





प्रत्येक मनुष्य भगवान विष्णु का अंश है। अनन्त चर्तुदशी भगवान विष्णु के अवतरण दिवस के साथ ही वह दिवस माना जाता है, जिस दिवस को उन्होंने जगत में कामना, इच्छा, परिश्रम, धर्म, अर्थ, काम का बीजारोपण सृष्टि में पुरुषों में किया जिससे वह पशुभाव छोड़कर पुरुष भाव में आया और अपना कर्तव्य भलीभांति समझने लगा।
अनन्त चर्तुदशी भगवान विष्णु का सृष्टि में पुरुष रूप में अवतरण दिवस माना जाता है। नारद संहिता में पुरुषों के लिए महाशिवरात्रि व्रत साधना, अनन्त चर्तुदशी व्रत साधना और नवरात्रि अष्टमी साधना विशेष मानी गई है। इसके अतिरिक्त गृहस्थ व्यक्तियों के लिए हजारों व्रत, पर्व, अनुष्ठान हैं लेकिन ये तीन दिवस साधना सफलता में पूर्ण श्रेष्ठतम रूप से सहायक हैं।
यह तो स्पष्ट है कि विष्णु तत्व के बिना जीवन का पालन नहीं हो सकता है क्योंकि जहां विष्णु हैं वहां भगवती लक्ष्मी हैं। संसार में प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य अपने परिवार का श्रेष्ठरूप से पालन करना है और वह शक्ति उसे भगवान विष्णु से ही प्राप्त हो सकती है क्योंकि वे जगत के पालनकर्ता हैं और प्रत्येक मनुष्य भगवान विष्णु का अंश है। अनन्त चर्तुदशी भगवान विष्णु के अवतरण दिवस के साथ ही वह दिवस माना जाता है, जिस दिवस को उन्होंने जगत में कामना, इच्छा, परिश्रम, धर्म, अर्थ, काम का बीजारोपण सृष्टि में पुरुषों में किया जिससे वह पशुभाव छोड़कर पुरुष भाव में आया और अपना कर्तव्य भलीभांति समझने लगा।
इस दिन साधक भगवान विष्णु के अनन्त रूप की साधना अवश्य करें। इसके अतिरिक्त यह साधना किसी भी रविपुष्य योग में, सिद्ध योग में, शुक्ल पक्ष की चर्तुदशी को प्रारंभ की जा सकती है। यह साधना जीवन को श्रेष्ठ पालनकर्ता बनाने की साधना है, स्वयं का निर्माण करने की साधना है। इस दिन सात्विक आहार लें और पूरे विधि विधान सहित साधना सम्पन्न करें। साधना का फल अवश्य प्राप्त होता है क्योंकि साधना देह में रोपा गया एक बीज स्वरूप है जो पहले अंकुरित होता है फिर धीरे-धीरे बढ़ता हुआ विशाल वृक्ष बनकर पूरे जीवन में छा जाता है।
साधना प्रारम्भ करने से पहले त्रयोदशी के दिन ही उचित सामग्री की व्यवस्था अवश्य कर लें। जिससे दूसरे प्रातः विधि विधान के सहित यह साधना को सम्पन्न कर सकें।
साधना सामग्री: इस साधना में मूल रूप से ‘विष्णु महायंत्र’ आवश्यक है, जिसे एक लकड़ी के पट्टे पर पीला वस्त्र बिछा कर स्थापित करें और पूरे अनुष्ठान में उसी रूप में स्थापित रहने दें, इसे हटाना ही नहीं है, इसके अतिरिक्त अबीर, गुलाल, कुंकुम, केसर, चंदन, मौली, सुपारी और अर्पण हेतु प्रसाद आवश्यक हैं। इस साधना क्रम में विष्णु के सभी स्वरूपों का पूजन किया जाता है। यह पूजन करते हुए ‘11 विष्णु कमल बीज’ चन्दन में डुबो कर अर्पित करना है, इस हेतु काफी मात्र में चंदन घिस कर पहिले से ही रख लेना चाहिए।
