





तांत्रिक ग्रन्थों में यह स्वीकार किया गया है कि कलियुग में प्रत्यांगिरा साधना तुरन्त प्रभाव युक्त है, कई बार तो साधक को साधना पूर्णता से पहले ही उसके मत के अनुकूल समाचार प्राप्त होने लगते हैं।
भगवती दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों में प्रत्यांगिरा का विशिष्ट महत्व है। ‘शक्ति मीमांसा’ महाग्रन्थ में स्पष्ट है, कि प्रत्येक साधक को अपने जीवन में इस विशिष्ट साधना को अवश्य सम्पन्न करना चाहिए। जिससे उसके जीवन में शत्रु बाधा, राजकीय बाधा, भय-व्याधि समाप्त हो सके और दूसरों को वशीभूत करने की शक्ति प्राप्त हो सके।
इस साधना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह ‘वशीकरण सिद्धि प्रदायक साधना है’। महा ग्रन्थों में इस साधना के संबंध में बहुत कम विवरण आया है। इस साधना के संबंध में साधक अपने मन में अपने शत्रुओं के निवारण संबंधी जो इच्छा धारण करता है साधना समाप्ति के कुछ समय बाद ही उसका कार्य सफल हो जाता है।
‘शक्ति मीमांसा’ ग्रन्थ में कहा गया है कि जो साधक प्रत्यांगिरा साधना सम्पन्न कर लेता है उसे जीवन में कभी शत्रु बाधा का सामना नहीं करना पड़ता। शत्रुओं की शक्ति उसके सामने निरन्तर कम होती रहती है तथा राजकीय बाधाओं का भी उसे सामना नहीं करना पड़ता है, वह व्यक्ति जिस कार्य को करने की सोच लेता है, उसका वह कार्य बिना किसी बाधा के सम्पन्न होता रहता है और व्यक्तित्व में भी एक विशिष्ट चमक आ जाती है। ग्रन्थों में यह विवेचन है कि इस साधना को पूर्ण एकाग्रता से निष्ठापूर्वक सम्पन्न करना चाहिए और साधना प्रारम्भ करने के पश्चात् उसे नियमित रूप से मंत्र जप अवश्य करना चाहिए।
मेरे अनुभव में यह आया है कि यदि साधक को किसी प्रकार की बाधा, परेशानी अथवा अड़चन हो, सरकारी कार्य रूके हों, या कार्य सिद्धि नहीं हो रहे हों, प्रयत्न करने पर भी हम जिस प्रकार से कार्य सम्पन्न करना चाहते हैं, उस प्रकार से सफल नहीं हो रहे हों तो यह साधना अपने आपमें अद्भुत सिद्धिदायक और तत्क्षण सफलतादायक है। वास्तव में ही जब-जब मेरे जीवन में अत्यन्त बाधाकारक समय आया तो मैंने प्रत्यांगिरा साधना का ही सहारा लिया और मुझे अत्यन्त अनुकूल परिणाम प्राप्त हुए। राज्य संकट, राज्य बाधा, शत्रुओं पर विजय और मनोवांछित कार्यसिद्धि के लिए यह साधना सर्वाधिक उपयुत्तफ़ है।
दुर्गा के इस विशिष्ट संहारक स्वरूप प्रत्यांगिरा साधना को किसी भी शुक्रवार और रविवार को सम्पन्न किया जा सकता है, पर यदि अष्टमी या नवरात्रि में यह साधना सम्पन्न की जाये तो सर्वाधिक उपयुक्त रहती है।
शास्त्रों के अनुसार साधना स्थल शुद्ध और पवित्र करने के लिए गंगा जल से धो लेना चाहिए, फिर साधना स्थल पर ही लकड़ी का बाजोट रखना चाहिए और उस पर लाल वस्त्र बिछा कर उसके मध्य में लाल चावलों की ढेरी पर एक दीपक लगाना चाहिए। यह दीपक इस प्रकार का हो जिसमें आठ बत्तियां हों जो कि अष्टदुर्गा का प्रतीक है, पूरा मंत्र जप इस दीपक पर ध्यान केन्द्रित करके करना है।
