





अर्थ- कल्याण करने वाला। भगवान शिव की तरह अपने उपासकों का मंगल करने वाला कोई अन्य देव नहीं है, क्योंकि शिव का काम ही दूसरों का कल्याण करना है।
वह शिव स्वरूप हैं जहां बहती जीवन की रसधार है वहां जीवन का आनन्द है। इसलिये शिव को ‘रसेश्वर कल्प ’ कहा गया है।
श्री शिव अनादि हैं, निर्गुण स्वरूप होते हुए भी सभी गुणों से युक्त हैं, शिव का आदि, मध्य और अन्त नहीं होते हुए भी सृष्टि का लय करने वाले हैं तथा भक्तों के कष्ट निवारण के लिए प्रत्येक मन्वन्तर में इनका प्रादुर्भाव होता है। शिव परब्रह्म होते हुए भी ब्रह्म की त्रिविधा शक्तियों में (सृष्टि या स्थिति तथा प्रलय या उत्पत्ति और पालन या संहार में से) प्रलय कारक या संहार कारक जैसी महान् शक्ति विशेष के धारक हैं, किन्तु फिर भी उत्पत्ति व पालन करते हुए भक्तों के प्रतिपालक व परम दयालु भी हैं।
भगवान शिव के हजारों-करोड़ो नाम हैं। उनमें से भी अधिक प्रसिद्धि को जो नाम प्राप्त हुए हैं, वे हैं- भगवान आशुतोष, शिव, रूद्र, औघढ़दानी, महारूद्र, नीलकंठ, शितिकंठ, पुरूष, परमपुरूष, सुवर्चा, कपर्दी, कराल, कपाली, हवद, वरद, त्रयम्बकेश्वर, त्रिपुरारी, शंकर, क्षेम, ऋषिकेश, स्थाणु, हरिनेत्र, अव्यक्त, मुण्ड, कुद्ध, उत्तरण, सुतीर्थ, देवाधिदेव, बाहुशाली, दंड़ी, तप्तपा, अक्रूरकर्मा, सहस्त्रशिरा, सहस्त्रचरण, भुवनेश्वर, स्वधा, स्वरूप, बहुरूप, गिरीश, चीरवासा, यति, प्रशान्त, उमापति, गिरिजापति, कामदहनहर, पिनाकधारी, महादेव, महायोगी, अविनाशी, कर त्रिशूलधारी, वरदायक, दीप्तवर्ण, शुभानन, अमोघ, अनहा, प्रिय, चंद्रानन, धर्मात्मा, पवित्र, चन्द्रमौलि, चन्द्रशेखर, अभयदाता, दानी, चतुर्मुख, भास्कर, उष्णिषी, सुक्क्त्र, रहस, मीदवान, त्रयंम्बक, बिल्वदंडधर, सिद्ध, महान्, धन्वी, भव, वर, सोमवक्त्र, चक्षुष्य, हिरण्यबाहु, उग्र, लोलिहान, गोष्ठ, सिद्धमंत्र, वृष्णि, पशुपति, भूतपति, मातृभक्त, सेनानी आदि सहस्त्र लक्ष व कोटि नामों से भक्तजन भगवान शिव का स्मरण करते आये हैं।
शिव अतुलनीय और असाधारण देवता हैं महादेव का व्यक्तित्व असीमित है। शुद्ध चेतना का ही नाम शिव है तथा सर्वोच्चता सत्ता को ही शंकर कहा गया है। विशुद्ध प्रज्ञा का दूसरा नाम ही शिव है, जो एक होते हुए भी त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) हैं।
ईश्वर शिव ही नित्य स्थायी सत्ता व सर्वव्यापी हैं तथा शिव स्वयं शक्तिमयक हैं, अतः शिव शक्ति के द्वारा ही कार्य करते हैं, वहीं शक्ति शिव रूपी विशुद्ध चेतना जड़ तथा प्रकृति के बीच का एक माध्यम हैं, जिनको उमा, ईश्वरी, पार्वती आदि नामों से पुकारा जाता है। शक्ति महोदव की अनुरूप परिणति ही है, न कोई स्वतंत्र सत्ता। प्रकृति के सृष्टि कर्त्ता, विकास कर्त्ता व संहार कर्त्ता आदि सम्पूर्ण नियमों की कार्य प्रणाली उसी सत्ता के आधार पर अनुप्राणित है। अब मन शिव सत्ता से सत्तावान हो जाता है, तो प्रकृति के सम्पूर्ण नियम उसके सहयोगी बनकर कार्य करते हैं। भक्त का योग क्षेम स्वयं महादेव ही वहन करते हैं तथा उस जीवधारी का जीवन उस समष्टि प्रकृति से पोषित होता चला जाता है।
