





यह कैसे सम्भव हो सकता है, कि जिस आद्याशक्ति भगवती जगदम्बा की त्रिगुणात्मक रूपों में प्रस्तुति क्रमशः महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती रूप में होती है उसमें परस्पर कोई विशेष शत्रुता अथवा बैर जैसी बात हो ?
इस बात को अत्यन्त विस्तार से समझना आवश्यक है, कि यह परस्पर विरोध सत्य है अथवा केवल एक तोता-रटन्त या शास्त्रों से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया निरर्थक तथ्य है। ज्ञान का तात्पर्य केवल डिग्री प्राप्त कर लेना अथवा शास्त्रों को रट लेना नहीं है। यह शिक्षा का एक सीमित स्वरूप है, शिक्षा और ज्ञान में बड़ा अन्तर है। ज्ञान विद्या का स्वरूप है, क्योंकि मनीषियों की दृष्टि में ज्ञान से सम्बन्धित स्पष्ट धारणा ही है कि ‘सः विद्यया या विमुयुक्तये” अर्थात् विद्या या ज्ञान वह होता है जो व्यक्ति को विमुक्त कर दे, उसे उन्मुक्त और बोझिल आवरणों से रहित कर दे।
यहां विमुक्त पद की प्रस्तुति स्वयं में अत्यन्त गम्भीर एवं अर्थवान है। विमुक्त हो जाने का तात्पर्य केवल जीवनमुक्त हो जाने तक ही सीमित नहीं वरन जीवन के प्रत्येक चरण से सम्बन्धित है। क्या एक रोगी, दरिद्र, अभावग्रस्त, विविध चिंताओं में उलझा हुआ व्यक्ति विमुक्त की श्रेणी में आ सकता है ?
जो जीवन के विभिन्ने चरणों में ही विमुक्त नहीं हो सका वह सर्वोच्च रूप से जीवन मुक्त हो सकेगा भी तो कैसे ? अतः जीवन के विभिन्न चरणों पर आने वाली बाधाओं, भटकावों का समाधान भी विद्या के माध्यम से संभव है।
पुनः जिस प्रकार से ज्ञान का तात्पर्य केवल किसी शास्त्रोक्त ज्ञान की उपलब्धि अर्जित कर लेना नहीं होता, ठीक उसी प्रकार से लक्ष्मी की प्राप्ति का अर्थ केवल धन-सम्पति की प्राप्ति कर लेने तक सीमित नहीं किया जा सकता है। लक्ष्मी की प्राप्ति करने का अर्थ होता है जीवन के सम्पूर्ण सौन्दर्य को अपने जीवन में उतार लेना ।
यदि लक्ष्मी का अर्थ केवल धन सम्पति तक ही सीमित कर दें, तो यह समाज में हजारों लोगों के पास अपने पूर्व जन्म के सुकृत कार्यों के कारण अस्थायी रूप में आ सकती है, लेकिन ऐसी लक्ष्मी ज्ञान के अभाव में उनके जीवन में परिपूर्णता नहीं दे सकती है।
लक्ष्मी को जीवन की श्री व ऐश्वर्य के रूप में परिवर्तित करना किसी देव व्यवस्था के आधीन न होकर स्वयं मनुष्य के हाथ में होता है, इसी कारणवश लक्ष्मी और सरस्वती एक दूसरे की विरोधी शक्तियां न होकर अन्योन्यश्रित शक्तियां होती हैं और जिस शक्ति तत्व के द्वारा इन दोनों में परस्पर सामंजस्य स्थापित होता है, वह है “कालशक्ति”। यह शक्ति तत्व जाग्रत होने पर सरस्वती को स्थायी रूप से प्राप्त किया जा सकता है और जीवन को जाग्रत अवस्था की ओर ले जाया सकता है।
शक्ति तत्व के चेतन्य होने पर ही एक ज्ञानवान व्यक्ति धनवान या लक्ष्मीवान बनने की ओर अग्रसर हो सकता है और धनवान व्यक्ति ज्ञानवान बनने की क्रिया में संयुक्त हो जाता है अर्थात् यदि कुछ अभाव जैसा हो, तो उसकी पूर्ति होना संभव हो सकता है। वास्तव में अभाव जैसा कुछ होता ही नहीं है। जिसे व्यक्ति अभाव कहता है एक प्रकार से वह उसकी अज्ञान अवस्था ही होती है । उसे वस्तु स्थिति का बोध नहीं होता है और जिसे वस्तु स्थिति का बोध ही नहीं होगा वह शक्ति तत्व की उपस्थिति के पश्चात भी निष्क्रिय ही बना रह जाएगा। जब तक सही दिशा का बोध नहीं होगा तब तक व्यक्ति यदि गतिशील होना भी चाहे तो किस ओर गतिशील होगा ? यदि सही दिशा का बोध नहीं होगा तो वह अपनी ऊर्जा का भी स्तम्भन कर देगी।
