





भावना के वश में भगवान होते हैं और एक प्रसिद्ध श्लोक में लिखा है कि मंत्र, तीर्थ, इष्टदेव, वैद्य और गुरु में पूर्ण आस्था ही सिद्धिप्रद कही गई है। सम्पूर्ण हृदय को चैतन्य और जाग्रत, शंका और तर्क से रहित होकर सच्चे मन से की गई सेवा और आराधना द्वारा गुरु को पूर्ण रूप से प्राप्त किया जा सकता है। यह तो एक सम्मोहन क्रिया है, जिसके द्वारा गुरु शिष्य के वश में हो जाता है—- इस साधना में संवाद की आवश्यकता कहां है? गुरु की पेनी दृष्टि तो हर साधक पर, हर क्षण टिकी रहती है और गुरु शिष्य को परखते रहते हैं, उसे नीचे से आधार देकर कुम्हार की तरह ठोकते-पीटते रहते हैं और उसके पापों का क्षय करते रहते हैं और यही इच्छा रहती है कि शिष्य पूर्ण रूप से सिद्धत्व को प्राप्त हो, ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो, उसके चक्रों का भेदन होकर वह सहस्त्रार सिद्धि प्राप्त करे।
शिष्य द्वारा अपने भटकने की स्थिति में हर एक को गुरु बना लेना उचित नहीं है, आजकल तो बातचीत में मित्र और आपस में गुरु कहकर सम्बोधन करते हैं, क्या यह उचित हैं?
शास्त्रोक्त कथन है कि शिष्य को गुरु बनाने से पहले उसमें छः गुणो को अवश्य ही देखना चाहिए।
1- जो कुलीन उच्च वर्ण का सौम्य भाव एवं सरल जीवन से युक्त् हो।
2- जो शिष्य की समस्याओं को उसकी व्यवहारिक कठिनाइयों को समझता हो और उन कठिनाइयों को दूर करने का उपाय बताता हो।
3- जिसमें ज्ञान की गरिमा और गम्भीरता हो और अपने प्रवचनों के माध्यम से उस ज्ञान को शिष्यों को प्रदान करता रहे।
4- जो स्वस्थ उन्नत शरीर का स्वामी हो और गरिमायुक्त हो।
5- जिसमें समस्त प्रकार की साधनाओं का सार हो और किसी एक विषय में नहीं, अपितु सभी विषयों में पारंगत हो।
6- और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह कि जिसके पास बैठने से मन में अपूर्व शांति प्राप्त हो।
रूद्रायामल मंत्र के प्रथम खण्ड में लिखा है कि शिष्य के लिए संसार का आधार गुरु ही है, केवल मात्र गुरु की प्रसन्नता से ही साधक सिद्धाश्रम प्राप्त कर लेता है।
गुरु मूलं जगत् सर्व गुरु मूलं परं तपः।
गुरोः प्रयास मात्रेण मोक्षपाप्नोति सद्-वशी।।
मुण्डमाल तंत्र के पहले पटल पर कहा गया है कि एक मात्र गुरु ही शिष्य की भौतिक एवं आध्यात्मिक सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले परम तत्व हैं और गुरु की प्रसन्नता के बिना करोड़ों साधनाओं तथा पुरश्चरण का भी कोई फल प्राप्त नहीं होता।
जो साधक गुरु साधना के बिना, केवल पुस्तक के आधार पर साधनाएं और मंत्र जप करता है और उसे यदि गुरु कृपा का आधार प्राप्त नहीं है तो उसकी साधना व्यर्थ है। गुरु द्वारा दिये गये शब्द ही साधना का आधार है, इसलिए साधक को पूर्ण प्रयत्न कर गुरु की सामीप्यता अवश्य ही प्राप्त करनी चाहिए।,
गुरुदेव तो त्रिगुणात्मक स्वरूप है ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आद्या शक्ति रूप को स्वयं में समाहित किये हुए साधारण आम आदमी सा दिखने वाला व्यक्तित्व अत्यन्त विलक्षण लीलाधारी है, सेवा में रत सेवक, साधक एवं विशिष्ट शिष्यों को भी समय-समय पर भरमाया करते हैं, माया का पर्दा उनकी खुली आंखों पर भी डालते रहते हैं और यह सब करते हुए बिल्कुल अनजान, कभी-कभी पूर्ण अज्ञानी की भूमिका निभाते हुए शिष्य से भी निचले स्तर पर स्वयं को