश्वास की और पूरी क्षमता के साथ साधना सम्पन्न करने की ।
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