





उन्होंने जीवन के मूलभूत रूप को समझने के बाद ही पाया कि मानव जीवन पूर्ण है। पूर्णता प्राप्ति के लिए मनुष्य जीवन के द्वारा ही सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है । पशु-पक्षी, जीव-जन्तुओं के जीवन से उक्त तरह की कोई भी स्थिति को प्राप्त करना सम्भव नहीं है। मनुष्य सांसारिक जीवन के रूप में ही आकर राम-कृष्ण आदि महापुरुषों ने लीलाएं कि तथा समाज को दिशा निर्देश दिया। इसलिए हमारे ऋषियों ने मानव जीवन की सुरक्षा के लिए, अकाल मृत्यु, कलिष्ट रोगों से बचने के लिए सुरक्षा के अनेक उपाय ढूँढे तथा अनेक मंत्र तथा साधनाओं के दारा जीवन को उच्चतम बनाया। दीर्घायु और कायाकल्प के माध्यम से इसे अजर और अपराजित किया |
देवी साधनाओं से और शक्तियों से आप्लावित कर इसे सुरक्षित करके पुरुषोत्तम बनने की क्रिया तक पहुंचाया जहां काल तक का झांका असमय में आकर उसे उड़ा नहीं सकता था। वे सभी हमारे ऋषि मृत्यु को अपने वश में किये हुए थे । बिना उनकी इच्छा के मृत्यु नहीं आ सकती थी ।वे इच्छा से मृत्यु की वरण करते थे। कालजयी महापुरुषों के द्वारा ही ये भारत देश विश्वगुरु की पदूवी प्राप्त कर पाया, वे काल की हर गतिविधि से परिचित थे, उस क्षण विशेष का उपयोग करना जानते थे। इसलिए वे निर्भय एवं निर्डन्द थे ।
वे जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए देवताओं की साधना करना जानते थे, मंत्र तथा साधनाओं के माध्यम से उन्हें अपने समक्ष आहुत कर सकते थे। रोग शोक को समाप्त करने के लिए उन देवताओं की आराधना तथा मंत्र साधना करना जानते थे। यही एक विधि है जिसके द्वारा जीवन को अखण्ड सुरक्षित किया जा सकता है।
समय ने करवट बदली, उनकी अपनी ही संतान ने ऋषियों के उस पावन ज्ञान को, साधनाओं को समझने और सोचने से इन्कार कर दिया। मनुष्य आधुनिकता और विज्ञान के इस चकाचौंध में इतना खो गया कि ऋषियों की संतति, अपने ही पूर्वज उन्हें तुच्छ और बौने लगने लगे। अध्यात्म सम्बन्धी, त्याग और तपस्या को उन्होंने आडम्बर और मिथ्याचार के कटघरे में ला खड़ा कर दिया। घर का दीया भी घर में आग लगा दे तो बाहर से कभी भी खतरा आ सकता है। अपनी ही संतान जब अपने ज्ञान को समझने में असक्षम हो जाये, कुमार्गी हो जाये तो श्रद्धा और समर्पण के अभाव में उस दिव्यतम चेतना युक्तं मंत्र ज्ञान का दीया नहीं जल सकता। कुपात्र को दिया गया ज्ञान बहुत ही भयावह होता है । पागल के हाथ में चाकू देने से वह खुद घायल होगा और औरों को भी चोट पहुंचा सकता है।
भगवतपाद शंकचाराचार्य ने अपने अयोग्य उत्तराधिकारी को अपनी उच्चतम सिद्धियों को दिया, उस पाद पद्म ने अपने ही गुरु को जहर देकर मार डाला | उसके बाद सभी गुरुओं को सोचने के लिए विवश होना पड़ा । शिष्यता का आखिर मापदण्ड क्या है । शिष्यता संदेह के घेरे में आ गई थी तब से ।
आज सम्पूर्ण मानवता इतनी असुरक्षित और जीवन के बारे में चितिन्त है जितना पहले कभी नहीं थी। इतने अस्त्र-शस्त्र तथा अणु बम होने के बाद भी सुरक्षित स्थान में भागने के लिए सर्वत्र भगदड़ मची हुई है, इतना कोहराम मचा हुआ है जिससे पता लगता है कि जीवन की अपेक्षा मृत्यु अधिक बलवती प्रतीत हो रही है। सर्वत्र कुछ की विभीषिका बनी हुई है । उसके साथ साथ प्राकृतिक आपदा भी भयावह स्थितियां उत्पन्न कर रही हैं। इतनी सम्पदाओं के बाद भी विज्ञान के सुरक्षा सम्बन्धी चिन्तन पर संदेह उत्पन्न हो गया है।
इसी स्थिति से निपटने के लिए आज पुनः भारतीय ऋषियों की अनमोल धारणाओं को समझने के लिए सब प्रयत्नशील दिखाई दे रहे हैं, चाहे लाख कोशिश कर ले जीवन को सुरक्षित और आनन्दित करने के लिए अन्य कोई उपाय नहीं है । ऋषियों की साधना सम्बन्धित उन धारणाओं को आत्मसात करना ही पड़ेगा जिन्होंने मानवता के निश्च्छल कल्याणकारी कार्यों के लिए अपने आप को न्यौछावर कर दिया। आज पुनः सुरक्षा के विषय में सिंहावलोकन करना ही पड़ेगा तथा स्थायी सुरक्षा प्राप्त हो सकेगी ।