प्रतिष्ठित कर मुस्कराते रहते हैं, अन्दर ही अन्दर कैसे अद्भुत कैसी अद्भुत माया है गुरु की जो सहज ही जानी नहीं जा सकती—- चर्म चक्षुओं से गुरु जैसा दिखता है, वैसा है नहीं, अन्तर्चक्षु खुलने पर ही कभी-कभी उसका दिव्य रूप परिलक्षित होता है, साक्षात्कार होता है उसके ब्रह्म स्वरूप से मगर हर पल गुरु का प्रयास रहता है कि शिष्य उसे समझे नहीं, दिव्य झांकी पाने का, उसे पहचानने का। इस दौर में जिस दिन गुरु अपनी हार स्वीकार कर लेता है, शिष्य का सौभाग्य उदय होता है, उसके जीवन के पुण्यों का फल उसके समक्ष होता है, गुरु-शिष्य को सीने से लगा लेता है, वह सिद्धि कही जाती है, पूर्णता मिलते ही शिष्य-शिष्य नहीं रह जाता, गुरुत्व बन कर गुरु की ही आत्मा का पूर्ण चैतन्य अंश बन जाता है, शिव शिवा रूप में गुरु का वरद् हस्त शिष्य के भाल पर आशीर्वाद की वर्षा करता है और वह वरदानमयी बेला ही शिष्य का श्रृंगार है और जीवन की पूर्णता है। सांसारिक जीवन में तो नित्य नई बाधाएं आती ही हैं, क्योंकि साधक जब अपने गुरु की खोज में तल्लीन होता है तो उसके पाप कर्म कभी गृहस्थ रूप में कभी सामाजिक आलोचना के रूप में उसके सामने आकर खड़े होते हैं और उसे रोकते हैं, लेकिन जो व्यक्ति यह ठान लेता है कि मुझे अपने इस जीवन में अपने पूर्व जन्म के गुरु की खोज करनी है और उनके चरणों में बैठकर पूर्णता से समर्पण कर देना है, तभी वह पूर्ण शिष्य बन सकता है, अपने गुरु को प्राप्त कर सकता है।
जीवन में और केवल इस छोटे से 60 साल के जीवन में बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है। जीवन का लक्ष्य और प्रयोजन प्राप्त किया जा सकता है और यह स्थिति गुरु शिष्य को अपने समीप बैठा कर स्पष्ट करते हैं। इसलिए वह मार्ग दिखाते हैं, जिस पर चल कर स्वस्थ और आनन्द युक्त जीवन व्यतीत किया जा सके, उसके बाह्य और अन्तः दोनों शरीर को पवित्र कर आत्मा और ब्रह्म से साक्षात्कार कर सकता है। जिस उद्देश्य के लिए उसका जन्म हुआ है उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए क्या आवश्यक है और किस प्रकार वह अपने उत्तरदायित्वों को पूर्ण रूप से निभा सकता है, यह मार्ग केवल सद्गुरु ही बता सकते हैं।
गुरु से मंत्र का जन्म होता है और मंत्र से देवता उत्पन्न होते हैं, जो शिष्य गुरुमुख से महामंत्र प्राप्त करता है और जो बीज देवता से उत्पन्न होता है उसको पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है, देवता का शरीर बीज से उत्पन्न होता है और गुरु की आज्ञानुसार उसकी मुक्ति होती है, इस प्रकार गुरु भावना में तो पूर्णभाव सिद्धि होती है।
मन्त्रे वा गुरुदेवे वा न भेदं यस्तु कल्पते।
तस्य तुष्टा जगद्धात्री किन्न वद्याद् दिने दिने।।
गुरु के प्रसन्न होने पर ही परम प्रभु परमात्मा और देवी भगवती प्रसन्न होती हैं और गुरु के प्रसन्न न होने पर, उनकी कृपा न मिलने पर वे भी रूष्ट हो जाते हैं। इसलिए संसार सागर को पार करने में गुरु ही कर्त्ता, धर्ता और मोक्ष प्रदान करने वाले हैं।
गुरु कर्त्ता गुरु हर्ता गुरु माता मही तले।
गुरु स्तोष मात्रेण तुष्टाः स्युः सर्व देवताः।।