साधना विधान:- श्री विष्णु की साधना में विनियोग, साधना तथा पंचावरण पूजन का विशेष विधान है, सभी दिशाओं में स्थित विष्णु स्वरूपों का पूजन किया जाता है, अतः इसे इसी रूप में सम्पन्न करना है। अर्पण भी दाहिने हाथ से किया जाता है, वह विशेष ध्यान रहे।
विनियोगः-
अस्य श्री द्वादशाक्षरमन्त्रस्य, प्रजापति ऋषिः,
गायत्री छन्दः, वासुदेवः, परमात्मा देवता,
सर्वेष्ट सिद्धये जपे विनियोगः।
ऋष्यादिन्यासः-
ऊँ प्रजापति ऋषये नमः शिरसि।, गायत्री
छन्दसे नमः मुखे।, वासुदेव परमात्मा देवतायै
नमः हृदि। विनियोगाय नमः सर्वांगे।
करन्यास
ऊँ अंगुष्ठाभ्यां नमः।, ऊँ तर्जनीभ्यां नमः।,
ऊँ भगवते मध्यमाभ्यां नमः।, ऊँ नमो भगवते
अनामिकाभ्यां नमः। ऊँ नमो भगवते
कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
हृदयादिन्यास
नमः शिरसे स्वाहा, भगवते शिखायै वषट्,
वासुदेवाय कवचाय हुं, ऊँ नमो भगवते
वासुदेवाय अस्त्रय फट।
ध्यान
विष्णु नारद चन्द्रकोटि सदृशं शंखं रथांगं
गदाम्।, अम्भोजं दधातं सिताव्जनिलयं कान्त्या
जगन्मोहनम्।। आबद्धांगदहारकुण्डलमहामौलिं
स्फुरत्कंकणम्।, श्रीवत्सांकमुदारकौस्तुभधरं वन्दे
मुनीन्द्रैः स्तुतम्।।
भावार्थ- हाथों में कोटिशरचन्द्रधावल शंख, चक्र, गदा, पद्म लिये, सिर पर मुकुट, कानों में कुण्डल, गले में हार एवं उदार कौस्तुभमणि, बांहो पर केयूर एवं कलाई पर चमचमाते करभूषण कंकण धारण किये, अपनी कमनीय कान्ति से विश्वविमोहन करने वाले, ऋषि मुनि ने आवन्दित, श्रीवत्सांक, परम महत्वद्योतक वक्षस्थल पर श्वेत वामावर्त (चिन्ह विशेष) श्वेत कमलनिवासी मुनीन्द्रो के द्वारा संस्तुत भगवान विष्णु का मैं वन्दन करता हूं।
पीठ शक्ति पूजन: अपने सामने जो यंत्र स्थापित किया है, उस पर पुष्प चढ़ाते हुऐ –
ऊँ विमलायै नमः, ऊँ उत्कर्षिण्यै नमः, ऊँ
ज्ञानायै नमः, ऊँ क्रियायै नमः, ऊँ योगायै नमः,
ऊँ प्राच्यै नमः, ऊँ सत्यायै नमः, ऊँ ईशानायै
नमः, ऊँ अनुग्रहायै नमः (मधय में)
अब यंत्र स्थापना प्रारम्भ होती है, हाथ में पुष्प लेकर उसे चंदन में डुबो कर पीठ के मध्य में आसन स्थापित करें और निम्न बोलते हुए यंत्र को पुष्प के इस आसन पर स्थापित करें –
।। ऊँ नमो भगवते विष्णवे सर्वभूतात्मने
वासुदेवाय सर्वात्मसंयोगपीठात्मने नमः।।
अब पुनः ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नमः’ का पांच बार उच्चारण करें, तथा यह ध्यान करें कि श्री विष्णु देव यंत्र स्वरूप में स्थित हैं और उन्हें पुष्प अर्पित करते हुए आवरण पूजा के लिए आज्ञा प्राप्त करें।
आवरण पूजा- श्री विष्णु यंत्र के चार कोणों में चार आवरण पूजा तथा यंत्र प्रवेश द्वार की ओर पंचम आवरण पूजा सम्पन्न होती है। साधक को इसी क्रम में मंत्र बोलते हुए एक तुलसी पत्र तथा एक विष्णु कमल बीज चंदन में डुबो कर अर्पित करना है।
पंचमावरण-
ऊँ वं वज्राय नमः, ऊँ दं दण्डाय नमः, ऊँ
