





वर्तमान समय में यह देखकर बड़ा ही आश्चर्य होता है कि होलिका दहन को और होली पर्व को उतना महत्व नहीं दिया जाता, जितना कि दूसरे रंग से, होली को खेलने, अश्लीन वचन बोलने, सड़कों पर शराब पीकर गिरने, और थोड़े पड़े लिखें लोगों द्वारा शराब पार्टियों का आयोजन करके, यह होली का बड़ा ही विकृत स्वरूप है, जो कि वास्तविक रूप का बिल्कुल उल्टा और सत्य से परे है। होली पर्व को उतनी ही मान्यता प्राप्त है जितनी दीपावली पर्व को है, और वास्तव में दीपावली का नववर्ष के रूप में लक्ष्मी पूजा साधना के रूप में जितना महत्व है, उतना ही तांत्रोक्त दृष्टि से होली का महत्व है।
होली पर्व का वास्तविक रूप से प्रारम्भ होलाष्टक से हो जाता है। इस वर्ष यह फ़ाल्गुन शुक्ल अष्टमी गुरुवार 1 मार्च 2012 से प्रारम्भ हो रहा है, और होली पर्व की पूर्णता फ़ाल्गुन पूर्णिमा बुधवार 7 मार्च 2012 को हो रही है। साधनात्मक दृष्टि से उपरोक्त दिवस महत्वपूर्ण है। होलाष्टक फ़ाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फ़ाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा तक रहता है। इस वर्ष ज्योतिष की दृष्टि से विशेष योग बन रहा है। प्रथम तो सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मंगल, शुक्र और राहू मेष राशि में स्थित है, गुरु और सूर्य का सम सप्तक योग बन रहा है, जो तांत्रिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। होलाष्टक के प्रथम दिन अष्टमी को सर्वार्थ सिद्धि अमृत योग है। इन्हीं कारणों से ये आठ दिवस तांत्रिक-मांत्रिक कार्यों के लिए पूर्ण सफ़लताकारक योग बना रहे है।
आपने शहरों में और गांवों में होली के अवसर पर किये जाने वाले कुछ कार्यों को ध्यान से देखा होगा, अब तक तो दोपहर को प्रहलाद के रूप में होली का डंडा खड़ा करते है और उसके चारों और घास-फ़ूस पुराना कचरा कुछ कांटे इत्यादि डालकर एक होलिका बना देते हैं, और शाम को दहन कर देते है, जो कि शास्त्रोक्त रीति से बिल्कुल गलत बात है। जिस दिन होलाष्टक प्रारम्भ होता है वह दिन अष्टमी होती है, और उस दिन गांवों में एक प्रमुख स्थान पर एक बड़ा डंडा जमीन में रोपा जाता है, फि़र सब गांव वाले अपने-अपने हिसाब से होली में दहन के लिए गोबर की बनी सामग्री, उपले इत्यादि उसके चारों ओर डालते है, धीरे-धीरे एक बड़ ढेर बन जाता है, रात्रि में श्रेष्ठ मुहुर्त पर दहन का मात्रोक्त विधि से प्रारम्भ किया जाता है।
होलिका दहन से पहले सि्त्रयां पूरी श्रद्धा से पूजा करती है, और पूजन सामग्री का कुछ अंश होलिका को अर्पण करती है। उसी समय नवजात शिशुओं, जो कि पिछली होली के बाद से अब तक जन्म लेते है, उन्हें तिलक किया जाता है, और होलिका दहन के पश्चात् उसके चारों और सात परिक्रमा दी जाती है, जिससे नवजात शिशु दीर्घायु जीवन को प्राप्त होते है और विशेष काल के प्रभाव के कारण बालक भूत-प्रेत बाधा से मुक्त हो जाता है, उस पर किसी की नजर नहीं लग सकती, यह सिद्ध तथ्य है। होलिका अग्नि पर्व है क्योंकि हम उस अग्नि की पूजा करते है, जिसकी साधना के बल पर होलिका देवी भक्त प्रहलाद को अपने गोद मे लेकर बैठी, लेकिन अग्नि ने उन्हें अपने प्रभाव से मुक्त रखा, यह साधना, तपस्या और प्रभु कृपा का फ़ल है।
