





जीवन में उसी व्यक्ति को सर्वोच्चता प्राप्त हो सकती है, जिसमें शक्ति होती है, शक्ति का तात्पर्य है, आत्मविश्वास जिसका साधनात्मक स्वरूप संकल्प के रूप में आता है। संकल्प का अर्थ है कि- अब में इस कार्य में प्राण, मन ओर समग्र शक्ति के साथ संलग्न हो रहा हूँ। इस प्रकार की विचार धारा के साथ दृढ़ता ही जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता की जननी है। वस्तुतः संकल्प तप का, क्रियाशक्ति का स्वरूप है। इसी में अनेक सिद्धियां ओर वरदान समाहित है। अपने आप को असमर्थ, अशक्त एवं असहाय मत समझिये। ‘ साधनों के अभाव में किस प्रकार आगे बढ़ सकेंगे?” ऐसे विचारों को छोड़ना आवश्यक हे। स्मरण रखिए, शक्ति का स्त्रोत साधनों में नहीं, संकल्प व आत्मविश्वास में निहित है। यदि जीवन में उच्चता व श्रेष्ठता प्राप्त करने की तीव्र इच्छा व ललक हो तो आपको जिन साधनों का आज अभाव दिखलाई पड़ता हे, दृढ़ संकल्प से अपूर्ण साधनों में भी मनुष्य अधिकतम विकास कर सर्वोच्चता पूर्ण आनन्द से युक्त जीवन व्यतीत कर सकता है।
व्यक्ति जीवन में हर समय दूसरों पर भरोसा करता है, सदा अन्य लोगों से अपेक्षा रखता हे पर स्वयं पर नहीं। ईश्वर द्वारा हमे जीवन के सभी श्रेष्ठ इच्छाओं, उच्चता व श्रेष्ठतम स्थिति को प्राप्त करने हेतु एक श्रेष्ठ कार्य करने हेतु यंत्र के रूप में यह मानव देह प्राप्त हुआ है। इसका हम सदुपयोग कर इसी जीवन में भौतिक व आध्यात्मिक क्षेत्रों में पूर्णता की स्थिति प्राप्त कर सकते है। जो इसी जीवन में संभव है क्योंकि इस जीवन के पहले हम किस योनि में थे इसका हमे ज्ञान नहीं और अगले जन्म में किस योनि या किस रूप में जन्म लेगें ये भी हमे नहीं पता। मनुष्य कितना ही विद्वान, गुणवान, शक्तिशाली हे परन्तु यदि स्वयं में विश्वास की कमी है तो वह विद्वान होकर भी मूर्ख है। शक्तिशाली होकर भी कायर सियार ही रहेगा।
आत्मविश्वासी मनुष्य अपनी शक्तियों को संगठित करके उन्हें एक दिशा में प्रवाहित करता हे जिससे वह सतत् क्रियाशील होकर पूर्णता को प्राप्त कर सके। शारीरिक व मानसिक शक्तियाँ मनुष्य के आत्मविश्वास पर कार्य करती है। कायर एक बार जीता है ओर बार-बार मरता हे, पर आत्मविश्वासी एक बार जन्म लेकर जीवन को पूर्णता से जीकर ही मरता है।
अपने आप में विश्वास करना व शक्तियों पर विश्वास करना एक ऐसा दिव्य गुण हे जो आपके हर कार्य को करने योग्य साहस, विचार एवं योग्यता प्रदान करता है। दूसरो पर निर्भर रहने से अपना बल घटता हे और इच्छाओं की पूर्ति में अनेक बाधायें उपस्थित होती रहती है। उदाहरण के लिये ध्यान के लिये- ध्यान में स्वयं के संकल्प के अभाव से बड़ी कोई बाधा नहीं है। यदि आप में ध्यान में जाने की संकल्प शक्ति है तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको ध्यान में जाने से नही रोक सकती। इसलिये यदि आपके जीवन के किसी भी मार्ग चाहे वह आपके भौतिक रूपी सांसारिक, पारिवारिक जीवन हो चाहे आपके व्यापार-व्यवसाय, चाहे साधना सिद्धि, परमात्मा दर्शन, इष्ट लाभ या आध्यात्मिक मार्ग में प्रवेश हो। यदि ऐसा नहीं होता है तो यही समझना कि मात्र आपमे संकल्प शक्ति में कमी है, न्यूनता हें।
