





तीव्र तंत्र की साधना साधक को उस स्थिति में करना चाहिये जब उसके प्राणों पर संकट आ पड़े, जब उसकी इज्जत मान-मर्यादा धूमिल होने की स्थिति में आ जाये, उसकी सम्पत्ति पर शत्रुओं द्वारा कब्जा कर लिया गया हो अथवा मैली क्रियाओं से जीवन दूषित हो गया हो। ऐसी विकट परिस्थिति में शास्त्र के अनुसार साधक को तीव्र तंत्र अनुष्ठान सम्पन्न करना चाहिये। कालरात्रि तंत्र साधना शत्रु बाधा निवारण के साथ-साथ स्तम्भन, उच्चाटन, विद्वेषण तथा मारण का भी श्रेष्ठतम साधना है। यह महाविद्या महाराज्ञी विश्व मोहिनी विद्या कहलाती है, क्योंकि इसकी मूल शक्ति कालिका है और इसके शक्ति चक्र आवरण में सम्मोहिनी और विमोहनी शक्तियां निवास करती हैं। साथ ही भगवती कात्यायनी की शक्ति से युक्त होने से देह शक्ति, ज्ञान शक्ति, क्रिया शक्ति की चेतना की प्राप्ति होती है। द्वापर युग में गोपियों ने कृष्ण को प्रिय रूप में पाने के लिये भगवती कात्यायनी की साधना सम्पन्न की थी।
यह साधना अपने आप में अचूक है। ये शक्तियां संहार व सम्मोहन दोनों की अधिष्ठात्री देवी हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश इन्हीं के प्रभाव से योग निद्रा में रहते हुये आराधना व तपस्या में लीन रहते हैं। जब शत्रु बाधा, तंत्र बाधा, प्रेतादिक बाधा या किसी भी प्रकार की घोर विपत्ति में यदि बगला, प्रत्यंगिरा, कृत्या आदि की साधना शिथिल पड़ जाये, उस परिस्थिति में भी यह साधना पूर्ण विजय दिलाने में समर्थ है। जब विष्णु 5000 वर्षों तक युद्ध करने पर भी मधु-कैटभ को नहीं मार सके तो भगवती कालरात्रि ने मधु-कैटभ को सम्मोहित कर उनकी बुद्धि का मर्दन किया फिर उन राक्षसों का संहार हो पाया। यह साधना तीव्र सम्मोहन शक्ति से शत्रु को शिथिल व निष्प्राण कर देती है। इसके द्वारा ब्रह्माण्ड के किसी भी जीव-जन्तु, मानव, प्रकृति को अपने अनुकूल बना इच्छित कार्य सम्पन्न करवा सकते हैं और वर्तमान युग में आधुनिक बने रहने की भाग दौड़ और प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर लेने की आकांक्षा के लिये यह आवश्यक है कि आपके सम्पर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति आप से प्रभावित हो।
आपकी आंखों में, आपके चेहरे पर और आपके व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण हों कि सामने वाला व्यक्ति चाहे वह पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री, अधिकारी, पार्टनर, प्रेमी-प्रेमिका या नौकर कोई भी हो, आपकी बात न सिर्फ मान ले, अपितु आपकी आज्ञा को पूरा करने के लिये आतुर हो और यह तभी संभव हो सकता है जब आप पूर्ण सम्मोहक व्यक्तित्व के स्वामी हों। भगवती कालरात्रि के ध्यान में विवरण है कि विकराल नेत्रें वाली कालरात्रि के नासिका के श्वास प्रश्वास से असंख्य अग्नि ज्वालायें प्रकट होती हैं। जिसके प्रभाव से भक्तों के लिये उज्जवल मार्ग प्रशस्त होने के साथ जीवन के अंधकार का शमन होता है। साधक के जन्म-जन्म के पाप-ताप दोष इसी अग्नि में भस्मीभूत हो जाते हैं। इतना ही नहीं ये आद्या शक्तियां साधक के जीवन में आने वाले किसी भी प्राकृतिक आपदा, दुर्घटना, दुर्योग से जीवन की पूर्ण रक्षा करती हैं।
