





साक्षात काल का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है— लेकिन यह धारणा गलत है, इनकी भी अलग-अलग योनियां होती हैं, जिनकी साधना-आराधना से लाभ प्राप्त होता है और जिनका दर्शन मात्र सौभाग्यदायी माना जाता है—–
शास्त्रों में मनुष्य की उन्नति के लिए चार प्रकार के पुरुषार्थ बताए गए हैं, जिसमें सबसे पहला ‘धर्म’ तथा दूसरा ‘अर्थ’ है, जबकि जीवन में धर्म को सर्वप्रथम स्थान दिया गया है, फिर भी धर्म से ही पूर्ण सम्पन्नता को प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक हैं कि हम इस भाग-दौड़ की जिन्दगी में, प्रतिस्पर्धा के जीवन में व्यापार व अन्य कार्यों के माध्यम से अर्थ संचय कर सकें, क्योंकि समाज में जीने के लिए अर्थ और धर्म में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
इस समाज में ‘‘स्वान्तः सुखाय’’ की महिमा प्राचीन काल से ही गाई जाती रही है, परन्तु सुख से आत्मा को संतोष भले ही पहुंचता हो, लेकिन उससे पेट नहीं भरा जा सकता। श्रम करने के लिए व्यक्ति को कोई और प्रेरणा चाहिए और आज के समाज में वह प्रेरणा पैसा जुटाना है। आज मनुष्य को अपनी मान-मर्यादा और प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए धन की आवश्यकता पड़ती ही है और यही कारण है कि धन को आज ईश्वर की तरह पूजा जाता है और धन प्राप्त कर लेने को ईश्वरीय सुख माना जाता है।
किन्तु व्यक्ति के लाख परिश्रम करने के बावजूद भी वह अर्थ संचय करने में अपने-आप को असमर्थ ही पाता है या कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो शीघ्र ही धनवान बन जाना चाहते हैं, और इसके लिए यह आवश्यक है कि वे किसी ऐसी दैवीय शक्ति का सहारा लें, जिससे कि वे शीघ्र ही उसके बल पर अपनी गरीबी व दरिद्रता को दूर कर जीवन में धनवान बन सकें।
हर व्यक्ति यही स्वप्न देखता है कि वह बिना परिश्रम किये एक दिन में ही करोड़पति बन जाए, परन्तु यह संभव नहीं है। अधिक नहीं, किन्तु कुछ परिश्रम तो उसे अवश्य ही करना पड़ेगा, उस अर्थ साधना को सम्पन्न करने के लिए, जिसके माध्यम से उसके स्वप्न को संभव व साकार रूप दिया जा सकता है, और वह संभव है ‘‘नागेश साधना’’ के माध्यम से। देव, किन्नर आदि की तरह नाग अर्थात सर्पों का भी एक अलग लोक है, जिसे हम ‘पाताल लोक’ कहते हैं। साधारण दृष्टि से सर्प एक जन्तु मात्र है, किन्तु ऐसा सोचना ठीक नहीं है। इनकी भी अनन्त जातियां है तथा ये अपने-आप में विभिन्न विशेषताएं लिए हुए होते हैं। पुराणों में इनकी विशेष कथाएं चर्चित है, जो मनुष्य और देवों की तरह चित्रित् हैं।
हमें सर्पों से जुड़ी अनेक घटनाएं प्रतिदिन देखने और सुनने को मिलती है। सर्पों को हम दन्तक कथाओं के माध्यम से विषैले और व्यर्थ की काट कर मनुष्यों या अन्य पशुओं को मार डालने वाले जीव मात्र ही समझ बैठे हैं, पर ऐसी बात नहीं है। ये तो साधना के माध्यम से अनन्त ऐश्वर्य तथा निधि प्रदान करने वाले होते हैं, क्योंकि ये पृथ्वी के नीचे दबे-गड़े हुए स्वर्णादि निधियों के स्वामी होते हैं और उनकी सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
