





प्रत्येक व्यक्ति की यही इच्छा रहती है कि उसके पास लक्ष्मी का स्थायी आवास हो और उसे किसी भी प्रकार से आर्थिक दृष्टि से पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो। लक्ष्मी का तात्पर्य केवल धन ही नहीं है, यह तो लक्ष्मी का एक अत्यन्त छोटा सा रूप है। लक्ष्मी के लिए एक गुण तो बहुत ही लघु पड़ जायेगा, महाकाव्यों में, आदि ग्रन्थों में लक्ष्मी के विभिन्न स्वरूपों का, विभिन्न नामों का जो वर्णन आया है, उसे पूर्ण रूप से प्राप्त करना ही सही रूप में लक्ष्मी को प्राप्त करना है।
लक्ष्मी का तात्पर्य है-सौभाग्य, समृद्धि, धन-दौलत, अच्छी किस्मत, सफलता, सम्पन्नता, प्रियता, लावण्य, आभा, कान्ति तथा राजकीय शक्ति-ये सब लक्ष्मी के स्वरूप हैं और इन्हीं गुणों के कारण भगवान विष्णु ने भी लक्ष्मी को अपनी पत्नी बनाया। जब इन सब गुणों का समावेश होता है और जो इनको प्राप्त कर लेता है, वही वास्तविक रूप से लक्ष्मीपति है।
मनुष्य क्या है- आदि पुरूष भगवान विष्णु का अंश, उनकी सृष्टि का एक लघु स्वरूप, फिर क्या कारण है कि उसके पास लक्ष्मी का एक छोटा सा भी स्वरूप नहीं है? यह सत्य है कि लक्ष्मी के ये स्वरूप यदि किसी व्यक्ति के पास हो जायें तो वह पूर्ण पुरूष हो जाता है, यह संभव है।
लक्ष्मी जीतने की वस्तु नहीं है, जिसे जुए में प्राप्त किया जा सके, लक्ष्मी तो मन्थन अर्थात प्रयत्न, अथक प्रयत्न, गहनतम साधनाओं का वह सुन्दर परिणाम है, जो साधक को उसकी साधनाओं के, उसके कार्यों के श्री फल के रूप में उसे प्राप्त होती है। उस लक्ष्मी को वह अपने पास स्थायी भाव से रख सकता है, आवश्यकता इस बात की है कि वह कुछ करे और इस कुछ को करने के लिए उसके पास उचित मार्ग होना चाहिए और यह उचित मार्ग उसे गुरु के निर्देश से प्राप्त हो सकता है।
केवल धन की प्राप्ति ही सब कुछ नहीं है, धन तो लक्ष्मी का एक अंश है। क्या धन से रूप, सौन्दर्य प्राप्त कर सकते हैं? क्या धन से कान्ति, आभा प्राप्त कर सकते हैं? क्या धन से सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं? जो व्यक्ति लक्ष्मी का अर्थ केवल धन, मुद्रा और पैसे ही लेते हैं, वो बहुत बड़ी गलती करते हैं। पूर्ण लक्ष्मी होने का तात्पर्य केवल पैसा ही नहीं है, अपितु सौभाग्य में भी वृद्धि हो, राजकीय सुख एवं शक्ति प्राप्त हो, वह जो कार्य करे, उसी के अनुरूप उसे यश प्राप्त हो। यह यश श्रेष्ठ दिशा में होना चाहिए। लक्ष्मी के सम्बन्ध में जितने ग्रन्थ लिखे गये हैं, उतने ग्रन्थ शायद ही किसी अन्य विषय पर लिखे गये हों। जब व्यक्ति लक्ष्मी को पूर्ण रूप से प्राप्त कर लेता है, तो वह पूर्णता की ओर अग्रसर हो सकता है, भौतिक सुख पूर्ण रूप से प्राप्त होने पर ही वह ज्ञान और वैराग्य के मार्ग पर बढ़ सकता है।
मेरा तो यह कहना है, कि यदि कंगाल, निर्धन व्यक्ति घर छोड़ कर साधना की ओर, हिमालय की ओर, सन्यास की ओर भागता है, तो उसका वैराग्य शुद्ध वैराग्य नहीं है। यह तो सत्य से भागना है, क्या आंखो के आगे हाथ रख देने से सूर्य छिप सकता है? सूर्य तो अपनी जगह स्थिर है, व्यक्ति अपनी आंखों के सामने पर्दा कर देता है। उसी प्रकार जो लक्ष्मी को तुच्छ कहते हैं, उसके संबंध में निन्दात्मक वाक्य लिखते हैं, वे व्यक्ति वास्तव में डरपोक, निर्बल और कायर हैं, जो जीवन में कुछ प्राप्त करने में असमर्थ होने पर इस जीवन के महत्व को ही नकारना चाहते हैं, लेकिन सत्य तो सूर्य की भांति है, जो छिप नहीं सकता।
जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है कि धन कमाना ही केवल लक्ष्मी की साधना नहीं है, यह तो आपकी आजीविका तथा जीवन चक्र को चलाने हेतु किये गये साधारण प्रयत्न हैं। जिस प्रकार यदि अग्नि के ऊपर राख का आवरण आ जाये और समय पर उसे चैतन्य नहीं किया जाये, तो धीरे-धीरे वह अग्नि ही बुझ जाती है और यदि फूंक मार कर राख हटा कर अग्नि को घी की आहुति दी जाये, तो वह एकदम से प्रबल होकर ज्वाला रूप में प्रज्ज्वलित हो जाती है।
लक्ष्मी का भी ऐसा ही विधान है, यदि साधना नहीं करेंगे, इसके लिए प्रयत्न नहीं करेंगे, इसकी चेतना तीव्र नहीं करेंगे, तो धीरे-धीरे यह बुझ जायेगी, शान्त हो जायेगी और जीवन में केवल राख बचेगी। वह दिवस तो लक्ष्मी दिवस है, इसके अतिरिक्त विशेष बात यह है, कि लक्ष्मी और शुक्ल पक्ष का ही महत्व है। जो साधक उचित समय पर अर्थात उचित मुहूर्त पर विधि-विधान सहित साधना करता है, तो उसे फल की प्राप्ति निश्चित रूप से होती है।
अक्षय तृतीया इसलिये कहा गया है कि इस दिन जो स्त्रियां सौभाग्य कामना हेतु पूजन करती है, उन्हें पूर्ण सौभाग्य प्राप्त होता है, जो व्यक्ति इस दिन लक्ष्मी साधना सम्पन्न करता है, उसे लक्ष्मी अक्षय रूप से प्राप्त होती है अर्थात लक्ष्मी का उसके यहां स्थायी रूप से आवास हो जाता है। गांवों में तो इस मुहूर्त की इतनी अधिक मान्यता है, कि इस दिन विवाह के लिए किसी पंडित को मुहुर्त दिखाने की आवश्यकता नहीं है। वैवाहिक जीवन यात्रा प्रारम्भ करने के लिए यह सौभाग्य दिवस है, अक्षय लक्ष्मी प्राप्त करने का पूर्ण दिवस है, शारीरिक सौन्दर्य, लावण्य, आभा प्राप्त करने का दिवस है, व्यक्तित्व में शक्ति प्राप्त करने का दिवस है।
शाक्त प्रमोद में लिखा है कि जो साधक अक्षय तृतीया के महत्त्व को जानते हुए भी पूजा साधना नहीं करता वह दुर्भाग्यशाली है।
‘वृहद रस सिद्धांत महाग्रन्थ’ में अक्षय तृतीया के संबंध में लिखा है कि यह दिवस जीवन रस की अक्षय खान है, उसमें से जितना प्राप्त कर सको, उतना ही यह रस बढ़ता जाता है।
गृहस्थ तो पत्नी को भी गृह लक्ष्मी कहता है, उसके लिए अक्षय तृतीया अनंग साधना का दिवस है। अक्षय तृतीया अंनग दिवस है, कामना दिवस है यह जीवन के उस भाग को पूर्णता प्रदान करता है, जो सृष्टि संचालन में सहायक है। इस दिन पूजा करने से कन्याओं को श्रेष्ठ वर की प्राप्ति होती है।
अक्षय तृतीया के पूजन में मंगल घट, ‘अक्षय धनदा लक्ष्मी विग्रह’, श्वेत पुष्प, शुद्ध घी का दीपक, ‘दो लक्ष्मी बाहु’, रक्त चन्दन तथा इसके साथ ‘अक्षय कमल ऐश्वर्य माला’ आवश्यक है।
साधक, सामग्री की पूर्व व्यवस्था कर साधना स्थल पर स्थान ग्रहण करें और पूर्ण प्रेम से, प्रसन्न मन से, देवी का पूजन क्रम प्रारम्भ करे।
