





वैताल साधना भी ऐसी ही सहज साधना है। यदि साधक निर्भय होकर इस साधना को सिद्ध करता है, तो वह जीवन में उन सब उपलब्धियों को प्राप्त कर लेता है, जो उसके जीवन का लक्ष्य होता है। वैताल सिद्धि दिवस के अवसर पर योगी महाकाल के द्वारा स्पष्ट की हुई एक दुर्लभ और अद्वितीय साधना विधि।
एक बार जब दक्ष के यज्ञ में सती ने कूद कर अपने प्राण त्याग दिये तो भगवान शिव अत्यन्त क्रोधित हुए, उनके क्रोध से तीनों लोक थर्राने लगे, पेड़ों के पतें झड़ गये, चारों तरफ़ बिजलियां कड़कने लगी और समुद्र में तफ़ूान सा आ गया।
उसी क्रोध के आवेश में भगवान शिव ने अपने सिर की एक लट को तोड़ कर दक्ष के यज्ञ में होम कर दी। फ़लस्वरूप एक अत्यन्त तेजस्वी, पराक्रमी, बलवान और साहसी वीर की उत्पति हुई जिसे ‘‘वैताल’’ शब्द से संबोधित किया गया। यज्ञ में से वैताल को प्रगट होते देख सारे देवता और दानव थर थर कांपने लगे, उसकी ज्वालाओं के सामने सारे देवता लोग झुलसने लगे और ऐसा लगने लगा कि यह पराक्रमी यदि चाहे तो पूरे भूमण्डल को एक हाथ से उठा कर समुद्र में फ़ेंक सकता है।
वैताल ने प्रगट होकर भगवान शिव के सामने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की, कि मेरी उत्पति क्यों हुई है, और मेरे लिए क्या आज्ञा है ? भगवान शिव ने उसे अभयदान देते हुए कहा कि तुम्हें इस दक्ष का यज्ञ विधवंस करना ही है, और दक्ष का सिर काट कर मेरे चरणों में पटक देना है। पलक झपकते ही वैताल ने ये दोनों काम कर दक्ष का सिर काट कर गेंद की तरह भगवान शिव के चरणों में लुढ़का दिया।
तब भगवान शिव ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उसे अमरता का वरदान दिया और कहा कि इस समस्त ब्रह्माण्ड में तुम्हें कोई मार नहीं सकता, कठिन से कठिन और असंभव से असंभव कार्य तुम पलक झपकते ही कर सकोगे, तुम मेरे गण हो, अतः जो साधक तुम्हारी साधना कर तुम्हें प्रत्यक्ष प्रकट करें, उसके सामने शान्त स्वरूप में उपस्थित होना और जीवन भर उसकी छाया की तरह रक्षा करना, यही नहीं अपितु वह जीवन में तुम्हें जो भी आज्ञा दे, जिस प्रकार की भी आज्ञा दे उस आज्ञा का पालन करना ही तुम्हारा कर्तव्य होगा – ऐसा कह कर भगवान शिव सती की लाश को अपने कंधो पर डाल कर अन्तधर्यान हो गये। यह घटना फ़ाल्गुन शुक्ल तृतिया को घटित हुई, इसीलिए एक दिवस को ‘‘वैताल सिद्धि दिवस’’ कहा गया और उच्चकोटि के साधक इस दिन का अवश्य उपयोग करते हैं तथा वैताल को सिद्ध कर अपने जीवन को सभी दृष्टियों से पूर्णता प्रदान करते हैं।
इतिहास में यह प्रसिद्ध है, कि सान्दीपन आश्रम में भगवान श्री कृष्ण ने भी फ़ाल्गुन कृष्ण तृतिया को ही वैताल सिद्धि प्रयोग सम्पन्न किया था, जिसके फ़लस्वरूप वे महाभारत में अजेय बन सके, और जीवन में अद्वितीय सिद्ध हो सके, हजारों बाणों के बीच भी वे सुरक्षित रह सके। विक्रमादित्य ने भी वैताल सिद्धि प्रयोग कर अपने जीवन के कई प्रश्नों को सुलझा लिया था।