दुनिया की कोई भी शक्ति आपको गर्त में डाल नहीं सकती और ना ही आपको उठा सकती है। इसलिये न कोई आपको सुख दे सकता है, ना कोई आपको दुख दे सकता है। यह तो केवल बस हमारे मन के एक भाव है। यथार्थ में देखा जाये तो सुख-दुख के बीज तो हम स्वयं बोते हे। यदि हम कुछ ऐसा कर्म करते है जिससे हमे दुःख प्राप्त होता है तो हम ही अपने शत्रु है, और यदि ऐसा कुछ कार्य करते है जिससे हमे आनन्द या सुख की प्राप्ति होती है, तो हम ही अपने सबसे बडे मित्र है। अर्थात् हम स्वयं ही अपने शत्रु व मित्र है। हाँ! यह बात निश्चित हैं कि हमारे कर्मो द्वारा बोये गये बीज का फल हमें कभी-कभी बहुत वक्तर के बाद ही मिलता हे जिसे हमें याद तक नही होता कि कभी यह हमारे कर्मों द्वारा बोये गये बीज का फल ही है जिसे आज हम सुख या दुख के रूप में भोग कर काट रहे है।
यह दुनिया का अटल सत्य हैं कि इस जगत में हम जो बीज बोते है उसी की ही फसल हम काटते है। हम वही प्राप्त करते है जो हम अपने को निर्मित करते है या जिसकी हम तैयारी करते हैं। हम वही पहुँच पाते है, जहां की हम यात्रा करते है। हम वहां कभी भी नही पहुँच सकते जहां कि हम यात्रा ही नही करते हो। हो सकता है कि यात्रा के समय हमने अपने मन में कुछ कल्पना की मंजिले बनाई हो, परन्तु उस मंजिलों को प्राप्त करने के लिए दृढ़ता और संकल्प का अभाव रहता है। तभी हमारी कल्पनायें साकार रूप नहीं ले पाती। वस्तुत: मंजिले मन से नहीं निरन्तर गतिमान रहने से तय की जाती है। हमारे जीवन में वर्तमान की स्थिति को देखकर ही हम ज्ञात कर सकते हैं कि हमने वास्तव में प्रेम, शांति, मधुरता रूपी गुलाब के बीज बोये थे या नीम रूपी कडवी बीज। आज प्राप्त होने वाला फल ही हमारे कर्मों के बीज का लेखा-जोखा है। यदि हम अपने वर्तमान जीवन को देखे तो मालूम होगा, कि हमने जीवन में सिवाय दुखों के और गर्त में गिरने के अलावा कुछ नहीं किया। इसी कारण हमारा प्रत्येक दिन दुःख से घना होता जाता है। रोज मन के संताप के कांटे फैलते चले जाते है किन्तु आंनद के फूल कही खिलते मालूम नही पड़ते।
यह बहुत हैरानी की बात हैं कि एक व्यक्ति द्वारा घृणा के बीज बोकर प्रेम रूपी फल प्राप्त करने की इच्छा होती हे। मनुष्य क्रोध के बीज बोकर शांति चाहता है। हमारे द्वारा चारों ओर शत्रुता फैलायी जाती है और मन की इच्छा रहती हें कि हमारे चारों ओर मित्रों का जमावड़ा हो। परन्तु व्यक्ति ऐसा जरूर चाहता हैं कि में गाली दूं और दूसरा मुझे आदर सम्मान दे। मैं दूसरो से घृणा करूँ और दूसरे मुझे प्रेम दे। में किसी पर विश्वास ना करूँ, और सभी मुझ पर भरोसा करें। अपने सुख प्राप्ति के लिए दूसरों का हित कर दू और मुझे दुःख न मिलें। पर ऐसा किसी भी स्थिति