इसी कारणवश केवल साधक का ही नहीं वरन किसी भी व्यक्ति का बोधवान होना जीवन की प्रथम स्थिति होती है और इसी कारणवश ज्ञान की महिमा को सर्वौच्च रूप से स्वीकार किया गया है।
जहां जीवन में ज्ञान का प्रश्न आता है, वहां सदा सर्वदा से भगवती महासरस्वती की उपासना-साधना करने का विधान रहा है। मात्र ज्ञान प्रदात्री देवी के रूप में ही नहीं वाकूपटुता, वाणी कीशल, सौभाग्य एवं आयुष्य की अधिष्टात्री देवी के रूप में महासरस्वती की उपासना करने का विधान रहा है।
भगवती महासरस्वती की उपासना प्रकारांतर से सतोगुण की उपासना ही है, अतः जीवन में जो भी स्थितियां सतोगुण से संबंधित हो, वे सभी महासरस्वती के ही अधीन है। अध्यात्म के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना, ध्यान धारणा व समाधि में सफल होना भी महासरस्वती की कृपा से ही संभव हो पाता है, किन्तु इसके उपरांत भी महासरस्वती की धारणा को केवल इतने तक ही सीमित नहीं किया जा सकता है अर्थात् एकांगी रूप से उन्हें केवल सतोगुण प्रधान रूप में स्वीकार करना एक त्रुटि होगी। यह सत्य है कि उनमें सत्व की प्रधानता है, किन्तु वे जीवन के अन्य दो आवश्यक गुणों रज और तम से सर्वथा नहीं है। शास्त्रों में भगवती महासरस्वती की निम्न स्तुति से यह बात पूर्णता से प्रमाणित होती है –
यथा तु देवि भगवान ब्रह्मलोक पितामह ।
त्वां परित्यज्य नो तिष्ठेत तथा भववप्रदा ।।
वेदश्नस्त्राणि सर्वाणि नृत्यगीतदिकं च यत्।
वाहितं यत त्वया देवि तथा मे सन्तु सिद्धयः।।
लक्ष्मी मेधा वरा शिर्ष्टगौरी तुष्टी प्रभा मति:।
एतामि: पाहि तनुमिरष्टामिर्मा सरस्वती ।।
अर्थात् है देवी! जिस प्रकार लोक पितामह भगवान ब्रह्मा आपका परित्याग करके आपसे कभी अलग नहीं होते, उसी प्रकार हमारा भी अपने परिवार के लोगों से विलगाव न हो, हमें ऐसा वर दीजिए। वेद, सम्पूर्ण शास्त्रों, नृत्य-गीत आदि आपके अधिपत्य में रहने वाली जो विद्याएं है, वे मुझे भी उपलब्ध हो सकें तथा आप अपनी अधष्ट मूर्तियों – लक्ष्मी, मेधा, वरा, शिष्टि गौरी, तुष्टि, प्रभा एवं मति द्वारा सदा मेरी रक्षक हों ।
यह एक सामान्य स्तुति ही नहीं है वरन इसी स्तवन में भगवती महासरस्वती के स्वरूप विवेचन भी निहित है। भगवती महासरस्वती कृपालु होने पर केवल ज्ञान रूप में ही नहीं वरन् इन्हीं अष्ट रूपों में तो अपने साधक को वरदायक प्रभावों से परिपूर्ण कर देती है और यदि सूक्ष्मता के साथ अनुभव करें, तो क्या जिसे हम ज्ञान कहते है वह इन्हीं अष्ट रूपों का एक समवेत प्रभाव नहीं होता।
जिसके जीवन में लक्ष्मी हो, मेधा अर्थात् प्रत्युत्पननमति हो, वरा अर्थात् वरदायक प्रभावहो, शिष्टि अर्थात् सर्वरूपेण मंगलमयता हो, शिष्टता हो, गौरी अर्थात् शक्ति तत्व हो, तुष्टि अर्थात् परिपूर्णता का वातावरण हो, प्रभा अर्थात् शुभ्रता का एक आभामंडल हो तथा मति अर्थात् उचित-अनुचित का भेद करने की सामर्थ्य हो, उसका जीवन किस प्रकार से न्यून् रह सकता है।
इसी प्रकार का जीवन संतुलित होता है और जहां संतुलित जीवन होगा, वहां संतुलित मन-मस्तिष्क होगा ही। केवल संतुलित मन-मस्तिष्क से युक्त स्त्री-पुरुष ही अपने जीवन में पूर्णता की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
और यहां पूर्णता प्राप्त करने का तात्पर्य स्वयं अपने आपको इसी जीवन में ज्ञान के दोनों स्वरूप अर्थात् धन-सम्पदा और श्रेष्ठ मति के साथ शुभ्रता से आलोकित करना है। मनुष्य स्वयं में ही अपना मित्र हो सकता है और स्वयं में ही शत्रु होता है। सरस्वती अपनी अष्ट शक्तियों द्वारा उसके भीतर की विनाशकारी बुद्धि को शांत कर उसे संरचनात्मक कार्यों की ओर ले जाती है।
