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दीपावली की रात्रि को लक्ष्मी भगवान विष्णु की सेवा से अवकाश लेकर धरती पर आती है, और वर्ष की इस रात्रि को प्रत्येक घर में जाती है जहां उसकी पूजा होती है, जहां उसकी आराधना-अर्चना होती है और फि़र यदि उस महालक्ष्मी की विशेष तांत्रोक्त पद्धति से पूजा करते हुए इस रात्रि को साधना की जाए, तो लक्ष्मी को मात्र इस रात्रि को घर में आना ही नहीं पड़ता अपितु वर्ष भर के लिए घर में ही रह जाने के लिए बाध्य हो जाना पड़ता है। तांत्रोक्त पूजन का यही तात्पर्य है।
दीपावती का पर्व केवल इसलिए नहीं मनाया जाता है कि भगवान राम लंका विजय कर वापस अयोध्या पधारे थे। यह तो महापूजा की रात्रि होती है, जिसमें जलाई गई ज्योति पूरे वर्ष भर साधक के घर को जगमग करती रहती है। इस दिन जो प्रसन्नता का वातावरण बने वह पूरे वर्ष बना रहे, इस दिन जो संकल्प लें, आराध्या महालक्ष्मी का जो आवाहन करें, वह पूर्ण हो। यह सिद्धि दिवस अलग-अलग प्रांतों में अलग नामों से मनाया जाता है, पंजाब में वैशाखी के रूप में, केरल में पोंगल के रूप में, उत्तर भारत में दीपावती के रूप मं, दक्षिण में गुड़ीपाड़ा के रूप में आदि। मूल रूप में यह उस दिवस, क्षण या मुहूर्त की विशेषता होती ही है, कि सभी पर्व एक साथ घटित होते हैं।
महालक्ष्मी तुम ही सब कुछ हो – यह मानव का स्वभाव रहा है, कि जो भी वस्तु उसे अच्छी लगती है, उसका संग्रह करना प्रारम्भ कर देता है। कोई पशु पक्षी अपने स्वयं के लिए वर्ष भर चारा-दाना एक साथ लाकर नहीं रखता, जबकि उसके सामने पूरा हराभरा जंगल हेाता है। इस संग्रह प्रवृति के पीछे केवल इतना ही है कि मनुष्य में आत्मविश्वा की कमी है। वह जानता है कि यदि किसी कारणवश बुरे दिन देखने पड़ गए तो और कोई भी काम नहीं आएगा, चाहे वह मित्र हो, रिश्तेदार हो या भाई हो या ओर कोई अन्य। उसके पास जो संग्रह किया हुआ है वही उसके लिए उपयोगी रहेगा। अब प्रश्न उठता है कि किस-किस चीज का संग्रह करें, दुनिया में लाखों-लाखों वस्तुएं है ओर नित्य प्रति के क्रम में कई वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है यह सब मात्र एक महालक्ष्मी पूजन से ही साध्य हे।
इस बार दीपावली पूजन के लिए जो साधना सामग्री एवं यंत्र का निर्माण किया गया है, उनमें लक्ष्मी के 108 स्वरूपों का पूर्णता के साथ स्थापन करते हुए ही प्राण प्रतिष्ठित किया गया है। इस प्रकार के यंत्र साधकों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण और लाभकारी बन गया है। यंत्र के अलावा आठ अन्य सामग्री द्धकुल नौऋ है – जिन्हें लक्ष्मी की इन्हीं नौ कलाओं को साधक के शरीर में स्थापित करने हेतु मंत्र सिद्ध किया गया है।