पं पाशाय नमः, ऊँ गं गदायै नमः, ऊँ पं
पद्माय नमः, ऊँ शं शक्त्यै नमः, ऊँ खं
खडगाय नमः, ऊँ अं अंकुशाय नमः, ऊँ त्रिं
त्रिशूलाय नमः, ऊँ चं चक्राय नमः
तत्पश्चात अंजलि में पुष्प लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि चढ़ाये –
ऊँ अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं पंचमावरणार्चनम्।।
पूजिताः तर्पिताः सन्तु।
इसके साथ ही पंचमावरण पूजा सम्पन्न होती है।
अब धूप इत्यादि देकर नमस्कार कर शान्त भाव से बैठ कर ‘वैजयन्ती माला’ से ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करना चाहिए, जप की संख्या साधक की इच्छा पर निर्भर करती है और यह क्रम निरन्तर चलते रहना चाहिए। शास्त्रोक्त विधान है कि 12 अक्षर के इस मंत्र का सम संख्या अर्थात 12 माला मंत्रों का जप करने से साधक को पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है तथा भगवान विष्णु की अभीष्ट कृपा सिद्धि से साधक मनोवांछित फल प्राप्त करता है। सब प्रकार के पाप दोष दूर हो कर साधक श्री विष्णु का तेज ग्रहण करने में समर्थ होता है इसलिए तो यह साधना निश्चय ही सर्वोतम साधना है
यदि आपके परिवारिक जीवन में बोझिलता तनाव अकारण शक, संदेह, प्रेम सामजस्य के अभाव की अर्नगल स्थितियाँ बनी हुई हैं। तो विवाहपरांत कभी भी वर-वधू स्वयं उपस्थित होकर अथवा अपना संयुक्त फोटो भेजकर पाणिग्रहण संस्कार दीक्षा, गृहस्थ सुख वृद्धि दीक्षा, अखण्ड सावित्री सौभाग्य वृद्धि दीक्षा, मेनका सौन्दर्य दीक्षा और अनंग कामदेव रति दीक्षा, प्राप्त करने से इन पंच स्थितियों को पति-पत्नी में चेतना से स्थापित किया जाता हैं जिससे गृहस्थ जीवन पंचभूत स्वरूप में श्रेयष्कर रूप में निर्मित होने की ओर अग्रसर होता हैं।
पति-पत्नी को चाहिए कि यथा शीघ्र ‘शिव पार्वती पाणिग्रहण’ में इंगित किए गए दिव्य ऊर्ध्वरित मंत्रों से सिद्ध हैं। ‘शिव वस्तक’ एवं ‘गौरा वस्तक’ को धारण करें। इन दोनों वस्तकों को लॉकेट रूप में धारण करें। किसी भी प्रदोष दिवस के दिन पति को चाहिए कि वह अपने हाथ से ‘गौरा वस्तक’ पत्नी के गले में पहना दें, तथा पत्नी ‘शिव वस्तक’ को अपने पति के गले में पहना दे। इस लॉकेट को दोनों को कम से कम तीन माह तक अवश्य धारण करना चाहिए। जिससे सांसारिक जीवन में एक दूसरे के प्रति आत्मीय और प्रेमभाव और सौभाग्य वृद्धि के साथ-साथ रिश्तों में मधुरता का संचार निर्मित होता हैं। पति-पत्नी दोनों को जीवन में आनन्द और रस की प्राप्ति होती हैं
फोटो द्वारा प्राप्त करने हेतु पति-पत्नी का नाम और विवाह तिथि भेजने पर दीक्षा प्रदान की जा सकेंगी।
नजरदोष निवारण और एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव की वृद्धि हेतु पति-पत्नी दोनों को गौरा वस्तक और शिव वस्तक अवश्य ही धारण करना चाहिए।
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