अपने सामने बाजोट पर पीला सुन्दर रेशमी वस्त्र बिछाकर उसके बीचों बीच चावल की ढेरी बनाकर उस पर पुष्प रखें और फिर मंगल घट अर्थात कलश स्थापित कर दें। शुद्ध जल से आधे भरे इस कलश पर नारियल स्थापित करें, अब पूजा स्थान में घी का दीप जला दें। एक ओर सुगन्धित धूप जला दें, अब इस मंगल घट के सामने चावल की ढेरी बनाकर दोनों लक्ष्मी बाहु स्थापित करें। इन लक्ष्मी बाहु के आगे एक बड़ा विशिष्ट मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त अक्षय धनदा लक्ष्मी विग्रह स्थापित करें, प्रत्येक के ऊपर चन्दन तथा केसर का टीका लगायें एक-एक पुष्प रखें, मौली चढ़ाये, तथा मंगल घट के पास पूजा हेतु आवश्यक प्रसाद-नैवेद्य अर्पित करें। ये दोनों लक्ष्मी बाहु अक्षय ऋिद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ के विभिन्न स्वरूपों के रूप हैं और पूजा विधान में इनका विशेष महत्व है।
अब साधक को मूल पूजा प्रारम्भ करनी है, लेकिन उसके पहले एक विशेष बात आवश्यक है कि पहले कम से कम दस मिनट तक गुरु का ध्यान करें, मस्तिष्क में विचारों का प्रवाह चलता रहेगा, उसे चलने दें। अपनी आंखें बन्द रखें, और अपने संकल्प को दोहराए, न कि लक्ष्य को। धीरे-धीरे एक अपूर्व शान्ति पूरे शरीर एवं मन में छा जायेगी और यही समय है कि आप साधना प्रारम्भ करें। मन कहीं और दौड़ रहा है और साधक पूजन कर रहा है तो साधना में सफलता कैसे मिल सकती है?
अब आप दाएं हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि-‘हे अक्षय लक्ष्मी! अपनी ग्यारह शक्तियों सहित यहां स्थित हो कर मेरा पूजन सफल करें और अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करने हेतु आपकी शरण में यह साधक आपको अपना पूजन समर्पित कर रहा है’, ऐसा बोल कर जल छोड़ दें और पुष्प चढ़ाएं। अब मध्य में रखे हुए कलश में से नारियल हटा कर उसमें थोड़ा, दूध, दही, घी, शहद अथवा शक्कर और एक पुष्प डालें तथा नारियल पुनः स्थापित कर दें।
अब अक्षय लक्ष्मी के ग्यारह स्वरूपों का पूजन प्रारम्भ होता है। प्रत्येक लक्ष्मी बाहु के आगे बीज मंत्र का सम्पुट देते हुए उस पर पुष्प, चावल, कुंकुंम, चन्दन तथा सुपारी अर्पित करें। प्रत्येक बार अर्पण के समय नीचे दिये गये मंत्र का क्रमानुसार जप करें। इस प्रकार प्रत्येक अक्षय लक्ष्मी सिद्ध बाहु के आगे पांच बार मंत्र उच्चारण होगा, क्रम इस प्रकार से है-
।।ऊँ श्रीं अनुरागाय अक्षय लक्ष्मी बाणाय श्रीं नमः।।
।।ऊँ हृीं सर्वादाय अक्षय लक्ष्मी बाणाय हृीं नमः।।
।।ऊँ श्रीं विजयाय अक्षय लक्ष्मी बाणाय श्रीं नमः।।
।।ऊँ कमले वल्लभाय अक्षय लक्ष्मी बाणाय कमले नमः।।
।।ऊँ कमलाल्ये मदाय अक्षय लक्ष्मी बाणाय कमलाल्ये नमः।।
।।ऊँ प्रसीद हर्षाय अक्षय लक्ष्मी बाणाय प्रसीद नमः।।
।।ऊँ श्रीं तेजसे अक्षय लक्ष्मी बाणाय श्रीं नमः।।
।।ऊँ हृीं वीर्याय अक्षय लक्ष्मी बाणाय हृीं नमः।।
।।ऊँ श्रीं ऐश्वर्याय अक्षय लक्ष्मी बाणाय श्रीं नमः।।
।।ऊँ महालक्ष्म्यै शत्तफ़यै लक्ष्मी बाणाय महालक्ष्म्यै नमः।।
पूजन पूरा करने से अक्षय लक्ष्मी अपने सम्पूर्ण प्रभाव के साथ साधक को आशीर्वाद-अभय प्रदान करती है। साधक अपने दोनों हाथों में पुष्प ले कर लक्ष्मी विग्रह पर तथा अक्षय लक्ष्मी बाहु पर अर्पित करें और ग्यारह माला लक्ष्मी बीज मंत्र का जप करें-
अब एक थाली में स्वास्तिक कुंकुंम से बना कर उस पर दीपक अथवा आरती रख कर पूर्ण मनोयोग से लक्ष्मी की आरती सम्पन्न करें, तथा आरती के पश्चात मानसिक रूप से गुरु ध्यान कर गुरु आशीर्वाद प्राप्त कर अपना स्थान छोड़ें।
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