अमेरिका और इग्लैण्ड जेसे देश अपने को सबसे अधिक सुरक्षित समझते थे आज वे देश भी अपनी सुरक्षा के विषय में मात खा गये जो सदैव मानवता से खिलवाड़ करते रहे, अपने स्वार्थ के लिए भारत जैसे शांति प्रिय देश को धोखा देखकर बुद्धिमान बनते थे। प्रकृति ने उन्हें भी दण्ड देकर अपनी शक्ति का उन्हें स्मरण दिला दिया है।
इसमें सबसे बड़ी न्यू्नता और अपराध भारतवासियों का रहा है कि जिनके पास ज्ञान का भण्डार हो, अपार साहित्य हो, शिवरूपी मृत्युंजय देवता हो, उदात्म ऋषि मुनि जिनके पूर्वज हों, त्रिकालदर्शी यमराज के द्वार पर दस्तक देकर सावधान करने वाले पूर्वजों के रहते यह इतना कमजोर और निरीह होता रहा है अपने ही ज्ञान को बेचकर उनके सामने मेमने की तरह अपनी सुरक्षा के लिए मिमियाते रहे है । आज देश में कोई भी स्वाभिमानी कहे जाने वाले नेता ही नहीं रहे । आत्म गौरवगाथा को पुनर्जीवित करके अपने संतान को वीरता का पाठ पढ़ा सके । इतना विशाल देश सर्व साधन सम्पन्न होकर भीख का कटोरा लेकर जगह-जगह फिर रहा है। अपनी अस्मिता, स्वाभिमान को सरे आम बाजार में नीलाम कर रहा है| छोटे-छोटे देशों से मात खा रहे हैं। दो कोड़ी के देश से जो अपनी सहायता से मौज करते है उनके सामने भी गिड़गिड़ा रहे हैं। शासन सता वाले भी देश की शक्ति और गौरव को सरेआम नीलाम कर रहे हैं। आज भारत सबसे कमजोर शक्तिहीन बन गया है। ऐसा क्यों हुआ, इतने बुजदिल इसलिए हो गये कि अपनी शिक्षा नीति पराधीन हो गई। हम नकली और नकलची हो गये ।
शिवाजी, महाराणा प्रताप, परशुराम, सुभाषचन्द्र बोष जैसे वीर और स्वाभिमानी देश भक्तों की गाथा की घुटूटी अपने संतान को नहीं पिला कर नाचने और गाने वाले नर्तक बन गये। स्कूल, कॉलेजों में क्लर्क तो बनाये, घूसखोर और कामचोर बाबू भी बन गये किन्तु मर्यादित मानव नहीं बना पाये । निस्वार्थीजन सेवक नहीं बना पाये।
आज ऋषियों की उस चेतना को पुर्नक्रियान्वित करने का समय आ गया है | उनकी साधनात्मक प्रक्रिया को उनके चरणों में बैठकर आत्मसात करने का अवसर प्राप्त हो रहा है। उनके ज्ञान और चेतना को सीखने के लिए श्रेष्ठ गुरु का सान्निध्य प्राप्त करना पड़ेगा और साथ ही शिष्यत्व के मापदण्ड को अपनाना पड़ेगा | समर्पण, श्रद्धा और सेवा उस ज्ञान को प्राप्त करने का मूल सूत्र है तभी हम अपने जीवन की अखण्ड सुरक्षा के विषय में पूर्ण आसवश्त हो सकते हैं । तभी अकाल मृत्यु और मृत्यु के भय से मुक्त हो कर निर्भय हो सकते हैं।
मृत्युंजय बनने की क्रिया निर्भयता एवं सम्पूर्णता रोगों एवं भय से मुक्त्ति की प्राप्ति के लिए इस नववर्ष पर अखण्ड शिव शक्तति दिव्याभिषेक दीक्षा प्राप्त कर हमारा जीवन सुगंधयुक्तवत, पुष्टिवर्धक एवं दिव्यता से युक्त हो, जीवन में धर्म, अर्थ, काम की तीनो स्थितियां श्रेष्ठ रुप में प्राप्त हो सके। हम मृत्यु भय से मुक्त होकर उसी प्रकार अलग हो जाये, जिस प्रकार पूर्ण पका हुआ फल वृक्ष से अलग हो जाता है।
हमारे ऋषि मृत्यु को अपने वश में किये हुए थे बिना उनकी इच्छा के मृत्यु नहीं आ सकती थी वे इच्छा से मृत्यु को वरण करते थे। भीष्म पितामह की तरह इच्छा मृत्यु का वरण करने का सामर्थ्य प्राप्त कर सकते हैं। वे काल की हर गतिविधि से परिचित थे। वे उस क्षण विशेष का उपयोग करना जानते थे। इसलिए वे निर्भय एवं निर्द्वन्द थे। ऐसी ही उच्च कोटी की यह दिव्यतम दीक्षा नववर्ष पर प्राप्त होगी ।
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