अन्य देवताओं की मूर्तियों की तो पूजा होती है, किन्तु शिवलिंग की पूजा का अधिक महत्व है। भगवान शिव ब्रह्माण्ड स्वरूप हैं, अतः दार्शनिकों की उक्ति में ‘यः पिण्डे स ब्रह्माण्डे’ सही चरितार्थ होती है। अतः साधन सीमित व ज्ञान-सीमित शक्तिधारी मानव ब्रह्माण्ड स्वरूप की तो पूजा अर्चना नहीं कर सकता, किन्तु लिंग स्वरूप पिण्ड की पूजा अर्चना एक ही दिन में अनेक बार भी करना चाहे, तो कर सकता है। शिवलिंग उनकी सृजनात्मक शक्ति का द्योतक है। यद्यपि शंकर निर्गुण व निराकार हैं, तथापि लिंग स्वरूप सृजन का स्त्रोत होते हुए भी सम्पूर्ण चराचर, चल व अचल पदार्थों के अंत और नाश का परिचायक भी है। लिंग रूपी आकाश की वेदी पृथ्वी ही, शिवलिंग में अव्यक्त, अदृश्य, सृजन शक्ति का भी अन्तर्भाव है तथा यही आध्यात्मिकता का भी स्वरूप है।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार भगवान शिव ने समुद्र मंथन से उत्पन्न महाविष का पान देव तथा दानवों की प्रार्थना से किया तथा विष से उन सभी की रक्षा की तब नीलकण्ठ कहलाये। आज भी उस विष का नीला निशान शिव की मूर्तियों व चित्रें पर दिखाई देता है। शिव की परोपकारिता, दीनदयालुता, औघढ़दानी स्वरूप आदि की जनश्रुतियां प्रसिद्ध हैं इसीलिए संसार में सर्वाधिक शिव मंदिरों की भरमार है एवं भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी शिव पूजे जाते हैं।
भक्ति करने से अन्य देवता इतने शीघ्र प्रसन्न नहीं होते, जितने शीघ्र भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं, इसीलिए उन्हें भोले-भंडारी कहा जाता है।
भगवान शिव की भगवान राम व कृष्ण ने भी पूजा की है तथा वरदान प्राप्त किये हैं अतः समय-समय पर प्रार्थनाओं से प्रसन्न होकर भगवान शिव मानव का ही नहीं देवताओं तथा दानवों का भी उपकार करते रहते हैं।
रूद्राभिषेक, सहस्त्राभिषेक, सहस्त्रघटाभिषेक का महत्व भगवान नीलकण्ठ को विषपान की तीव्रता कभी विचलित नहीं करें, इसीलिए शास्त्रों ने शिव के अभिषेक का महत्व बतलाया है। साधारण अभिषेक, नित्य जलधाराभिषेक, अहर्निषाभिषेक, सहस्त्रघटाभिषेक, दुग्धाभिषेक, घृताभिषेक, पंचामृत स्नान आदि विविध रूपों में अनेक प्रकारों से शिव का अभिषेक किया जाता है, जिससे आराधक के समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं। अतः शिव ही सत्य है, शिव ही सुन्दर है व शिव ही कल्याणकारी है।
श्रावण मास भगवान भोलेनाथ, शिव का मास है, जिसमें सही पूजा साधना करने से भगवान शंकर सारी इच्छाओं को पूर्ण कर देते हैं यदि जीवन में शिवत्व प्राप्त करना है, तो श्रावण मास से श्रेष्ठ कोई भी सिद्ध मुहूर्त नहीं है इस पुण्य मुहूर्त की प्रतीक्षा केवल साधु योगियों को ही नहीं हर साधक स्त्री-पुरूष सबको रहती है, इस मास का आनन्द कुछ और ही है? अलमस्त फुहारों से भरा यह मास मन और शरीर के भीतर एक विशेष उत्साह, आवेग, चेतना जगाता है।
शिव की तो महिमा ही निराली है, प्रसन्न हुए तो कुबेर को देवताओं का कोषाध्यक्ष बना दिया, रावण की नगरी को सोने की बना दिया, अश्विनी कुमारों को सारी आयुर्वेद विद्या सौंप दी, महामृत्युजंय स्वरूप होकर भीषण से भीषण रोग की समाप्ति होती है और शिव साधना से शिव कृपा ही प्राप्त होती है। जीवन में श्रेष्ठता शिवतत्व के माध्यम से ही प्राप्त हो सकती है, श्रावण मास में सम्पन्न किया जाने वाला हर प्रयोग सौभाग्यदायक ही रहता है।
माता पार्वती, शक्ति स्वरूप जगदम्बा है जो कि शिव का ही स्वरूप है, माता गौरी स्वयं अन्नपूर्णा, लक्ष्मी स्वरूप हैं शिव की पूजा साधना करने से लक्ष्मी साधना का ही फल प्राप्त होता है और सभी देवताओं में अग्र पूज्य गणपति तो साक्षात् शिव पुत्र है जो सभी प्रकार के विघ्नों, अड़चनों, बाधाओं को समाप्त करने वाले देव हैं। श्रावण मास की साधना से गणपति साधना का ही साक्षात् फल प्राप्त होता है और जिसने शिवत्व प्राप्त कर लिया, उसने जीवन में पूर्णत्व प्राप्त कर लिया, उसके लिए कठिन से कठिन कार्य भी सरल बन जाता है।
