





अगर ज्ञान के पुंज को प्राप्त करना है, तो तुम्हें गुरु की एक-एक कसौटी को झेलने के लिये तैयार रहना पडे़गा। गुरु प्रहार करे और उसे तुमको सहन करना ही पडे़गा और फि़र भी तुम्हें मुस्कुराना ही पडे़गा, फि़र भी श्रद्धा व्यक्त करनी ही पडे़गी- मन से, हृदय से, प्राणों से।
गुरु को चाहिये कि वह तुम्हें पादपद्म नही बनने दे, तुम चाहे कितनी आरजू करो, मिन्नत करो, चापलूसी करो, तुम चाहे कितने ही पांव पसारो पर यदि गुरु सतर्क है तो तुम पर प्रहार करे और देखे, तुम्हे टेस्ट करे, बार-बार करे।
शंकराचार्य ने बहुत पहले ही पादपद्म को वह ज्ञान दे दिया, जबकि उसका अहम् तोड़ा ही नहीं था और जब अहम् तोड़ा तो उसके मन में यह आ गया, कि मुझको अब शंकराचार्य बन जाना चाहिये और मैं शंकराचार्य तब बन सकता हूं जब इनकी हत्या कर दूंगा। इतना जघन्य अपराध इसलिये हुआ क्योंकि उसका अहम् गला नहीं, उसके खून में गन्दगी बनी रही। यह शंकराचार्य की न्यूनता थी, वह शंकराचार्य की गलती थी और उस गलती का परिणाम शंकराचार्य को भुगतना पड़ा।
इतिहास उठाकर देख लें, इतिहास में ये गलतियां हुई है, गुरुओं ने गलतियां की है और शिष्यों ने उन गलतियों का लाभ उठाते हुए अपने आप को पतन के रास्ते पर डाला है। पर मैं वह गलती नहीं करूंगा जो बुद्ध ने कर दी, महावीर ने कर दी, जो शंकराचार्य ने कर दी।
इसलिये गुरु को चाहिये कि वह पादपद्म नहीं पैदा करे और शिष्य को चाहिये कि वह विवेकानन्द बने, उसके पास सेवा हो, श्रद्धा हो।
अगर तुम्हारी गुरु के प्रति श्रद्धा नहीं है तो व्यर्थ है, अगर तुम में सेवा करने की क्षमता नहीं है तब भी व्यर्थ है और यदि श्रद्धा कर भी रहे हो, तो तुम कोई एहसान नहीं कर रहे हो गुरु पर।
और यदि आप श्रद्धा देते हैं, सेवा करते हैं, तो गुरु उस ऋण को अपने ऊपर नहीं रख सकता, कोई भी गुरु शिष्य का ऋणी नहीं होना चाहता। परन्तु गुरु की यह विवशता होती है, कि शिष्य को तब तक वह पूर्णता नहीं दे सकता, जब तक कि उसका अहम् पूरी तरह गल नहीं जाता। तब तक सेवा के उस ऋण को गुरु को धारण करना पड़ता है, न चाहते हुए भी शिष्य के ही कल्याण के लिये गुरु को ऋण ढोना पड़ता है।
परन्तु जिस क्षण अहम गल जाता है, शिष्य पूर्णता प्राप्त कर लेता है और गुरु भी ऋण से मुक्त हो जाता है।
स्वच्छ तालाब में खिले प्राकृतिक कमल की भांति मैं अपने शिष्यों के मन में कमल विकसित कर रहा हूं। ऐसे कमल जिनमें जीवन की धड़कन हो, पवित्रता हो, दिव्यता और चेतना हो।
तुम सामाजिक वर्जनाओं की बात करते हो, तो समाज कब किसी को बढ़ने देता है। कौओं का झुण्ड कब चाहेगा कि उनमें से कोई हंस हो जाये, कीचड़ की गंदगी कब चाहेगी कि उसमें कोई कमल खिल जाये। गुलामी में सांस लेने वाले कब चाहेगे कि कोई ताजी हवा की सुवास से सुगन्धित, मस्त और आनन्दित हो जाये।
भगवान चाहे हमें एक गुण दें, चाहे दस गुण दें, यदि हम उन्हीं का विकास करते रहेंगे तो निश्चय ही वृद्धि होगी। अपने आपको हीन समझना, तुच्छ समझना और बिना पुरूषार्थ किए, बिना परिश्रम किए ईश्वर को दोषी ठहराना अपने आप को ही धोखा देना है।
सद्गुरुदेव ने कहा था कि मुझे तो आवश्यकता है जीवन्त शिष्यों की जो मुझ में आकर समा जाएं, मैं बाहें फ़ैलाएं खड़ा हूं। और जहां कोई शिष्य अपने ही बन्धनों द्वारा, संशय द्वारा मृत हो गया, वह सद्गुरु रूपी समुद्र में स्थायी भाव से नहीं रह सका। उसे किनारे पर आकर गिरना ही पड़ा। समुद्र की भांति जीवन्त सद्गुरुदेव के पास जीवन्त शिष्य ही रह सकते हैं। मेरे जीवन में निर्जीव शिष्यों के लिए स्थान ही नहीं है।
तुम्हारी इस मृत देह को प्राणों का स्पन्दन चाहिए और यह तभी हो सकता है, जब मेरे प्राणों से अपने हृदय को एकाकार कर सको, मेरे अन्दर अपने आप को समाहित कर सको, मेरे इस आनन्द के प्रवाह में मस्ती के साथ स्नान कर सको।
जब तुम अपने आप को शक्तिहीन अनुभव करो, जब तुम अपने आप को मृत तुल्य अनुभव करो, तब तुम मेरे साथ प्रकृति की तरह एकाकार हो जाओ और अपने आप को स्फ़ूर्तिवान, तरोताजा बनाकर वापिस अपनी दुनिया में लौट जाओ।
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