साधना के द्वारा इनके प्रसन्न होने पर पृथ्वी में छिपी हुई सम्पत्ति को आसानी से हस्तगत किया जा सकता है या आकस्मिक धन-प्राप्ति के अनेक साधन उपलब्ध किए जा सकते हैं। अनेक ऐसे दिव्य शरीरधारी सर्प होते हैं, जिनकी आयु भी लम्बी होती है, तथा जिनके दर्शन मात्र सौभाग्यदायी होते हैं। इसीलिए इनकी पूजा भी अनेक स्थानों पर होती है। जहां मंदिर आदि स्थल बने होते हैं, वहां देवता की तरह ये भी यथा समय दर्शन देते रहते हैं। अनेक सर्प ऐसे भी होते है, जिनके मस्तक पर मणि लगी होती है और रात्रि में निकलते समय ये कभी-कभी ही दृष्टिगत होते हैं। कई तो इतने खूंखार होते हैं, जो मात्र अपने श्वास से ही जान ले लेते हैं। फिर भी ये अपने-आप किसी को नहीं काटते, जब कि इन्हें किसी प्रकार से पहले प्रताडि़त या पीडि़त न किया जाए।
हमारे भारतीय शास्त्रों के अनुसार ये देवकोटि में ही गिने जाते हैं, जो अनेक अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न होते हैं। इनकी साधना सौभाग्य तथा वैभवप्रद मानी जाती है, जिसके माध्यम से शीघ्र धन-लाभ की अवस्था बनती है। विष्णु पुराण के अनुसार – ‘‘समस्त पृथ्वी को शेषनाग ने ही अपने सिर पर धारण किया हुआ है। समुद्र में विष्णु भगवान शेषशायी माने जाते हैं और भगवान शंकर भी सदैव अपने गले में सर्प माल्य धारण किए हुए रहते हैं।’’ इसीलिए ‘नागेश साधना’ का मनुष्य के जीवन में एक विशेष महत्व है। नागेश साधना का वास्तविक ज्ञान हमें ‘‘स्वामी भूतेश्वरानन्द जी’’ से हुआ, जो देखने में पतली-दुबली काया वाले एक साधारण से व्यक्ति ही प्रतीत होते थे और एक झोला तथा गले में कई प्रकार की मालाएं धारण किए हुए रहते थे। उन्होंने ही यह बताया, कि अगर मनुष्य चाहे तो ‘नागेश साधना’ सम्पन्न कर शीघ्र से शीघ्र धन प्राप्त कर सकता है, क्योंकि इस साधना से आकस्मिक धन प्राप्त कर वह कुछ ही दिनों में सम्पन्न और धनाढ्य लोगों की श्रेणी में गिना जा सकता है।
किन्तु आज लोग नाग के नाम से ही भयभीत और आशंकित हो उठते हैं, नाग साधना करने से पूर्व उन्हें हर क्षण यह डर बना रहता है कि कहीं सांप आकर कुछ अनर्थ न कर दे। इसी भ्रामक धारणा से भयभीत होकर वे नाग साधना करने से हिचकिचाते हुए प्रतीत होते हैं, परन्तु यह बात सर्वथा गलत है। नाग साधना सम्पन्न करने से व्यक्ति को सदैव लाभ ही होता है, हानि नहीं।
इस प्रकार नाग चर्चा के दौरान ही उन्होंने हमें ‘नागेश साधना’ के बारे में सविस्तार पूर्वक बताया, जिसे सम्पन्न कर व्यक्ति गड़े हुए धन, लौटरी, जुए आदि से अचानक प्राप्त हुए धन का स्वामी बन सकता है, किन्तु उन्होंने यह भी बताया, कि इस साधना को एक विशेष मुहूर्त में सम्पन्न किया जाना आवश्यक है, क्योंकि विशेष क्षणों में ही साधक को उसका लाभ प्राप्त हो सकता है, और वह विशेष मुहूर्त है ‘‘नाग पंचमी’’, जिस दिन साधना करने से नाग प्रसन्न होते ही हैं और प्रसन्न होने के उपरान्त व्यक्ति के जीवन से गरीबी व दरिद्रता जैसा शब्द हमेशा-हमेशा के लिए मिटा देते हैं। वैसे तो इस दिन नागों को दूध पिलाने की भी प्रथा जन-सामान्य में प्रचलित है, क्योंकि नाग एक रक्षक के रूप में भी उस मनुष्य की सहायता करते हैं।
