





भगवान योगेश्वर कृष्ण चौसठ कला पूर्ण व्यक्तित्व थे और इस कला में श्रेष्ठतम कला आंखों में वह अद्भुत सम्मोहन और उस सम्मोहन के फलस्वरूप एक क्षण के प्रवाह में ही गोपियां मुग्ध हो झूम उठती थीं और साथ ही झूम उठती थी सम्पूर्ण प्रकृति, जल, वायु और सृष्टि का कण-कण। जड़-चेतन, जीव-निर्जीव, पशु-पक्षी, स्त्री-पुरूष और देवी-देवता सभी को एक आनन्द के सागर में उतार देता था। कौन सी शक्ति, कौन सी विद्या, कैसी चैतन्यता थी उनके पास, जो उन्हें महापुरूषों की भीड़ में भी एक अद्वितीय स्थान पर लाकर खड़ा करती है? और क्या सम्बन्ध था उनके सम्मोहक व्यक्तित्व और उनकी बांसुरी, उनके पीत वस्त्रों, उनके मोर मुकुट तथा उनकी दिव्य मुस्कान में। यह सब सम्मोहन आकर्षण चुम्बकीय चेतना के फलस्वरूप ही सम्भव हो पाता है।
प्रत्येक व्यक्ति-वस्तु का एक रूप होता है और अपने रूप के आधार पर ही वह विषय-वस्तु सुन्दर या कुरूप की श्रेणी में विभाजित किया जाता है। सौन्दर्य के दो प्रकार होते है, एक तो बाह्य सौन्दर्य, जो कि दिखाई देता है, पोशाकों और वस्त्रों तथा विभिन्न तरह के लेपों से बनाया गया होता है। इस सौन्दर्य का प्रभाव कुछ क्षण तक ही रहता है। किसी बहुत सुन्दर स्त्री के अगर विचार-भाव उच्च नहीं हों, तो कुछ समय उसके साथ रहने से ही उससे घृणा हो जाती है। उसके पास बाह्य सौन्दर्य तो है, पर उसके अन्दर वह चुम्बकीय आकर्षण शक्ति नहीं है, वह सम्मोहन शक्ति नहीं है। आन्तरिक सौन्दर्य का आधार ही यह सम्मोहन शक्ति है।
कई तरह की क्रियाओं से व्यक्ति अपने अन्दर इस शक्ति का विकास कर सकता है, जिसके फलस्वरूप उसके चेहरे, शरीर एवं वाणी में आकर्षण स्पष्ट झलकेगा और लोग उसके प्रति खिंचे चले जाएंगे। लोग उससे बातचीत करना, सलाह लेना, उसके साथ बैठकर अपने आप को गौरवान्वित और आनन्दित महसूस करते हैं। उसके पास बैठने सें मन को प्रसन्नता और शान्ति मिलती है। क्योंकि किसी भी सुन्दर वस्तु को निहारने से मन में आह्लाद सा अनुभव होता ही है और यह आह्लाद आन्तरिक सौन्दर्य से सम्पन्न व्यक्ति के निकट बैठ कर ही प्राप्त किया जा सकता है। यही कारण है, कि किसी स्वच्छ निर्मल व शान्त मन वाले साधु, पुरुष या सन्त के पास जाने से मन प्रसन्न हो जाता है, आह्लादित हो जाता है, किसी शिशु या बालक के सौन्दर्य को देखने से मन खुश हो उठता है, क्योंकि इस खुशी का कारण उनका आन्तरिक सौन्दर्य ही है।
स्वस्थ देह, स्वस्थ मन से गुरु चिंतन, मनुष्य स्वतः आभास करता है, एक सुगन्ध एक आकर्षण प्रभाव का जो आपके जीवन को ही नहीं आपके सम्पूर्ण रूप को दूसरों को सम्मोहित करती है जिसको ‘कृष्ण नेत्र चुम्बकीय सम्मोहन दीक्षा’ कहते हैं।
उल्लेखित पांच पत्रिका सदस्य बनाने पर यह विशेष दीक्षा उपहार स्वरूप प्रदान की जायेगी।
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