





कार्तिक पूर्णिमा अपने आप में एक श्रेष्ठतम दिवस है तांत्रिकों और गृहस्थों दोनों के लिए ही अत्यधिक महत्वपूर्ण है। जीवन का प्रत्येक क्षण अपनी एक विशिष्टता लिए हुए होता है जब तक हम किसी क्षण को समझ नहीं लेते, तब तक हम उस क्षण की महत्ता का भी एहसास नहीं कर सकते।
‘‘वाल्मीकि रामायण’’ में एक स्थान पर एक सन्दर्भ में लिखा है – एक बार जब विश्वामित्र भगवान राम व लक्ष्मण् को धनुर्विद्या का ज्ञान दे रहे थे, तब उन्होंने उन दोनों राजपुत्रों की सर्वप्रथम काल का ज्ञान कराया, क्योंकि किसी भी कार्य की पूर्णता काल-ज्ञान के बिना असम्भव है।
(शुभ मुहूर्त में की गई प्रत्येक साधना सफ़ल होती ही है, क्योंकि समय का प्रभाव सर्वोपरी है, एक क्षण का चूक जाना कार्य में विघ्न है। समय की सदुपयोगिता साधक का सौन्दर्य है, साधक की दक्षता है। कार्तिक पूर्णिमा आपको लक्ष्मीवान बनने के लिए सौभाग्य प्रदान करने वाला ऐसा काम-कल्पतः सिद्ध हो, इसके लिए आवश्यक है यह प्रयोग—!द्ध
उन्होंने बताया कि – ‘‘जीवन में विजय-प्राप्ति तब तक सम्भव नहीं है, जब तक तुम्हें समय का ज्ञान नहीं होगा, क्षण का ज्ञान नहीं होगा, क्योंकि प्रत्येक क्षण अपने-आप में एक अलग महत्व लिए हुए होता है।’’
लक्ष्मण ने विश्वामित्र से ऐसे प्रश्न करते हुए कहा – ‘‘क्या केवल निर्धारित क्षणों पर ही युद्ध किया जा सकता है, यदि क्षण विशेष नहीं हो, तो युद्ध में विजय प्राप्त नहीं हो सकती, तो युद्ध में विजय प्राप्त नहीं की जा सकती ?’’ उन्होंने प्रत्युत्तर में कहा – ‘‘हो तो सकती है, किन्तु वह अपने-आप में अत्यन्त कठिन एवं कठोर होती है, इसकी अपेक्षा यदि क्षण विशेष का ज्ञान हो, तो वह विजय अपने-आप में पूर्ण सफ़लतादायक हो जाती है।’’ फि़र विश्वामित्र ने लक्ष्मण से कहा – ‘‘तुम अपने धनुष पर बाण चढ़ा दो, और ये जो सामने ताड़ के सात वृक्ष तुम्हें दिखाई दे रहे है, जिस क्षण मैं कहूं, तुम इन पर अपना बाण छोड़ देना और एक साथ सातों पेड़ों को बींध देना।
लक्ष्मण शर-संधान के लिए खड़े हो गये और रात्रि के उस विशेष क्षण में ,जो एक स्वर्णिम क्षण कहलाता है, विश्वामित्र के कहने पर उन्होंने तीर से ताड़ के वृक्षों को बेंध दिया। फि़र विश्वामित्र ने लक्ष्मण से कहा – ‘‘ अब तुम स्वयं जाकर देख लो, उन ताड़ के वृक्षों को और निर्णय कर लो, तुम्हे तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मिल जायेगा। (जीवन में सतत धनागम का होना सौभाग्य परता है, इन्द्र की महत्ता ऐश्वर्य से ही है, क्योंकि उसने इस प्रयेाग को अपने जीवन में स्थान देकर अपने राज्य को सर्व सम्पन्नता युक्त बनाया। इस प्रयोग को सम्पन्न कर कोई भी इन्द्रवत ऐश्वर्यवान बन सकता है, आप भी—–द्ध