नागेश साधना सम्पन्न करने वाले साधक को चाहिए कि वह साधना के पश्चात् चांदी का एक सर्प, जो कि स्वयं किसी सुनार के द्वारा पहले से ही बनवा कर रख लेना चाहिए, किसी शिव मंदिर में चढ़ा आए। भूतेश्वरानन्द जी ने बताया, कि ऐसा करने पर ही साधक को पूर्ण सफलता प्राप्त हो सकती है और ऐसा विष्णु पुराण आदि शास्त्रों में भी वर्णित है। उनकी बताई गई इस साधना को प्रामाणिक रूप देने के लिए कई साधकों को इस साधना को सम्पन्न कराया गया, और उन्हें इसके विशेष लाभ भी प्राप्त हुए, जिसके आधार पर ही हम यह कह सकते हैं कि यह एक प्रामाणिक साधना है और इस साधना से निश्चित ही धनागम के स्त्रेत तो खुल ही जाते हैं, साथ ही उसे आकस्मिक रूप से भी धन की प्राप्ति होने लग जाती है।
यह एक गुह्य साधना है, जिसका ज्ञान बहुत कम लोगों को है किन्तु इस साधना के बाद साधक को जीवन भर कभी धन की कमी महसूस नहीं होती। व्यक्ति को यह साधना नाग पंचमी के दिन ही सम्पन्न करनी चाहिए, परन्तु बिना किसी भय के और इसके लिए यह आवश्यक है कि साधक के मन में उस साधना के प्रति पूर्ण श्रद्धा व विश्वास हो, जिसके आधार पर ही इस साधना में सफलता प्राप्त हो सकती है।
आवश्यक सामग्रीः शंख-निधि, चांदी का सांप, गुह्य माला।
समयः नाग पंचमी या अन्य किसी शनिवार के दिन प्रातः पांच बजे से आठ बजे के मध्य में।
साधना विधि
साधक ‘नाग पंचमी’ के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर, स्नानादि क्रिया से निवृत होकर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके लाल आसन पर बैठ जाए। अपने सामने छोटी चौकी पर लाल वस्त्र बिछा दें, तथा बीच में कुंकुंम या चंदन से नागेश का अर्थात सर्प का चित्र बनाएं तथा सर्प के ऊपर चावलों की एक ढेरी बनाकर उस पर ‘शंख-निधि’ को स्थापित करें। उसका मुंह साधक अपनी ओर रखे, तथा उसके आगे स्टील या अन्य किसी प्लेट में ‘चांदी के सर्प’ (यदि यह उपलब्ध न हो सके, तो चांदी की तार लेकर उसे सर्प की भावना देकर पूजन सम्पन्न करें) को गंगाजल से या दूध से स्नान कराकर स्थापित कर दें। फिर ‘शंख-निधि’ तथा ‘सर्प’ का कुंकुंम, अक्षत व पुष्पादि से पूजन करें, और तेल के पांच दीपक जला दें (तेल तिल या सरसों किसी का भी ले सकते हैं)। ये दीपक मंत्र-जप करते समय निरन्तर जलते रहने चाहिए, अतः ध्यान रखें कि साधना काल में दीपक न बुझने पाए।
साधक बाद में ‘शंख-निधि’ को चावलों से भर दें, और फिर उसी आसन पर खड़े होकर ‘‘नमोऽस्तु सर्पेभ्यों ये के च पृथिवीमनु’’ इस मंत्र का दस मिनट तक जप करें, फिर आसन पर बैठ कर ‘गुह्य माला’, जो कि विशिष्ट मंत्रों से चैतन्य होती है, उससे निम्न मंत्र का पांच माला जप करें। मंत्र-जप के समय मन बिल्कुल शान्त होना चाहिए। आंख बन्द करके अपने इष्ट का या पूज्य गुरुदेव का ध्यान करें और इस साधना में सिद्धि हेतु उनसे मानसिक प्रार्थना करते रहें।
मंत्र जप के बाद गुरु आरती सम्पन्न करें तथा जो भी प्रार्थना करना चाहें, वह करें। इस साधना के उपरान्त साधक कुछ दिनों में ही इसके प्रतिफल या लाभ से स्वयं आश्चर्यचकित रह जाता है और आकस्मिक धन-लाभ की संभावना तो बनती ही है। साधना सम्पन्न करने के पश्चात उसी दिन या उससे अगले दिन इस साधना में प्रयुक्त पूजन सामग्री को जल में प्रवाहित कर दे।
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