में संभव नहीं हो सकता। जीवन का सूत्र ही यही कहता हैं कि हम जो फेंकते है वही हमारे पास लोटकर वापस आता है। चारों ओर हमारी फेंकी हुई ध्वनियां ही प्रतिध्वनित होकर हमें प्राप्त होती है। हाँ, हो सकता है इसमें समय लगे कि ध्वनि टकराकर हमारे पास आने में। किन्तु जब तक हमारे पास लौटती है हमें ख्याल भी नही रहता। उसी प्रकार हमारे कर्मों का बीज है जो आज ना तो कल हमे प्राप्त होना ही है। अत: हमे प्रयास कर वर्तमान के कर्म को साधनामय, ज्ञानमय, गुरु भक्तिमय व सुसंगति रूपी गुलाब के बीज रूप में बोना आवश्यक हे जिससे आगे चलकर हमारे यही कर्म हमें पुन: आनंद व जीवन की पूर्णता के रूप में पुनः हमे प्राप्त हो।
और जीवन में जहां किसी भी क्षेत्र में चाहे वह साधना का क्षेत्र हो, चाहे भौतिकता का क्षेत्र हो पूर्ण उन्नति व उच्चता हेतु दृढ़ संकल्प शक्ति के साथ-साथ प्रेम का भाव भी जीवन में उतारना आवश्यक है। और जहां प्रेम होता है वहां संदेह की कोई संभावना नहीं रह जाती। संदेह की मौजूदगी के साथ ही प्रेम का भाव तिरोहित हो जाता है। क्योंकि संदेह के साथ सदा भय होता है, और जहां भय, डर होता है वहां प्रेम रह ही नहीं सकता। हाँ संदेह ओर भय साथ-साथ रह सकते हैं क्योंकि ये दोनों संगी साथी है। किन्तु प्रेम के साथ सदा अभय निडरता ही रहती है। और फिर अभय के साथ संदेह की कोई संभावना ही नही रह जाती। क्योंकि जब आप भयभीत ही नही हो तो संदेह केसा?
जीवन में वास्तविक प्रेम केवल गुरु के साथ ही हो सकता है क्योंकि गुरु ही आपका सच्चा हितैषी होता है। वह आपसे अपेक्षा रखे बिना ही आपसे केवल प्रेम करता है आपको जीवन में आगे गतिशील करना चाहता है। और गुरु के साथ प्रेम करने पर वहां मन में किसी प्रकार का भय, डर या सवाल नही रहता। जहां किसी प्रकार का सवाल होता है तो निश्चय ही उसका उत्तर जानने की आपको जिज्ञासा रहेगी। उसी प्रकार मन में किसी प्रकार का भय है तो वह कभी न कभी संदेह के रूप में आपके सामने आयेगा। क्योंकि भय का नाम ही संदेह है और अभय का नाम ही आस्था हे। इसलिये भय और प्रेम का कोई संबन्ध ही नही रहता। जिससे हम प्रेम करते है उस पर हम कभी संदेह नही कर सकते चाहे वह हमसे जेसा भी व्यवहार करे। और जिस पर हमें संदेह होता है उससे हम कभी प्रेम नही कर सकते। संदेह की आग प्रेम को जला डालती है तथा भय का भूत प्रेम को तिरोहित कर देता है। संदेह करने वाला स्वयं दुखी होता है और दूसरो को भी दुखी करता है इसलिये तो कहा जाता है संदेह आत्मघाती होता है। अत: प्रयास कर अपने जीवन से इस संदेह रूपी विषमता को निकालने का प्रयास करिये जिससे आपके जीवन में प्रेम रूपी पौधो का पूर्ण रूप से विकास हो सके।