उस बाजोट पर बीच में दीपक स्थापित हो और बाजोट के चारों कोनों पर चार चावल की ढेरियां बना कर प्रत्येक ढेरी पर एक-एक सुपारी रखें, ये सभी महावीर हैं जो कि कार्यसिद्धि में पूर्ण सहायक होते हैं। दीपक के दाहिनी ओर गणेश और बाई ओर क्षेत्रपाल को सुपारी स्वरूप में स्थापित करना चाहिए और उनकी स्थापना भी चावलों की ढेरी बना कर उस पर सुपारी रख कर गणेश तथा क्षेत्रपाल की भावना रखते हुए स्थापना करनी चाहिए।
इसके बाद दीपक के सामने लकड़ी के बाजोट पर ही एक पात्र में ‘प्रत्यांगिरा महायंत्र’ की स्थापना करें, इसके अलावा जल पात्र, केसर, कुंकुंम, चावल, नारियल, पुष्प, फल, प्रसाद, सरसों तथा काले तिल पहले से ही ला कर रख देने चाहिए, दीपक में सरसों के तेल का प्रयोग करना चाहिए।
साधक स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुंह कर बैठ जाये और फिर सर्वप्रथम कुंकुंम तथा केसर को मिलाकर दीपक की पूजा करें।
ऊँ नमो भगवति प्रत्यंगिरा दीप ज्योति त्रिकोण संस्थे अखण्ड ज्योति, अखण्ड त्रिशत्कोटि देवता मालिनी-निर्मल, अर्ध-रात्रि, निगमस्तुते, ज्वाला मालिनि दीप ज्योति, सर्व कार्य सिद्धिं कुरू कुरू नमः।
उसके पश्चात् करन्यास तथा अंगन्यास करें
ऊँ ऐं श्रीं ह्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः
ऊँ ऐं श्री ह्रीं तर्जनीम्या नमः
ऊँ ऐं श्री ह्रीं मध्यमाभ्या नमः
ऊँ ऐं श्रीं ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः
ऊँ ऐं श्रीं ह्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः
ऊँ ऐं श्री ह्रीं करतल कर पृष्ठाभ्यां नमः
ऊँ ऐं श्रीं ह्रीं हृदयाय नमः
ऊँ ऐं श्रीं ह्रीं शिरसे नमः
ऊँ ऐं श्रीं ह्रीं शिखायै नमः
ऊँ ऐं श्रीं ह्रीं नेत्रत्रयाय वषट्
ऊँ ऐं श्रीं ह्रीं अस्त्राय फट्
इसके पश्चात् ‘प्रत्यांगिरा महायंत्र’ को कुंकुंम से भिगोकर पुष्प की 21 पंखुडि़या निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए समर्पित करें, जिससे कि यंत्र आपके लिए पूर्ण प्रभावशाली हो सके।
इसके पश्चात् साधक अपने गुरु के चित्र को स्थापित कर उसका संक्षिप्त पूजन करें और गुरु चरणों का ध्यान कर यह इच्छा प्रकट करें कि उसे प्रत्यंगिरा साधना में सिद्धि प्राप्त हो।
इसके बाद सामने जो दीपक रखा हुआ है, उस दीपक के सामने वाली ज्योति पर प्रत्यंगिरा देवी का ध्यान कर निम्नलिखित विशिष्ट मंत्र से पूजन करें। उस समय शरीर की सारी शक्तियां केन्द्रित कर पूर्ण ध्यान से यह मंत्र जप करना चाहिए, मंत्र जप के समय अपना ध्यान विचलित न करें।
।। ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्र: प्रत्यंगिरा नमः कृष्ण वाससे क्ष्मै
सहस्त्रलक्ष कोटि सिंवासने प्रिं सहस्त्रवदने महाबले
अष्टादशभुजे ह्र: अपराजिते ह्रैं परसैन्य कर्मविध्यसिंनी
हंसः पर-मंत्रोच्छेदनी सर्वशत्रुच्चाटिनी प्मैं सर्वभूतद्मनी
ठः ठः सर्वदेवान् बंध बंध हुं फट् सर्व विष्मानि छिन्धि
छिन्धि सर्वानर्थान् निंकृति निकृतीय सर्वदुष्टान् भक्ष भक्ष
प्रें ज्वाला जिह्ने ह्रौं करालवक्त्रे हंसः परयंत्राणि
स्फेट्य-स्फेट्य सर्वशृखलां त्रेटय त्रेटय असुरमुद्रां
द्रावय द्रावय उं रौद्रमूर्त्ति ह्रीं प्रत्यंगिरे महादेवि मम मंत्रर्थ
कुरू कुरू सर्वकार्य सिद्धिं नमोस्तुते ह्र: ह्रूं ह्रीं ऊँ नमः।।