प्राण प्रतिष्ठित महालक्ष्मी यंत्र, अष्ट लक्ष्मी सिद्धि फ़ल, सौभाग्यवर्धान नारियल, दारिद्र्य शमन हेरंब, निखिल सिद्धि गुटिका, वसुधा गोमती चक्र, ऋिद्धि सिद्धि बीज, कामदायिनी मुद्रिका, सिद्ध लक्ष्मी हकीक। दीपावती की रात्रि को स्नानादि कर शुभ मुहूर्त (वृषभ लग्न गोधूलि वेला में 6:01 से 7:53 तथा अर्धारात्रि सिंह लग्न में 12:21 से 2:45 तक है।) में उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख कर पूजा स्थान में आसन पर बैठ जाएं सामने लाल य श्वेत वस्त्र बिछाकर उसके ऊपर तांबे या स्टील की थाली रख उसकर ऊपर कुंकुंम से नीचे बने रेखा चित्रानुसार अंकन करें। सामने निर्विष्ट दिशाओं के अनुरूप अलग-अलग गोलों में अन्य सामग्रियों का स्थापन करें। पूर्व में सौभाग्यवर्धन नारियल, अग्नि कोण में दारिद्र्य शमन हेरम्ब, दक्षिण कोण में निखिल सिद्धि गुटिका, नैत्य कोण में वसुधा गोमती चक्र, पश्चिम कोण में ऋद्धि सिद्धि, वायव्य कोण में कामदायिनी मुद्रिका, उत्तर कोण सिद्धि लक्ष्मी हकीक, पाताल में महालक्ष्मी यंत्र।
इसके बाद अष्ट दल के मध्य में प्राण प्रतिष्ठा युक्त महालक्ष्मी यंत्र को स्थापित करें। अपने दाई ओर घी कर तथा बाई ओर तेल का दीपक जलाएं। अगरबत्ती जलाकर पूजन प्रारम्भ करें।
पवित्रीकरण
दाएं हाथ में जल लेकर निम्न मंत्र बोलते हुए स्वयं पर छिड़के –
ऊँ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वाऽवस्थां गतोऽति वा यः
स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं सः बाह्माभ्यन्तरः शुचिः।
आचमन
निम्न मंत्र बोलते हुए तीन बार आचमन करें
।। ऊँ केश्वाय नम:।।, ।। ऊँ नारायणाय नम:।।, ।। ऊँ माधवाय नम:।।
संकल्प
दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें –
ऊँ विष्णवे नम:। ऊँ विष्णवे नम:। ऊँ विष्णवे नम:।
हरि: ऊँ तत्सत् अद्य एतस्य ब्रह्मणो
द्वितीयपराद्र्धे अष्टाविंशति कलियुगे जम्बूदीपे
भरतखण्डे पुण्यक्षेत्रे मासानाम उत्तमें मासे कार्तिक
मासे कृष्ण पक्षे अमावस्या तिथौ शुक्रवासरे अमुक
गोत्रः (अपना गोत्र बोलें) अमुक शर्माऽहं (नाम
बोलें) श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थ महालक्ष्मी प्रीत्यर्थ
सकल दुःख दारिद्र्य नाश निमित्तं च महालक्ष्मी
पूजनं करिष्ये।
जल को भूमि पर छोड दें।
दीपक
दीपावली के अवसर पर एक बड़ा दीपक अवश्य जलाना चाहिए, जो रात्रि भर जलता रहे।
दीपक प्रज्ज्वलित करते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण करें ओर कुंकुंम अक्षत से पूजन करें –
भो दीप देव रूपस्त्वं कर्म साक्षी ह्मविधनकृत,
यावत्कर्म समाप्तिः स्यात् तावत त्वं सुस्थिरो भव।
हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर स्वस्ति वाचन पढ़ें।
ऊँ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा
विश्ववेदाः स्वस्ति नस्ताक्ष्यों अरिष्टनेमिः स्वस्तिनो
बृहस्पर्तिदधातु।
फि़र गुरु चित्र के समक्ष छोड़ दें।
गणपति पूजन
इसके बाद गणपति का विग्रह अथवा सुपारी पर मौली बांधा कर गणपति के रूप में किसी पात्र में स्थापित करें। निम्न मंत्र बोलते हुए गणपति पर कुंकुंम, अक्षत चढ़ाएं –
ऊँ लक्ष्मी नारायण्भ्यां नमः।
ऊँ उमामहेश्वराभ्यां नमः।
ऊँ वाणी हिरण्यगर्भाभ्यां नमः।
इष्ट देवताभ्यो नमः।
कुल देवताभ्यो नमः।
ग्राम देवताभ्यो नमः।
सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः।
निम्न ध्यान मंत्र बोलकर गणपति को पुष्प चढ़ाएं –
गजाननं भूत गणाधि सेवितं,
