





शुभाशीर्वाद
भक्त और साधकों के मन, शरीर, आत्मा में असंख्य शक्तियों का गूढ़ भंडार छिपा हुआ होता है। लेकिन वह अपने आपको साधारण प्राणी मानता हैं। वास्तविक कमजोरी यह है कि अभी हमें स्वयं अपने ऊपर विश्वास नहीं है। ईश्वरीय शक्तियाँ, विपुल ताकतों, मानसिक-शारीरिक-आत्मिक संपदाओं का जो अंश दिव्य शक्तियों के रूप में है, वही वास्तव में आप में भी मौजूद है। संकल्प की मजूबती, धैर्य और साहस से आदमी जीतता है। सफलता का मूल मनुष्य की इच्छाशक्ति में सन्निहित रहता है। मानवीय शक्तियों में उसकी इच्छाशक्ति सबसे प्रबल और प्रमुख होती है।
यह उत्सव यह लक्ष्मी शक्ति पर्व, एक ऐसा सम्पूर्ण महोत्सव, जहां एक साधक, एक शिष्य खो जाता है- भक्ति में, साधना में, परम आनन्द में, अपने गुरु के प्रेम में और उससे समाप्त हो जाती है उसकी अपनी दरिद्रता, अपने कष्ट, संताप, क्योंकि गुरु अपने किसी भी मानस पुत्र-पुत्रियों को दुखी संताप युक्त और हताष नहीं देखना चाहता।
हमारी इन सप्तपुरीयों में श्रेष्ठतम उज्जैन की पावन भूमि व क्षिप्रा नदी में चेतना शक्ति है जो हमारे पाप दोषों को धोती है। 24 अक्टूबर से 28 अक्टूबर तक पांच दिवसीय कुबेर वैभव लक्ष्मी महाकाल शक्ति साधना महोत्सव का आयोजन महाकालेश्वर मंदिर प्रांगण, उज्जैन (म-प्र-) में स्वामी सच्चिानन्द जी महाराज के दिव्य आशीर्वाद और सद्गुरुदेव के सानिध्य में सम्पन्न होगा। इन पांच दिवसों में आत्म शुद्धि, पूर्व जन्मकृत दोष, विलगित जीवन का शमन, तर्पण, पिण्ड दान, पूर्ण विजय श्री प्राप्ति चण्डी शक्ति हवन, शिव स्वरूप स्व अभिषेक, अपने आप को पूर्ण सम्बल और जीवन ज्ञान रूपी सद्गुरुदेव से दीक्षा, साधना, द्वारा जीवन को पूर्ण संचारी भाव से चेतना युक्त करने की क्रिया सम्पन्न हो सकेंगी।
उज्जैन की पावन भूमि इसलिए चेतना युक्त है क्योंकि समुद्र मंथन से निकले अमृत की बूंदों से यह धरती पावन बन पाई है, इसीलिए यहां महाकुंभ पर्व सम्पन्न होता है। इसी दिव्य भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण ने सांदीपन ऋषि से दीक्षा ग्रहण कर गुरु की चेतना के प्रभाव से ही योगेश्वर स्वरूपमय बन पाये। केरला प्रान्त का रहने वाला शंकराचार्य ने गुरु गोविन्दपादाचार्य जी से ज्ञान प्राप्त कर पुराणों,उपनिषदों की रचना के साथ चार मठों की स्थापना की, कालीदास ने इसी भूमि पर ज्ञान चेतना प्राप्त कर महान कवि और रचनाकार बने। सबके जीवन में एक परिवर्तनकारी समय आया करता है, किन्तु मनुष्य उसके आगमन से अनभिज्ञ रहा करता है। इसीलिए हर बुद्धिमान मनुष्य हर क्षण को बहुमूल्य समझकर व्यर्थ नहीं जाने देता। आलसी अथवा दीर्घसूत्री व्यक्ति बहुधा जिन्दगी खो देते हैं और वे कभी भी उपयुक्त अवसर का लाभ नहीं उठा पाते। मेरा कोई भी साधक शिष्य दुःखी है तो मैं आप से भी ज्यादा दुःख-कष्ट महसूस करता हूं, आप खुश रहे आप गुलाब की तरह खिलखिलाते रहे तभी मुझे प्रसन्नता होगी और आपके भौतिक, मानसिक, शारीरिक दोषों से युक्त जीवन से संबधित समस्याओं का समाधान कर आपको पूर्ण प्रकाशवान सुखी सफल शिव-गौरी की तरह गृहस्थी बना सकूं और आपका गृहस्थ जीवन रिद्धि-सिद्धि, शुभ-लाभ, विघ्नविनाशक गणपति और विजयश्री युक्त कार्तिकेय स्वरूप बन सके। आपके पास रह सकूं, साधनायें आपके जीवन में उतार सकूं, आपको ज्ञान प्रदान कर पाऊं ।
इसके विपरित यदि आप जब देवभूमि की ओर कदम ही नहीं बढ़ायेंगे, अपने गुरु का सानिध्य और सहयोग ही नहीं लेंगे तो अपने इन लक्ष्यों को कैसे प्राप्त करेंगे। ठिठक कर रह जाना, डर या भय से अपने आप को नपुंसक या कमजोर बना देना ही जीवन की न्यूनता है और ऐसी न्यूनता आप अनेक-अनेक रूपों में पिछले तीस चालीस वर्षों से भोग रहे है और उसके फलस्वरूप जीवन में अनेक-अनेक संताप और दुःख प्राप्त हो रहे है। यदि अब भी आप ठिठक कर रह गये तो जीवन में कोई चेतना, कोई परिर्वतन नहीं आने का है। देह आपकी है, जीवन आपका है विचार आपको ही करना है कि मैं कहां हूं? और कहां मुझे पहुंचना है, मुकाम किस तरह हासिल करना है वह मैंने आपको बता दिया है।
मुझे मेरे सद्गुरु का आशीर्वाद है कि मैं आज आप सभी के सामने आपको इस उत्सव में अपनी सेवा दे सकूं, आपको ज्ञान दे सकूं आपको अपने समीप रख सकूं आपको आनन्द का अनूभव करा सकूं। आपको पूर्ण बना सकूं, आपको साधना सिद्धि कर सभी सुखों की अनुभूति करा सकूंगा। आपके अन्दर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को समाहित कर सकूं, जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अपने अन्दर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को समा लिया और चौसठ कला पूर्ण योगेश्वरमय व्यक्तित्व से युक्त हुए। उसी प्रकार आपको सम्पूर्ण सृष्टि का सुख प्रदान कर सकूं। इन सभी स्थितियों के लिए पहला कदम आपको ही बढ़ाना होगा।
ऐसी दिव्यतम-तेजमय-अलौकिक तपोभूमि उज्जैन में कार्तिक लक्ष्मी मास में, विशिष्ट तरह की साधनायें और चिंतन को आत्मसात करने से साधक का जीवन योगमय शिव-शक्ति युक्त बनने की क्रिया की ओर अग्रसर हो सकेगा।
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