लक्ष्मण ने पास जाकर देखा, कि पहला पेड़ स्वर्ण के समान अत्यन्त कांतिवान बन गया है, दूसरा पेड़ हल्के स्वर्णिम रंग का हो गया, तीसरा चांदी की तरह बन गया, चौथा पेड़ ताम्र वर्ण का बना— ओर सातवां पेड़ बिल्कुल वैसा ही था, जैसा पहले था। तब विश्वामित्र ने लक्ष्मण से पूछा- ‘‘लक्ष्मण तुम्हें बाण को छोडने में और बाण को सातों पेड़ों को बेधने में कितना समय लगा ?’’ उसने कहा – ‘‘मुश्किल से एक क्षण का भी आधा।’’
फि़र विश्वामित्र ने लक्ष्मण को समझाते हुए कहा – ‘‘क्षण विशेष इतनी अधिक महत्ता है, कि पहला पेड़ स्वर्ण का बन गया और सातवां पेड़ वही ताड़ का पेड़ ही रहा था तो सातों पेड़ स्वर्ण के ही बन जाते या फि़र सातों पेड़ ताड़ के ही बने रहते, मगर यह पहला क्षण अधिक मूल्यवान था और दूसरा क्षण उससे न्यून– इसीलिए प्रत्येक क्षण का अपने-आप में मूल्य और महत्व है, यदि उस क्षण को समझ सकें, यदि उसका उपयोग कर सकें, यदि क्षण में किसी देवी या देवता को आबद्ध कर सकें। लेकिन यह क्षण तब मूल्यवान होता है, जब उस क्षण का किसी विशेष मंत्र के साथ सम्बन्ध स्थापित हो।
जीवन की सार्थकता छुपी है इस ‘‘स्वर्ण लक्ष्मी प्रयोग’’ में, क्योंकि इसके माध्यम से हम कम-से-कम समय में ही अपने जीवन के सभी लक्ष्यों को पूर्णता प्रदान कर सकते है। यह बात सही है, कि इच्छाओं का कोई अन्त नहीं है, लेकिन इन्हें इच्छाएं न कहकर यदि हम आवश्यकता कहे, तो ज्यादा उचित होगा, और समस्त आवश्यकता की पूर्ति के लिए यह प्रयोग सौ टंच खरा है, जिसे देवता इन्द्र ने भी सिद्ध कर अपने राज्य में धन वर्षा की थी। धन के बिना यह जीवन अपूर्ण है। आज के युग में जो अर्थहीन है, वह शक्तिहीन कहलाता है, बिना अर्थ के धर्म की अभ्यर्थना करना व्यर्थ है। आज के इस परिवर्तनशील युग में किसी ऐसे सक्षम उपाय कि आवश्यकता प्रत्येक गृहस्थ व संन्यासी को पड़ेगी, जिससे वे अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण कर जीवन की प्रत्येक समस्या से मुक्ति पा सकें, इसीलिए देवराज इन्द्र ने इस महत्वपूर्ण प्रयेाग को कार्तिक पूर्णिमा के दिन सम्पन्न कर अपने राज्य में धन की वर्षा की, जिससे कि इस नवीन पद्धति का सहारा लेकर, प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में स्वर्ण वर्षा कर आकस्मिक रूप से धन प्राप्त कर सके।
देवराज इन्द्रकृत यह प्रयोग अचूक फ़लदायी है, जिसका प्रमाण हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि, साधक व योगीगण है, जिन्होंने इस प्रयेाग को सम्पन्न कर इसी प्रमाणिक केा अनुभव किया।
1- इस प्रयोग को सम्पन्न करने के लिए प्राण-प्रतिष्ठित ‘‘आकस्मिक धन प्राप्ति यंत्र’’ और ‘‘पारद लक्ष्मी’’ विग्रह की आवश्यकता पड़ती है।