कपित्य जम्बू फ़ल चारु भक्षणं।
उमासुतं विनाशककारकं,
नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजं।।
गुरु पूजन
अपने सामने गुरु चित्र स्थापित करें और दीपावली के शुभ अवसर पर उनके आशीर्वाद की कामना करें –
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्र गुरवे नमः।
ऊँ मंगलमूर्ति निखिलेश्वराय नमः।
पाद्यं, अर्घ्य, स्नानं, धूप, दीपं, पुष्पाणि, नैवेद्यं,
निवेदयामि श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः।
कलश पूजन
एक अगल बाजोट पर चावल से स्वस्तिक बनाकर उस पर कलश को स्थापित करें। कलश में शुद्ध जल भर दें, उसके बाद उसमें चन्दन, अक्षत, सुपारी, डालें, गंगा जल द्धयदि हो तोऋ मिलाएं। कलश पर मौलि बांधो और निम्न मंत्र का पाठ करें –
युवा सुवासा परिवीत आगात् स उश्रेयान् भवति जायमानः,
तं धीरासः कवयः उन्नयन्ति साध्यो मनसा देवयन्तः।
इसके बाद नारियल में मौलि बांध ले और कुंकुम का तिलक करें, पांच आम या अशोक के पत्ते (यदि हो तो) कलश में डाल दें। इसके बाद दाहि ने हाथ में कलश का स्पर्श् करते हुए निम्न मंत्र का पाठ करें –
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः,
मूल तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृ गणास्थिता।
कुक्षौ तु सागरा सर्वे सप्त द्वीपा वसुन्धरा,
ऋग्वेदोऽथ्र यजुर्वेदो सामवेदः हाथर्वणः।
अंगैश्च सहिताः सर्वे कलशन्तु समाहिताः,
अत्र गायत्री सावित्री शान्ति पुष्टि करस्था।
आयान्तु यजमानस्य दुरितक्षय कारकाः।।
महालक्ष्मी पूजन विधान
महालक्ष्मी यंत्र पर दाहिनी हथेली रख कर निम्न मंत्र बोलकर यंत्र को अपने प्राणों से सम्बद्ध करने की क्रिया करें –
अस्मै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्मै प्राणा क्षरन्तु च।
अस्मै देवत्वं अर्चायै मां अहैति च कश्चन।।
अब महालक्ष्मी यंत्र का पूर्ण पूजन प्रारम्भ करें, इसमें पहले महालक्ष्मी की नौ कलाओं का पूजन, फि़र महालक्ष्मी यंत्र का पूजन और फि़र मंत्र जप एवं आरती, समर्पण, स्तुति सम्पन्न की जाती है।
1- अष्ट लक्ष्मी सिद्धि फ़ल: सर्वप्रथम थाली में कुंकुंम से बनाए स्वस्थित के ईशान कोण में रखे अष्ट लक्ष्मी सिद्धि फ़ल पर कुंकुंम और अक्षत चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का 5 बार उच्चारण करें।
2- सौभाग्यवर्धन नारियल: इसी प्रकार थाली के पूर्व में स्थित सौभाग्यवर्ध नारियल पर भी कुंकुंम एवं अक्षत चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का 5 बार उच्चारण करें।
3- दारिद्र्य शमन हेरम्ब: थाली के अग्नि कोण में स्थित हेरम्ब पर कुंकुंम एवं अक्षत चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का 5 बार उच्चारण करें।
4- निखिल सिद्धि गुटिका: थाली के दक्षिण कोण में स्थित निखिल सिद्धि गुटिका पर कुंकुंम एवं अक्षत चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का 5 बार उच्चारण करें।
5- वसुधा गोमती चक्र: थाली के नैत्य कोण में स्थित वसुधा गोमती चक्र पर कुंकुंम एवं अक्षत चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का 5 बार उच्चारण करें।