होलिका दहन के समय जो चारों ओर खडे होकर उसकी पूजा करते है, उन्हें उस विशिष्ट अग्नि के ताप से शक्ति प्राप्त होती है, जिससे उनके जीवन के दोष शांत होते है, आवश्यकता है मन में सच्ची श्रद्धा और विश्वास की। जब होलिका दहन प्रचण्ड रूप में होती है तो उसकी हवा का रुख, धुएं का स्वरूप देखकर आज भी बड़े-बूढ़े बता देते है कि आने वाला वर्ष कैसा रहेगा, क्या अकाल की स्थिति पड़ेगी, अथवा महामारी फ़ैलेगी, अथवा फ़सल बहुत अच्छी होगी। इनका ज्ञान उसी समय हो जाता है। होलिका दहन के समय जिस ओर धुआँ जाता है उस ओर खड़े नहीं रहना चाहिए। वह विषाक्त वायु होती है, जो विशेष प्रभावित करती है।
ये सब तो होली के संबंध में तथ्य है जिन्हें हम आप बचपन से देखते आ रहे है, लेकिन ध्यान नहीं देते, क्योंकि हमारा ध्यान तो अगले दिन की रंगीन होली की ओर ज्यादा रहता है, जबकि वास्तविक रूप से होली के आठ दिवस होलाष्टक से फ़ाल्गुन पूर्णिमा तक सबसे महत्पूर्ण दिवस होते है, और इन आठ दिवसों में जो भी जो भी साधनायें या मंत्र जाप किया जाय वह सफ़ल होता है, इसलिए तांत्रिक लोग प्रतिवर्ष इस समय का बड़ा इंतजार करते है, अघोर पंथ, नाथ सम्प्रदाय, औघड़ सम्प्रदाय, नागा सम्प्रदाय सभी इन आठ दिनों में विशेष साधनात्मक क्रियाएं सम्पन्न करते है।
पौरोणिक साहित्य शक्ति उपासना
शक्ति की उपासना की कथा को पुराणों में विविध रूप से देखा जा सकता है। हरिवंश पुराण में विष्णु के पाताल लोक में जाने तथा वहां जाकर कालरूपिणी योगनिद्रा को यशोदा की पुत्री के रूप में अवतरित होने के आग्रह की कथा है।
यह कालरूपिणी योगनिद्रा जन्म के बाद कंस द्वारा शिला पर पटकी गई और आकाश गामी होकर विन्ध्याचल पर्वत पर चली गई, यही अपना शाश्वत निवास बनाया। इनका एक नाम कौशिकी भी है। यह नाम कुश गोत्र के कारण ही पड़ा। इन्होंने शुम्भ और निशुम्भ का वध किया। ये दोनों पराक्रमी असुर थे।
मार्कण्डेय पुराण में शक्ति की उपासना का विस्तृत वर्णन है। दुर्गासप्तशती इसी पुराण का अंश है। इस महाशक्ति में तीन स्वरूप सम्मिलित है। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के माध्यम से जीवन में शक्ति, दया, शान्ति, तुष्टि, बुद्धि और धन, यश, प्रतिभा प्राप्ति में सहायक है। शक्ति अनेक रूपों से जगत की रक्षा करती है।
मार्कण्डेय पुराण में शक्ति के उद्भव का विवरण है। देवताओं ने इस शक्ति को अपना रक्षक माना। शक्ति की परम्परा में यह कथा अत्यन्त ही विशिष्ट स्थान रखती है। इसमें देवी की अनेक कथाएं हैं।
वायुपुराण में भी शक्ति की कथा के अनेक प्रसंग हैं। उमा के शरीर से देवी की उत्पति की कथा का वर्णन मत्स्यपुराण में भी है। पौराणिक साहित्य में उमा को शिव की पत्नी के रूप में स्वीकार किया गया है।