शास्त्रों में गुरु की महिमा को सर्वाधिक क्यों स्वीकार किया गया है? इसलिए कि हमने ईश्वर को देखा नहीं, हमने जगदम्बा, भवानी, शिव या विष्णु के दर्शन भी नहीं किये, हम उन्हें पूर्ण रूप से पहचानते भी नहीं हैं और इस बात का ज्ञान भी नहीं कि उनको प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए पर शिष्य और परम पिता परमात्मा अर्थात् सम्पूर्ण इष्ट के बीच एक कड़ी है जिसे गुरु कहा जाता है।
यह गुरु आपको भी पहचानता है और गुरु का परिचय इष्ट से भी है। इसलिए गुरु के माध्यम से ही इष्ट तक पहुंचा जा सकता है, उसके सम्पूर्ण स्वरूप के साक्षात् दर्शन किये जा सकते हैं। गुरु के बताये मार्ग पर चल कर ही हम अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं, केवल गुरु ही शिष्य को सही दिशा निर्देश दे सकते हैं, उसकी उंगली पकड़ कर सही रास्ते पर चला सकते हैं, इसीलिए शास्त्रों में गुरु के महत्व को एक स्वर में स्वीकार किया गया है।
‘गुरु’ शब्द कहने का अर्थ रूद्रयामल तंत्र में कहा गया है कि गकार सिद्धिदायक है और रू पाप का दाह करने वाला है, उकार को शुभ कहा गया है, इस प्रकार इन तीनों के समन्वित स्वरूप को ‘गुरु’ शब्द से सम्बोधित किया गया है।
कंकाल मालिनी तंत्र के पहले पटल में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि ‘गुरु’ शब्द के दोनों अक्षर क्रमशः निर्गुण और परब्रह्म हैं, एक प्रकार से कहा जाये तो यह गोपनीय महामंत्र है और संसार के सभी मंत्रों से श्रेष्ठ है। गुरु तंत्र में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जिसकी जीभ के अग्रभाग में गुरु शब्द रहता है, उसे जीवन में व्यर्थ का कोई मोह नहीं रहता, उसे वेद और शास्त्र पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं रहती, केवल मात्र ‘गुरु’ के उच्चारण से ही बड़े से बड़ा पाप नष्ट हो जाता है।
गकारः सिद्धिदः प्रोक्तको मोहः पापस्य दाहकः।
उकार शम्भुरित्युक्तस्त्रितयात्मा गुरुः स्मृताः।।
निर्गुणं च परं ब्रह्मं गुरुरित्यक्षर द्वयम्।
महामन्त्रं महादेवी गोपनीयं परात्परम्।।
गुरुरोच्चारण मात्रेण ब्रह्महत्या व्यपोहति।
रूकारोच्चारण मात्रेण मुच्यते जन्म पातकः।।
वस्तुतः गुरु की महत्ता और गुरु मंत्र जप को तंत्र ग्रंथों में सर्वाधिक महत्व दिया है।
जिस दिन शिष्य अपने आप को गुरु चरणों में समर्पित कर देता है, गुरु पूजन को आधार बना लेता है तथा गुरु साधना और गुरु मंत्र उसके रोम-रोम से बोलने लगते हैं, तब शिष्य एक नई सिद्धि के मार्ग पर चल पड़ता है और तब वह ‘निगुरा’ नहीं रहता। गुरु से युक्त हो जाता है, उसके जीवन में वास्तविक सौन्दर्य आ जाता है। मन के भ्रम एक के बाद एक दूर होने लगते हैं, भीतर ही भीतर एक नया प्रकाश उदय होने लगता है।
चिन्तन से प्राणों में एक स्थिति बन जाती है तो गुरु सिद्धि की स्थिति शिष्य को प्राप्त हो जाती है, प्रेम और भावातिरेक में शिष्य को हृदय से लगा सब कुछ न्यौछावर कर देता है, अपना चिन्तन, अपना ज्ञान, अपनी तपस्या, साधना सिद्धि सब कुछ प्रवाहित कर देता है। शिष्य के सिर पर हाथ फेर ब्रह्मरंध खोल देता है, दे देता है वह ब्रह्म सिद्धि, जिसे योगी, ऋषि-मुनि, देवी-देवता भी पाने को आतुर रहते हैं, ब्रह्म से साक्षात्कार की यही निष्काम सिद्धि, गुरु का आशीर्वाद और वरदान बन जाती है। शिष्य में, सेवक में, साधक में भोग और मोक्ष देकर पूर्णता देने वाली गुरु सिद्धि ही ब्रह्म सिद्धि कही गई है, शत्-शत् नम है गुरु की अहैतु की कृपा को।
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