लाभ शुभ
6- ऋिद्धि सिद्धि चैतन्य बीज: थाली के पश्चिम कोण में स्थित ऋिद्धि सिद्धि चैतन्य बीज पर कुंकुंम एवं अक्षत चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का 5 बार उच्चारण करें।
7- कामदायिनी मुद्रिका: थाली के वायव्य कोण में स्थित कामदायिनी मुद्रिका पर कुंकुंम एवं अक्षत चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का 5 बार उच्चारण करें।
8- सिद्ध लक्ष्मी हकीक: थाली के उत्तर कोण में स्थित सिद्ध महालक्ष्मी हकीक पर कुंकुंम एवं अक्षत चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का 5 बार उच्चारण करें।
9- महालक्ष्मी यंत्र: थाली के स्वास्तिक के मध्य अर्थात् पाताल में स्थित महालक्ष्मी यंत्र पर कुंकुंम एवं अक्षत चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का 5 बार उच्चारण करें।
अब यंत्र का पूर्ण पूजन प्रारम्भ करें।
आसन
आसन के लिए एक पुष्प अर्पित करें –
श्री महालक्ष्म्यै नमः आसनं समर्पयामि नमः।।
पाद्यं अध्र्यं आचमनीयं स्नानं च समर्पयामि।।
पाद्य, अध्र्य और आचमन के बाद शुद्ध जल के स्नान कराएं।
पंचामृत स्नान –
पंचामृत (दूध, दधि, घी, शहद, चीनी) से
भगवती महालक्ष्मी को स्नान कराएं।
मधवाज्यशर्करायुक्तं दधिक्षीरसमन्वितम्।
पंचामृतं गृहाणेदं पंचास्यप्राणवल्लभे।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः पंचामृत स्नानं समर्पयामि।।
शुद्धोदक स्नान
इसके बाद उन्हें शुद्ध जल से स्नान कराएं –
परमानन्दबोधाब्धिं निमग्न निजमूर्तये।
शुद्धोदकैस्तव स्नानं कल्पयाभ्यम्ब शंकरि।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः शुद्धदोदक स्नानं समर्पयामि।।
वस्त्र
वस्त्र समर्पित करें –
श्री महालक्ष्म्यै नमः वस्त्रं समर्पयामि।।
आभूषण
आभूषण समर्पित करें -‘
श्री महालक्ष्म्यै नमः आभूषणं समर्पयामि।।
गंध इत्र चढ़ावे –
श्री महालक्ष्म्यै नमः गधं समर्पयामि।।
अक्षत
अक्षत चढ़ावें –
श्री महालक्ष्म्यै नमः अक्षतान् समर्पयामि।।
पुष्प
पुष्प चढ़ावे
श्री महालक्ष्म्यै नमः पुष्पाणि समर्पयामि।।
इसके बाद कुंकुंम, अक्षत तथा पुष्प मिला कर निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए यंत्र पर चढ़ाएं।
ऊँ आद्य लक्ष्म्यै नमः, ऊँ विद्या लक्ष्म्यै नमः, ऊँ
सौभाग्य लक्ष्म्यै नमः, ऊँ अमृत लक्ष्म्यै नमः, ऊँ
कमलाक्ष्यै नमः, ऊँ सत्य लक्ष्म्यै नमः, ऊँ भोग
लक्ष्म्यै नमः, ऊँ योग लक्ष्म्ये नमः।
धूप
श्री महालक्ष्म्यै नमः धूपं आघ्रापयामि।।
दीप
श्री महालक्ष्म्यै नमः दीपं दर्शयामि।।
नैवेद्य
नाना विधानि भक्ष्याणि व्यंजनानि हरिप्रिये।
यथेष्टं भुड्क्ष्च नैवेद्यं षड्रसं च चतुर्विधाम्।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः नैवेद्यं निवेदयामि।।
ताम्बूल
लौंग इलायची युक्त पान समर्पित करें –
श्री महालक्ष्म्यै नमः ताम्बूलं समर्पयामि।।
दक्षिणा
दक्षिणा द्रव्य समर्पि करें –
श्री महालक्ष्म्यै नमः दक्षिणां समर्पयामि।।
इसके बाद निम्न मंत्र का 108 बार जप सम्पन्न करें।
मंत्र: ऊँ क्लीं श्रों श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।