आगे चल कर गुरु गोरखनाथ और मछिन्दर नाथ तो वैताल साधना के सिद्धतम आचार्य बने, और इस साधना द्वारा उन्होंने अपने जीवन में उन सभी उपलब्धियों को प्राप्त किया, जो जीवन में आवश्यक होती हैं। गोरक्ष संहिता के अनुसार वैताल साधना के निम्न आठ लाभ है –
1 वैताल साधना से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, यह अत्यन्त सौम्य और सरल साधना है। जब वैताल साधना सिद्ध होती है, तो मनुष्य रूप में, सरल और शान्त प्रकृति रूप में, वैताल प्रगट होता है और जीवन भर दास की तरह साधक के कार्य सम्पन्न करता है।
2 वैताल सिद्ध होने पर वह छाया की तरह अवश्य रूप में साधक के साथ बना रहता है, और प्रतिपल प्रतिक्षण उसकी रक्षा करता है। प्रकृति, अस्त्र, शस्त्र या मनुष्य उसका कुछ भी अहित नहीं कर सकते, किसी भी प्रकार से उसके जीवन में न तो दुर्घटना हो सकती है और न उसकी अकाल मृत्यु ही संभव है।
3 ऐसे साधक के जीवन में शत्रुओं का नाम निशान नहीं रहता, वह कुछ ही क्षणों में अपने शत्रुओं को परास्त करने का साहस रखता है, और उनका जीवन निष्कंटक और निर्भय होता है। लोहे की सलाखें या कठिन दीवारें भी उसका कुछ भी नहीं कर सकती।
4 वैताल भविष्य सिद्धि सम्पन्न होता है, अतः अपने जीवन या किसी के भी जीवन के भविष्य के बारे में साधक जो भी प्रश्न उससे पूछता है, उसका तत्काल उत्तर प्रामाणिक रूप से मिल जाता है, ऐसा व्यक्ति सही अर्थों में भविष्य दृष्टा बन जाता है।
5 जो साधक वैताल को सिद्ध कर लेता है, वह वैताल के कंधो पर बैठ कर अदृश्य हो सकता है, एक स्थान से दूसरे स्थान पर कुछ ही क्षणों में जा सकता है और वापिस आ सकता है, उसके लिए पहाड़, नदियां या समुद्र बाधक नहीं बनते। ऐसा साधक कठिन से कठिन कार्य को वैताल के माध्यम से सम्पन्न करा लेता है और चाहे कोई व्यक्ति कितनी ही दूरी पर हो, उसे पलंग सहित उठा कर अपने यहां बुलवा सकता है और वापिस लौटा सकता है, उसके द्वारा गोपनीय से गोपनीय सामग्री प्राप्त कर सकता है।
6 वैताल प्रयोग सिद्ध होने पर साधक अजेय, वीर, साहसी, कर्मठ और अकेला ही हजार पुरुषों के समान कार्य करने वाला व्यक्ति बन जाता है।
वास्तव में ही वैताल साधना सौम्य और सरल साधना है। जो भगवान शिव की साधना करता है, वह वैताल साधना भी सम्पन्न कर सकता है जिस प्रकार से भगवान शिव का सौम्य स्वरूप है, उसी प्रकार से वैताल का भी आकर्षक और सौम्य स्वरूप है। इस साधना को पुरुष या स्त्री कोई भी सम्पन्न कर सकता है।
यद्यपि यह तांत्रिक साधना है, परन्तु इसमें किसी प्रकार का दोष या वर्जन नहीं है। गायत्री उपासक या देव उपासक किसी भी वर्ण का कोई भी व्यक्ति इस साधना को सम्पन्न कर अपने जीवन में पूर्ण सफ़लता प्राप्त कर सकता है।