देवी भागवत में शक्ति के प्रभाव को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है। इसमें शक्ति को ब्रह्मा से भिन्न नहीं माना गया है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश उस शक्ति की उपासना करते हैं। यह पराम्बा शक्ति है। ब्रह्म पुराण में भी शक्ति को तीनों जगत की जननी के रूप में व्याख्या की गई हैं। शक्ति के अनेक नामों की सूची सभी पुराणों में है।
इन नामों के वर्णन से स्पष्ट पता चलता है कि पुराणों में शक्ति को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। पुराणों के अतिरिक्त रामायण और महाभारत में भी देवी के नामों का उल्लेख है इससे यह भी स्पष्ट होता है कि पौराणिक युग में शक्ति की मर्यादा पूर्णरूपेण स्थापित हो गई थी, पुराणों में त्रिदेव का वर्णन है। इन पुराणों में देवी की उपासना के साथ उनकी अनुचरियों का भी वर्णन है।
शक्ति उपासना का वर्तमान भारतीय रूप पौराणिक साहित्य से सम्बन्धित है। भारत के प्रत्येक घर में आज जो शक्ति की उपासना का रूप दिखता है उन्हें हम पुराण से समचित कह सकते है। भौतिक और सांसारिक गृहस्थ और आध्यात्मिक जीवन में पूर्णता के लिए दस महाविद्यायें आधारभूत क्रियायें है।
अन्यतम दस महाविद्यायें
तांत्रिक ग्रंथों में दस महाविद्याओं को सर्वाधिक महत्व दिया गया है, परन्तु उच्चकोटि के तंत्रवेत्ताओं ने सिद्धेश्वरी प्राप्ति के लिए दस महाविद्याओं को आधारभूत शक्ति माना है। 1- महाकाली, 2- तारा, 3- छिन्नमस्ता, 4- धूमावती, 5- बगलामुखी, 6- कमला, 7- त्रिपुरभैरवी, 8 भुवनेश्वरी, 9- त्रिपुर सुन्दरी, 10- मांतगी, इन दसों महाविद्याओं से प्रायः सभी साधक परिचित हैं। प्रत्येक महाविद्या साधना अपने आप में अद्वितीय एवं अद्भुत है। इन महाविद्याओं की साधना सम्पन्न कर प्रत्येक साधक अपने जीवन में भौतिक सुख के अतिरिक्त पूर्णता प्राप्त करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। फि़र भी प्रत्येक महाविद्या साधना का अपना विशेष गुण व धर्म हैं।
‘महाकाली’ की साधना मुकदमों में सफ़लता, गृहस्थ सुख प्रदान करने में, शत्रुओं को समाप्त करने तथा राज्य बाधा व अन्य संकट जैसे गम्भीर स्थितियां को समाप्त करने में विशेष सहायक है। ‘तारा महाविद्या’ मुख्य रूप से बुद्धि, ज्ञान, शक्ति, विजय व जीवन की पूर्णता प्राप्त करने के लिए अति आवश्यक व विशेष लाभदायक है। इसके अतिरिक्त इस साधना से अकाल मृत्यु, दुर्घटना का निराकरण, आर्थिक उन्नति व व्यापार वृद्धि में पूर्ण सफ़लता प्राप्त की जा सकती है।
‘षोडशी त्रिपुर सुन्दरी’ पुरुषार्थ, पराक्रम, आनन्द और सिद्धि प्रदायक साधना है। जीवन के प्रत्येक कर्म की पूर्णता जैसे विवाह, पति सुख, गृहस्थ सुख, पौरुष प्राप्ति के लिए अद्वितीय है। इसके अतिरिक्त रोग निवारण के लिए विशेष सहायक है।
‘छिन्नमस्ता’ महाविद्या विशेषकर शत्रु बाधा पूर्णरूप से समाप्त करने, व्यापार व नौकरी आदि की बाधाएं समाप्त करने के लिए विशेष फ़लदायी है।
‘धूमावती’ का स्पष्ट स्वरूप तीव्रतम है। इस साधना से धन सम्पत्ति का स्वामित्व एवं प्रचण्ड से प्रचण्ड शत्रु पराजित करने तथा विपत्ति के निवारण हेतु विशेष फ़लदायी एवं अनुकूलता प्रदान करने वाली है।