आरती
इसके बाद लक्ष्मी आरती सम्पन्न करें।
ऊँ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निसि दिन सेवत, हर विष्णु धाता।
ऊँ जय लक्ष्मी माता—–
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग माता।
सूर्य चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता।
ऊँ जय लक्ष्मी माता—–
दुर्गा रूप निरंजनि, सुख सम्पति दाता।
जो कोई तुमको ध्याता, रिद्धि सिद्धि धन पाता।
ऊँ जय लक्ष्मी माता—–
तुम पाताल निवासिनी, तुम ही शुभ दाता।
कर्म प्रभाव प्रकासिनी, भव निधि की त्राता।
ऊँ जय लक्ष्मी माता—–
जिस घर तुम रहती तहं, सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहिं घबराता।।
ऊँ जय लक्ष्मी माता—–
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता।
खानपान का वैभव सब तुमसे, आता।।
ऊँ जय लक्ष्मी माता—–
शुभ गुण मंदिर सुन्दर, क्षीरोदधि जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता।
ऊँ जय लक्ष्मी माता—–
महालक्ष्मी की आरती, जो कोई नर गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता।
ऊँ जय लक्ष्मी माता—–
जल आरती
तीन बार आचमनी से जल लेकर दीपक के चारों आरे घुमाएं तथा निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
ऊँ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष (गूं) शान्तिः पृथिवी
शान्तिरापः शान्ति रोषध्यः शान्तिः। वनस्पतयः
शान्ति र्विश्वे देवः शान्तिः ब्रह्म शान्तिः सर्व (गूं)
शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।
पुष्पांजलि
दोनों हाथों से पुष्प लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें तथा यंत्र पर चढ़ा दें –
नाना सुगनध पुष्पाणि यथा कालोद्भवानि च।
पुष्पांजलिर्मया दत्ता गृहाण जगदम्बिके।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः पुष्पांजलि समर्पयामि।।
प्रणामांजलि
दोनो हाथ जोड़कर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए प्रार्थना करें –
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताः।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः नमस्करोमि।।
समर्पण
इसके बाद निम्न समर्पण मंत्र का उच्चारण करते हुए पूजन व जप भगवती लक्ष्मी को समर्पित करें, जिससे कि इसका फ़ल् आपको प्राप्त हो सके –
ऊँ तत्सत् ब्रह्मार्पणमस्तु, अनेन कृतेन पूजाराधन कर्मणा।
श्री महालक्ष्मी देवता परासंवित् स्वरूपिणी प्रीयन्ताम्।।
एक आचमनी जल लेकर पूजन की पूर्णता हेतु भूमि पर छोड़ दें। इसके बाद यहां उपस्थित परिवार के सभी सदस्यों एवं स्वजनों को प्रसाद वितरित करें।
इस प्रकार सम्पूर्ण पूजन व साधना सम्पन्न होती है। साधना समाप्ति के पश्चात् माला व यंत्र को पूजा स्थान में ही स्थापित रहने दें और शेष सामग्री को अगले दिन जल में विसर्जित कर दें।
महालक्ष्मी पूजन मुहुर्त
सांयकाल गोधुलि वेला में 5-57 से रात्रि 8-31 तक
वृषभ लग्न बेला में रात्रि 7-08 से 9-04 तक
सिंह लग्न में मध्यरात्रि के बाद 1-32 से 3-49 तक
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