कई बार सामान्य साधकों को इस विशेष ध्यान के उच्चारण के समय मेरूदण्ड में एक अजीब सी हलचल और सिरहन प्रारम्भ हो जाती है और मस्तिष्क में रक्त का प्रवाह तीव्र होता हुआ अनुभव होता है, यह स्थिति आने पर साधक को किसी भी प्रकार घबराना नहीं चाहिए और 21 बार इस विशेष ध्यान का जप करना चाहिए, जप की पूर्णता होते-होते ऐसा आभास होता है कि विशेष शक्ति प्रवाहित हो गई है।
यह अनुष्ठान और यंत्र सिद्ध हो जाने पर पूरे जीवन भर इसका प्रयोग स्वयं पर, अपने परिवार के सदस्यों आदि किसी के लिये भी किया जा सकता है।
इस विशिष्ट साधना को सिद्ध करने के पश्चात् यदि शत्रु बाधा अत्यन्त गंभीर हो तो थोड़ी सी अग्नि किसी पात्र में स्थापित कर पीली सरसों की आहुति इस विशिष्ठ कवच का जप करते हुए देनी चाहिए। अग्नि में सरसों की आहुति देते समय साधक को ‘शत्रु क्षय’ उच्चारण दूसरी ओर मुंह करके करना चाहिए, ऐसा करने से शत्रु का प्रभाव समाप्त हो जाता है। यदि किसी को भूत-प्रेत उपद्रव हो तो तांबे के पात्र में थोड़ा सा जल ले कर इस कवच का एक बार उच्चारण कर वह जल उस पर छिड़क दें, तो तुरन्त भूत-प्रेत उपद्रव से शान्ति मिल जाती है। यदि किसी को अपने अनुकूल बनाना हो तो उस व्यक्ति का ध्यान कर हाथ में जल लें, तथा इस मंत्र का ग्यारह बार जप करें। प्रत्येक मंत्र के जप के समय उस व्यक्ति का नाम लेकर प्रत्यंगिरा मंत्र जप करें, वशीकरण प्रयोग हेतु काले तिल की आहुति दें।
इस साधना की सिद्धि पूर्ण रूप से प्राप्त करने हेतु नियमित रूप से इसके मूल मंत्र का जप प्रत्यांगिरा माला से करना आवश्यक है। इस साधना हेतु जो माला प्रयोग में ली जाये वह माला किसी दूसरी साधना के संबंध में प्रयोग में नहीं ली जाती है।
उच्चकोटि के तांत्रिक ग्रन्थों में इस विशिष्ट कवच के सम्बन्ध में अत्यन्त प्रशंसा की गयी है। प्रतिदिन प्रातः प्रत्यंगिरा स्तोत्र का जप नियमित रूप से करने से मानसिक श्रेष्ठता प्राप्त होती है, व्यक्तित्व में विशिष्टता प्राप्त होने के साथ ही शत्रु भय नहीं रहता है और निरन्तर एक विशिष्ट शक्ति शरीर में प्रवाहित होती रहती है।
जयघ्रम्रभीमाकारा सहस्त्रवदनाश्रिमा।
जलपिंगल लोलाक्षी ज्वाला जिह्ना च नित्यशः।।
निष्ठुरान् बंधयेद्देवी तत्क्षणं नागपाशकैः।
भ्रकुटी, भीषणान् वत्स्यात् धत्ते पाद् प्रहारतः।।
वामेशी मर्दनो दंडो दक्षिणो वज्र भीषणो।
प्रेत शिर करोरूद्र ध्यानोदमर मारकं।।
अनंत तक्षकौ देव्या कंकणं च विराजतें।
वासुकि कंठहारश्च कर्काटि कटिमेखला।।
श्लिष्टो पप्र महापप्रौ पाघौ कृत नुपूरौ।
रूंडमाला करो भूषा गौणशै कर्णमंडले।।
गृहा भेत्रपटेघृत्वा जातान् दानव घातिनी।
स्वयं सैन्या भयदादेवी परसैन्य भयंकरी।।
नौ यक्षै रखिलनराक्षसगणै नो शाकिनी शंक्ये।
नो वा चेटक खेटकैर्नव महाभूतै प्रभूतैरपि।।
नापि व्यंतर मुद्गरे पलगणैर्नो मंत्रयंत्रै परै।
देवीत्वं चरणार्चितां परिभवः प्रत्यंगिरे शक्यते।।
यदि इस कवच का पाठ करते हुये जो साधक एक पुनश्चरण सम्पन्न कर लेता है (इस कवच का एक हजार पाठ करने से एक पुनश्चरण सम्पन्न होता है), तो प्रत्यंगिरा उसके वशीभूत होकर मनोवांछित फल प्रदान करती है।, पुनश्चरण सम्पन्न इस कवच को भोज पत्र पर लिख कर और उसे ताबीज में भर कर अपने गले या दाहिनी भुजा पर बांधने से मनोनुकूल फल प्राप्त होता है।
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