जीवन की संरचना आपकी उत्पति है, लेकिन उस संरचना में विशुद्ध भाव को जाग्रत करना और उसके साथ ही दुर्बल, क्षीण व दरिद्र मानसिकता को समाप्त करना, व्यक्ति अर्थात् साधक के स्वयं के भीतर निहित है। जब व्यक्ति साधक बन जाता है, तब वह अपनी जड़ता को समाप्त कर चैतन्यता की ओर अग्रसर होता है।
सरस्वती सरसता प्रदान करने वाली देवी है, यह उस शक्ति तत्व से संयोजित है, जिससे जीवन में सौन्दर्य, राग, संगीत की उत्पति हो सके, जीवन में शुष्कता समाप्त हो सके, जीवन को पहचानने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो सकें। केवल धन प्रबलता के रूप में जीवन को न देखकर धन को अपने आधीन कर जीवन को नए रूप में देखने की क्रिया केवल सरस्वती के माध्यम से ही प्राप्त हो सकती है।
यह उल्लेख करना इसलिए आवश्यक था, क्योंकि भगवती धन संपदा की साधना पूर्ण रूप से एक सात्विक साधना है तथा इसमें आचार-विचार में जितनी अधिक निष्कपटता होगी साधना में सफलता भी उतनी ही अधिक सन्निकट होगी। धन संपदा साधना किसी भी माह के शुक्ध्ल पक्ष की पचंमी अथवा पूर्णिमा को सम्पन्न की जा सकती है तथा इन समस्त पंचमियों में से भी माघ मास की शुक्ल पक्ष की वंसत पंचमी और माघ पूर्णिमा को विशेष फलदायक माना गया है।
साधना विधान
इस साधना को कोई भी स्त्री या पुरुष सम्पन्न कर सकता है। गृहस्थ सुख के आकांक्षी साधक-साधिकाओं के लिए यह एक अत्यंत उपयोगी साधना विधि है। उपरोक्त दिवस को प्रातःकाल शीघ्र उठकर नित्य कर्मों से मुक्त हो, स्नान कर, पीले वस्त्र धारण कर लें। साधना स्थान धुला व स्वच्छ होना आवश्यक है। साधक अथवा साधिका के पास ताम्र पत्र पर अंकित “धन संपदा यंत्र’, “आठ लघु नारियल’, “धन सम्पदा माला” आवश्यक साधना सामग्री के रूप में विद्यमान होनी चाहिए ।
समस्त साधना सामग्री प्राप्त कर किसी ताम्र पात्र या स्टील की थाली में कुंकुम से स्वस्तिक का अंकन करें –
स्वस्तिक के ऊपर “धन संपदा यंत्र! स्थापित कर उसके चारों ओर अष्ट संपदा के प्रतीक रूप में “आठों लघु नारियलों की स्थापना करें तथा यंत्र एवं लघु नारियलों का पूजन श्वेत चंदन, अक्षत, श्वेत पुष्प, सुगन्धित अगरबत्ती या धूप तथा दीपक से करें। इनमें से यदि कोई वस्तु उपलब्ध न हो सके, तो मन में कोई संशय लाने की आवश्यकता नहीं है, उस वस्तु का मानसिक रूप से स्मरण कर थोड़े से अक्षत चढ़ा दें। दीपक का सम्पूर्ण पूजन काल में प्रजज्वलित रहना अति आवश्यक है। इस संक्षिप्त पूजन को करने के उपरांत भगवती लक्ष्मी से अष्टरूपेण जीवन में समाहित होने की प्रार्थना कर तथा अपनी एक मनोकामना का स्मरण कर जिसकी पूर्ति तत्काल रूप से आवश्यक हो, ‘धन सम्पदा माला” से निम्न मंत्र की पांच माला मंत्र जप सम्पन्न करें –
मंत्र जप के बाद समस्त पूजन सामग्री को उसी प्रकार रहने दे तथा क्षमस्व परमेश्वरी” कहकर स्थान को छोड़ नित्य का कार्य व्यापार, नौकरी आदि सम्पन्न करें। सायंकाल यंत्र माला व लघु नारियलों को किसी नदी, सरोवर, मंदिर या पवित्र स्थान पर विसर्जित कर दें उपरोक्त साधना किसी भी शुक्ल पंचमी के साथ-साथ किसी भी गुरुवार की प्रातः भी सम्पन्न की जा सकती है। धन संपदा साधना जीवन को सीन्दर्य युक्त करने की साधना है, अतः यह साधना श्रेष्ठ जीवन साथी प्राप्त करने के लिए की जा सकती है, क्योंकि प्रेम और सौन्दर्य धन सम्पदा भी श्रेष्ठ कर्म और साधना के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,