‘बगलामुखी’ की साधना को त्रिशक्ति भी कहा गया है। इस महाविद्या में काली, कमला व भुवनेश्वरी की संयुक्त स्वरूप महाविद्या है। प्रबल से प्रबल शत्रु बाधा निवारण, सम्मान प्राप्ति व उन्नति के लिए विशेष लाभकारी है।
‘कमला’ लक्ष्मी की अधिष्ठात्री देवी हैं। यह विष्णु से आप्लावित शक्ति एवं जगत की आधारभूत देवी है। यह दरिद्रता निवारण, पुरुषार्थ प्रबल करने धान सम्पति की निरन्तर वृद्धि एवं स्थायित्व के लिए एक मात्र श्रेष्ठतम मार्ग है।
‘त्रिपुर भैरवी’ की साधना भय समाप्त करने, आत्म शक्ति को जाग्रत करने की साधना है। शारीरिक दुर्बलता, भूत प्रेत व तंत्र बाधा निवारण की यह श्रेष्ठतम स्थिति है।
‘भुवनेश्वरी’ जीवन में सफ़लता पाने के लिए अति आवश्यक मानी गई है। जीवन में पूर्ण आनन्द, सौभाग्य, ऐश्वर्य, सम्पन्नता इनके द्वारा ही सम्भव है।
‘मातंगी’ वाणी एवं विलास की देवी है। जीवन में सरसता, आनन्द, भोग विलास की प्राप्ति, जीवन में पूर्ण गृहस्थ सुख प्राप्ति के लिए श्रेष्ठतम है।
इस प्रकार हम देखते है, कि प्रत्येक महाविद्या दीक्षा अपने आप में महत्वपूर्ण एंव जीवन के विभिन्न आयामों को पूर्णता करने में सक्षम हैं।
वर्तमान आपाधापी के युग में प्रतिस्पर्धा एवं जटिलता से भरे वातावरण में महाविद्या का महत्व अद्वितीय एवं आवश्यक है। किन्तु किसी भी महाविद्या साधना में सफ़लता प्राप्त करना साधक के लिए श्रम साध्य तथा दीर्घ समय में सिद्ध होने वाली साधना होती है। दीर्घ समय इस कारण से, क्योंकि महाविद्या दीक्षा की जरा न्यूनता पूरी दीक्षा को व्यर्थ कर सकती है।
इसका एक अन्य प्रमुख कारण होता है, साधक का स्थूल व सूक्ष्म शरीर साधक के अनुकूल न होना। इसमें मुख्य रूप से पूर्व जन्मकृत दोष इतने अधिक होते है, कि साधना प्रारम्भ करने पर सर्वप्रथम इन दोषों के शमन में इतना अधिक समय लग जाता है, जिससे साधक संशयग्रस्त हो जाता है, कि साधना में सफ़लता व अनुकूलता प्राप्त क्यों नहीं हो पाती है ? परन्तु जब तक इन दोषों का पूर्ण रूप से शमन नहीं हो जाता, तब तक साधना में सफ़लता की संदिग्धता बनी ही रहती है। क्योकि ज्योही पूर्वजन्म कृत दोषों का पूर्ण शमन हो जाता है, तब शरीर पवित्र दिव्य व अनुकूल बन जाता है और साधना में सफ़लता प्राप्त होने लगती है। महाविद्या साधना में सफ़लता प्राप्त होना, जीवन को सफ़ल बनाना है एवं जीवन का श्रेष्ठतम सौभाग्य है। बिरले लोग ही ऐसे होते है, जिन्हे महाविद्या दीक्षा का मार्गदर्शन सद्गुरु से प्राप्त होता है।
जीवन की दरिद्रता, विपन्नता, अवसाद, रोग, शोक, हानि, शत्रु बाधा, अकाल मृत्यु, गृहस्थ जीवन की न्यूनताओं को पूर्णरूपेण समाप्त करने के लिए इस श्रेष्ठतम महापर्व होली और नवरात्रि से पूर्व विशिष्ट दस महाविद्या दीक्षाऐं प्राप्त कर जीवन में आमूलचूल निश्चित रूप से परिवर्तन कर जीवन में सुचिता, सरलता और श्रेष्ठता प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए अगले पृष्ठ पर अपने मित्रों का नाम लिख कर कोई भी विशिष्ट शक्ति से युक्त दीक्षा प्राप्त कर सकते है।
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