सबसे बड़ी बात यह है, कि इस साधना में भयभीत होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है, यह घर में बैठ कर के भी साधना सम्पन्न की जा सकती है। साधना करने के बाद भी साधक के जीवन में किसी प्रकार अन्तर का नहीं आता, अपितु उसमें साहस और चेहरे पर तेजस्विता आ जाती है, फ़लस्वरूप वह जीवन के अभावों, कष्टों और बाधाओं को दूर कर सकता है।
गोरखनाथ के भंडारे:- गोरखनाथ के बारे में तो स्पष्ट है, कि उनके हजारों शिष्य थे, पर उन्होंने कभी किसी से किसी प्रकार की कोई याचना नहीं की। उन्हें वैताल सिद्धि थी, अतः वैताल के माध्यम से वे जंगल में भी सुस्वाद और स्वादिष्ट भोजन मंगवा लेते थे और मन चाहा भोजन प्राप्त कर हजारों शिष्यों को खिला देते थे। यही नहीं अपितु जीवन भर गोरखनाथ के शिष्यों ने मखमली गद्दों पर विश्राम किया, उच्च कोटि का भोजन किया, और उनके जीवन में धन की, स्वर्ण की, और सामग्री की कभी किसी प्रकार की कोई न्यूनता नहीं रही।
कई स्थानों पर वर्णन आता है, कि गोरखनाथ ने विशाल योगियों के सम्मेलन में हजारों योगियों को वे भोजन करवा देते थे। वे स्वयं एक छोटी सी कोठरी में बैठ जाते थे, दरवाजा बन्द कर देते थे और छोटी सी बारी खोल देते थे, अन्दर वैताल को प्रगट कर उस छोटी सी बारी के द्वारा विविध प्रकार के व्यंजनों को बाहर भिजवाते रहते थे, जिसके फ़लस्वरूप उनके शिष्य, हजारों योगियों को एक ही समय में भोजन कराने में समर्थ हो पाते थे, यही नहीं अपितु उन योगियों को वस्त्र, द्रव्य आदि भी प्रचुरता से प्रदान करते थे। वास्तव में ही आज के युग में वैताल साधना अत्यन्त आवश्यक और महत्वपूर्ण हो गई है। दुर्भाग्य की बात यही है कि अभी तक इस साधना का प्रामाणिक ज्ञान बहुत हो कम लोगों को था। दूसरे साधक ‘‘वैताल’’ शब्द से ही घबराते थे, परन्तु ऐसी कोई बात नहीं है, जिस प्रकार से साधक लक्ष्मी, विष्णु या शिव आदि की साधना सम्पन्न कर लेते है, ठीक उसी प्रकार से सहज भाव से वे वैताल साधना भी संपन्न कर सकते हैं।
साधना समय:- यों तो फ़ाल्गुन शुक्ल तुतिया ‘वैताल सिद्धि दिवस’ है। परन्तु इसके अलावा भी साधक किसी भी रविवार को यह साधना सम्पन्न कर सकते हैं, पर यदि वैताल सिद्धि दिवस के अवसर पर यह साधना सिद्ध की जाए तो सफ़लता की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है।
साधना सामग्री:- इस प्रयोग में न तो कोई पूजा और न कोई विशेष सामग्री की आवश्यकता होती है, तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार इस प्रयोग में केवल तीन उपकरणों की जरूरत होती है।
सिद्धिप्रदायक वैताल यंत्र, सिद्धिदायक वैताल माला और भगवान शिव का या महाकाली का चित्र। इसके अलावा साधक को अन्य किसी प्रकार की सामग्री जल पात्र या कुंकुंम आदि की जरूरत नहीं होती। यह साधना रात्रि को संपन्न की जाती है, परन्तु साधक भयभीत न हो और न विचलित हो, वह निश्चित रूप से इस साधना को सम्पन्न कर सकता है।