अत: आप आज से ही अपनी हेयता, दीनता व हीन भावनाओं का परित्याग कर नवीन सिरे से जीवन निर्माण की क्रिया प्रारंभ करिये। नित्य कर्तव्य पथ पर अग्रसर रह कर, जो प्रतिकूलताओं और प्रतिरोधो से बहादुरी के साथ टक्कर लेता है अंत मे विजय श्री उसी को ही प्राप्त होती है। जीवन में कठिनाई, उलझनें, अप्रिय परिस्थितियां आती रहती है ओर इन्ही झंझावतो में कठोर चट्टान की तरह अपनी राह में अडिग रहने के लिए आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है। साथ ही साथ जीवन की आकांक्षाओ व इच्छाओं को प्राप्त करने के लिए अपनी योग्यता में वृद्धि करना प्रारंभ कर दीजिए, जेसा होना चाहते है उसी के अनुरूप अपनी योग्यता बनाने में प्रवृत्त हो जायें तो विधाता को विवश होकर आपकी मन-मरजी का भाग्य लिखना पडेगा। इसी कारण ईश्वर ने मनुष्यों के जीवन सहायक के रूप में गुरुका आवाहन किया, जिसके सांनिध्य व निर्देशन में हम इस मानव जीवन का श्रेष्ठ उपयोग कर धर्म, अर्थ,काम और पूर्णता रूपी चिन्तनशील स्थितियों को प्राप्त कर व उसी विराट रूप में समाहित हो सके। जीवन के सभी क्षेत्रो में सफल होने के लिए गुरु के आशीर्वाद व निर्देशन के साथ-साथ स्वयं पर आत्मविश्वास व संकल्प की भी आवश्यकता होती है। गुरु तो आपको एक चेतना, व श्रेष्ठता का भाव देगा किन्तु उस भाव को क्रिया के रूप में परिवर्तन करना स्वयं साधक या शिष्य का कार्य व धर्म हे।
हर सांसारिक प्राणी की धारणा होती हैं कि सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु और माता गौरी स्वरूप महालक्ष्मी का ध्यान, चिन्तन निरन्तर करें जिससे कि उसके भी गृहस्थ जीवन में वह भी अपने आपको विष्णुमय लक्ष्मी स्वरूप बना सके। जिससे कि वह जीवन की सभी कामनाओं को धन के माध्यम से पूर्णतः प्राप्त कर सकें। और यह सब क्रिया अपने इष्ट या गुरू के सानिध्य में हो तो किसी तरह की अपूर्णता रह ही नहीं सकती। ओर ऐसा ही महायोग सदगुरूदेव की जन्मभूमि खरटियाँ मठ में स्वर्ण गौरी महालक्ष्मी साधना शिविर का आयोजन 22-23 अक्टूबर को दीपावली महोत्सव के फलस्वरूप प्राप्त हुआ है। इन दो दिवसीय पूर्ण चेतनामय लक्ष्मी दिवसों मे जीवन की जीर्ण शीर्ण रोग युक्त रूपी मलीनता को समाप्त करने के लिए अपने आपको मृत्युंजय युक्त बनाने हेतु महामृत्युंजय रूद्राभिषेक सम्पन्न होगा।
साथ ही शुम्भ-निशुम्भ रक्तबीज स्वरूप अनेकानेक अवरोध पैदा करने वाले शत्रुओं के शमन तथा जीवन के अनेक पाप-दोषों से मुक्ति हेतु नवग्रह शान्ति यज्ञ भी प्रत्येक साधक-साधिका द्वारा उसी दिव्य भूमि पर सम्पन्न कराया जायेगा। जहाँ कि भूमि पर सद्गुरूदेव ने अवतरण लेकर अपने आपको सृष्टि में सूर्य के समान साधकों को जीवन का प्रकाश ओर तेजस्विता प्रदान करने का ज्ञान और चिन्तन दिया और इसी के फलस्वरूप हमारा भी जीवन सूर्य के समान देदीप्यमान ओर तेजस्वी युक्त बन सके। ऐसे श्रेष्म्य अवसर का आप पूरा-पूरा लाभ उठाएं जिससे कि जीवन आपका कान्ति और चेतना युक्त बन सके। जीवन की सभी अभिलाषायें पूर्ण हो सके, ऐसा ही आशीर्वाद दे रहा हूं।
सदगुरूदेव की जन्म भूमि देव भूमि आगमन पर आपका स्वागत है।
Wish You a Very Happy Diwali
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,