2- कार्तिक पूर्णिमा कार्तिक शुक्ल पक्ष की रात्रि 9:32 से 11:40 बजे के मधय इस प्रयोग को सम्पन्न करना ज्यादा श्रेष्ठकर सिद्ध होगा, यदि इस दिन न कर सके, तो किसी भी गुरुवार को कर सकते है।
3- साधक को उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठना चिाहए।
4- इस प्रयोग के लिए गुरु-पूजन की आवश्यकता होती है, क्योंकि इस प्रयोग के प्रणेचा देवराज इन्द्र ने इस प्रयोग से पूर्व गुरु आराधना की थी, जिसके आशीर्वाद से ही वे इस प्रयोग को करने में सफ़ल हो सके थे।
5- साधकों को चाहिए, कि ‘‘दैनिक साधना विधि पुस्तक’’ के अनुसार गुरु-पूजन करें तथा 4 माला गुरु मंत्र जप करें।
6- साधक स्नान करके शुद्ध हो लें तथा आसन पर बैठकर अपने सामने ‘‘यंत्र’’ को पूजा स्थान में रख दें, यंत्र की दायी ओर तांबे की प्लेट में ‘‘कमला यंत्र’’ कुंकुम से अंकित कर, ‘‘पारद लक्ष्मी’’ को उस पर स्थापित कर दें।
7- इसके बाद यंत्र तथा लक्ष्मी को किसी दूसरे बर्तन में स्नान कराकर उनका कुंकुम, अक्षत, पुष्प, धूप व दीप से पूजन करें।
8- ‘‘ऊँ श्रीं हृीं श्रीं ऊँ’’ मंत्र का जप करते हुए 108 बार पारद लक्ष्मी पर अक्षत चढ़ायें।
9- इसके बाद इन्द्रकृत निम्न लक्ष्मी-पूजन सम्पन्न करें।
ऊँ अस्य श्री महालक्ष्मी कवच मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छन्दः,
श्री महालक्ष्मी देवता, श्री महालक्ष्मी प्रीतये पाठे विनियोगः।
ऊँ श्री ब्रह्मा ऋषये नमः शिरसि, गायत्री छन्दसे नमः मुखे, श्री महालक्ष्मी देवतायै नमः हृदये,
श्री महालक्ष्मी प्रीतये पाठे विनियोगाय नमः सर्वांगे।
कवच
शिरो में विष्णु-पत्नी च, ललाटममृतोद्भवा।
चक्षुषी सु-विशालाक्षी, श्रवणे सागराम्बुजा।।
घ्राणं पातु वरारोहा, जिह्नामाम्नाय-रूपिणी।।
मुखं पातु महालक्ष्मी, कण्डं वैकुण्ड-वासिनी।
स्कन्धौं में जानकी पातु, भुजौ भार्गव-नन्दिनी।
बाहू द्वौ द्रविणी पातु, करौ हरि-वरांगना।।
वक्षः पातु च श्रीदेवी, हृदयं हरि सुन्दरी।
कुक्षिं च वैष्णवी पातु, नाभिं भुवन-मातृका।।
कटिं च पातु वाराही, सक्थिनी देवत-देवता।
ऊरू नारायणी पातु, जानुनी चन्द्र सोदरी।।
इन्द्रिरा पातु जंघे में, पादौ भक्त नमस्कृता।
नखान् तेजस्विनी पातु, सर्वागं करुणामयी।।
इस कवच का मात्र 5 बार पाठ करें।
10- अन्त में लक्ष्मी आरती एवं गुरु आरती सम्पन्न करें।
11- प्रयोग-समाप्ति के बाद यंत्र को दूसरे दिन नदी या कुंए में विसर्जित कर दें तथा पारद लक्ष्मी को पूजागृह में स्थापित कर दें।
इस प्रयेाग के बाद शीघ्र धन-लाभ की सम्भावना बनती ही है, जीवन की समस्त दरिद्रता, अभाव और विषाद के सभी क्षण समाप्त होने लगते हैं तथा धनागम के नये स्त्रोत बनते ही हैं।
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