साधना प्रयोग:- साधक रात्रि को दस बजे के बाद जल से स्नान कर ले और स्नान करने के बाद अन्य किसी पात्र या वस्त्र को छुए नहीं या तो वह सर्वथा नग्न होकर साधना सम्पन्न करें अथवा पहले से ही धोकर सुखाई हुई काली धोती को पहिन कर काले आसन पर दक्षिण की ओर मुंह कर घर के किसी कोने में या एकान्त स्थान में बैठ जाए।
फि़र सामने एक लोहे के पात्र या स्टील की थाली में वैताल यंत्र को स्थापित कर दे जो कि पहले से ही मंत्र सिद्ध प्राणश्चेतना युक्त हो। इसके पीछे भगवान शिव या महाकाली का चित्र फ्रेम में मढ़वा कर स्थापित कर दें। फि़र साधक हाथ जोड़ कर वैताल कर ध्यान करें।
ध्यान
धुम्र-वर्ण महा-कालं जटा-भरान्वितं यजेत्
त्रि-नेत्रं शिव-रूपं च शक्ति-युक्तं निरामयं।
दिगम्बरं घोर-रूपं नीलांछन-चय-प्रभम्
निर्गुण च गुणाधारं काली-स्थानं पुनः पुनः।।
ध्यान के उपरान्त साधक वैताल माला से निम्न मंत्र की 101 माला मंत्र जप सम्पन्न करें। यह मंत्र छोटा होते हुए भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है और मुण्ड माला तंत्र में इस मंत्र की अत्यन्त प्रशंसा की हुई है।
यदि मंत्र जप पूर्ण हाने से पहले ही या मंत्र जप सम्पन्न होते होते अत्यन्त सौम्य स्वरूप में वैताल स्वयं हाथ जोड़ कर कमरे में प्रगट हो जाए, तब पहले से ही ला कर रखे गये बेसन के चार लड्डूओं का भोग वैताल को लगा दें, और अपने हाथ में जो ‘‘वैताल माला’’ है, वह उसके गले में पहना दें। ऐसा करने पर वैताल वचन दे देता है, कि जब भी तुम उपरोक्त मंत्र का ग्यारह बार उच्चारण करोगे तब मैं अवश्य उपस्थित होऊंगा और आप जो भी आज्ञा देंगे उसे पूरा करूंगा, ऐसा कह कर वैताल, माला को वही छोड़ कर अदृश्य हो जाता है।
दूसरे दिन साधक प्रातः काल उठ कर स्नान आदि से निवृत्त होकर वह वैताल यंत्र, वैताल माला और वह भोग किसी मंदिर में रख दें, अथवा नदी तालाब या कुएं में डाल दें, उस महाकाली या भगवान शिव के चित्र को पूजा स्थान में स्थापित कर दें।
इस प्रकार करने पर वैताल साधना सिद्ध हो जाती है और इसके बाद साधक जब भी मात्र ग्यारह बार उपरोक्त मंत्र का उच्चारण करता है तो अवश्य ही वैताल उसकी आंखों के सामने प्रगट होता है और उस समय साधक उसे जो भी आज्ञा देता है, वैताल तत्क्षण उस आज्ञा का पालन कर साधक का कार्य सम्पन्न कर लेता है।
वास्तव में ही यह अत्यन्त गोपनीय प्रयोग है, अतः यह प्रयोग सामान्य व्यक्ति को, निन्दा करने वाले या तर्क करने वाले दुराचारी को नहीं देना चाहिए और न इसकी विधि समझानी चाहिए।
वस्तुतः यह आपके जीवन का सौभाग्य है, कि योगीराज के द्वारा ऐसा तेजस्वी और अद्भुत प्रयोग प्राप्त हुआ है, जिसे आप समय पर संपन्न कर जीवन को पूर्णता प्रदान कर सकते हैं।
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