भगवान शिव की साधना गृहस्थ साधकों के लिए अत्यंत उपयोगी है, क्योंकि भगवान शिव समस्त बाधाओं का निराकरण करने में समर्थ हैं। पूर्णतः निर्लिप्त और निराकार होते हुए भी भगवान शिव पूर्ण गृहस्थ हैं, इसी कारण एक और जहां वे योगियों के इष्ट हैं, वहीं दूसरी ओर गृहस्थों के भी आराध्य देव हैं। भगवान शिव की आराधना प्रत्येक वर्ग करता है-‘गृहस्थ’ इस कामना के साथ, कि उसे पूर्ण रूप से गृहस्थ सुख प्राप्त हो सके, ‘स्त्रियां’ अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए, ‘कन्याएं’ श्रेष्ठ पति की प्राप्ति के लिए, वहीं दूसरी ओर ‘योगी’ शिवत्व प्राप्ति के लिए उनके ब्रह्मस्वरूप की आराधना करते हैं।
भगवान शिव सिर्फ एक रूप में ही नहीं, अपितु विभिन्न रूपों में साधक की मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं। वे एक ओर तो कुबेराधिपति है, वहीं महामृत्युजंय स्वरूप में विभिन्न रोगों के हर्त्ता हैं, औघड़दानी बन कर रंक को राजा बनाने की सामर्थ्य रखते हैं, दूसरी ओर स्वयं श्मशान में रहते हुए, भस्म लपेटे हुए उसी प्रकार से आनन्दित रहते हैं, जिस प्रकार वे कैलाश पर्वत पर भगवती पार्वती के साथ रहते है। इन्हीं भगवान शिव की आराधना कर योगी परमानन्द की प्राप्ति करते हैं।
भगवान शिव अपनी भक्तवत्सलता के कारण ही सभी के प्रिय देव हैं, तभी तो उन्हें देवाधिदेव महादेव कहा गया है। इसी कारण तो जहां प्रत्येक दैविक शक्ति के लिए वर्ष में एक या दो दिन का निर्धारण किया गया है, वहीं भगवान शिव की आराधना के लिए पूरा एक मास ही निर्धारित है। वह मास है – ‘श्रावण’ जिस माह में जिस किसी भी उद्देश्य से भगवान शिव की आराधना की जाय, वह निश्चित रूप से पूर्ण होती ही है।
नैमेत्तिक पूजा विधान के अनुसार श्रावण मास में साधक को शिव से सम्बन्धित विशेष साधनाएं अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए। जिस प्रकार रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, नवरात्रि का महत्व है। उसी प्रकार श्रावण मास का भी शिव साधनाओं में विशेष महत्व है। विशेषकर काम्य साधनाएं शिव से सम्बन्धित होती है और भगवान सदाशिव भोलेनाथ साधक की शीघ्र मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
श्रावण मास में सामान्यतः चार या पांच सोमवार आते हैं और इस मास के दौरान वर्षा ऋतु भी अपने पूर्ण प्रभाव में रहती है शास्त्रोक्त रूप से इन्द्र और वरूण प्रकृति पर जल के रूप में सिंचन करते हैं और इसी परम्परा में साधक शिवलिंग के रूप में शिव और पार्वती को संयुक्त रूप में दूध, जल एवं अन्य सामग्री द्वारा निरन्तर धारा अर्पण करते हुए अपने जीवन में रस प्राप्ति की प्रार्थना करता है। जीवन की सभी काम्य इच्छाएं अधूरी रहने का मूल कारण रस का अभाव है इसीलिए भगवान शिव को ‘रसो वै देव’ कहा गया है और पारद को रसराज कहा गया है। शुष्क जीवन में रस की अमृत धारा अर्थात् अभाव पीड़ाएं समाप्त करना, मनोकामनाएं पूर्ण करना, श्रेष्ठ गृहस्थ जीवन प्राप्त करना, जीवन में पूर्णत्व प्राप्ति करना, रोगों से मुक्ति प्राप्त करना ही है।
भगवान शिव की उपासना करना विश्व का सर्वाधिक प्राचीनतम कृत्य है और यदि शिव उपासना शाम्भवी विद्या द्वारा की जाय, तो वह अत्यन्त फलप्रदायक होती हैं। इसके महत्व का आभास एक बात से ही हो जाता है, कि यदि शाम्भवी विद्या किसी को ज्ञात है, तो उसके स्पर्श से प्राणी इक्कीस कुलों के साथ मुक्ति प्राप्त कर लेता है, साथ ही आने वाली संतानों को पूर्णरूपेण गणपति, कार्तिकेय, गौरी शक्ति से आपूरित करने में शाम्भवी चेतना पूरा सहयोग करती है। फिर जिस क्षेत्र में शाम्भवी विद्या का साधक रहता है, उस क्षेत्र के निवासी व उसके सेवकों की बात ही क्या है?
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