इस साधना में अष्टगन्ध का प्रयोग अनिवार्य है, इसके अतिरिक्त यंत्र पूजन में सिन्दूर एवं हिगुंल का ही प्रयोग किया जाता है और पीपल के पत्ते पर किसी भी वृक्ष की पतली टहनी की कलम बनाकर इसका बीज मंत्र लिखना चाहिये। इस साधना को मध्यरात्रि में कमरे का द्वार बन्द करके सम्पन्न करना चाहिये और जब तक साधना पूर्ण ना हो जाये तब तक द्वार ना खोलें।
सम्मोहन युक्त कालशक्ति महायन्त्र का निर्माण भी विशिष्ट समय में ही सम्पन्न किया जाता है, ताम्रपत्र पर अंकित इस यंत्र को जब शनिवार और अमावस्या का संयोग होता है तब दक्ष पंडितों द्वारा प्रदत्त मंत्रों से रूद्र, विष्णु एवं ब्रह्मा मन्त्रों से आपूरण और इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति, क्रिया शक्ति से चैतन्य मंत्रों से वामावर्त क्रम में षडंग अनुष्ठान सम्पन्न किया जाता है, इस प्रकार सिद्ध यंत्र का प्रयोग ही साधना में किया जाना चाहिये, इसके अतिरिक्त इस साधना में प्रत्येक दिशा में तीन देवियों का पूजन कात्यायनी शक्तिबीज गुटिका से किया जाता है।
मोहरात्रि के दिन अर्द्धरात्रि के पश्चात् साधक लाल वस्त्र पहनकर अपने पूजा स्थान में बैठ जाये। पूजा स्थान में सबसे पहले लकड़ी के बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर उसके सामने बाईं और एक तांबे के पात्र में भैरव की स्थापना करे, जिससे अनुष्ठान में विघ्न उपस्थित न हो, अब एक दूसरे तांबे के पात्र में एक पुष्प रखे और उस पर महायंत्र स्थापित करें तथा निम्न विनियोग हाथ में जल लेकर करें-
विनियोग
अस्य कालरात्रि मन्त्रस्य दक्ष ऋषिः अति
जगती छन्दः अलर्क निवासिनी कालरात्रि र्देवता क्रीं
बीजं महाशक्ति ममाभीष्ट सिद्धये जपे विनियोगः।
ऋष्यादिन्यास
ऊँ दक्षऋषये नमः शिरसि, जगतीच्छंदसे
नमो मुखे, अलर्कनिवासिनीकालरात्रि देवतायै नमो
हृदि, क्रीं बीजाय नमो लिंगे। मायाराज्ञीतिशक्तये नमः
पादयोः विनियोगाय नमः सर्वांगे।
कर न्यास
ऊँ अंगुष्ठाभ्यां नमः ऐं तर्जनीभ्यां नमः
ह्रीं मध्यामाभ्यां नमः क्लीं अनामिकाभ्यां नमः
श्रीं कनिष्ठिाकाभ्यां नमः
ध्यान
ऊँ उद्यन्मार्तंड कांतिं विगलितकबरीं
कृष्णवस्त्र वृतांगीं दंडं लिंगं कराब्जैर्वरमथ भुवनं
संधधानां त्रिनेत्रम् नाना कल्पैर्विभासं स्मितमुख
कमलां सेवितां देवसंघैर्मायायाराज्ञीं मनोभूशर
विकलतनूमाश्रये कालरात्रिम।।
अब साधक कलम को सिन्दूर में डूबो कर भोज पत्र अथवा पीपल के बारह पत्तों पर ‘क्रीं’ बीज मंत्र लिखें, विनियोग के साथ ही साधक को वीर मुद्रा में बैठें व थोड़ा सा चावल सिन्दूर से रंग कर हाथों में लें, अपना संकल्प बोलें फिर चावलों को अपने पीछे फेकें।
साधक कालरात्रि महाविद्या की महाशक्तियों का पूजन उनके मंत्रों से करें, चारों दिशा में मंत्र के साथ एक पीपल का पत्ता जिस पर ‘क्रीं’ मंत्र लिखा हो उस पर सरसों की ढे़री बना कर (दिशा के अनुसार) मंत्र बोलते हुये कालरात्रि शक्तिबीज गुटिका स्थापित करें।
पूर्व दिशा में-
ऊँ मायायै नमः
ऊँ कालरात्रयै नमः
ऊँ वटवासिन्यै नमः।
दक्षिण दिशा में-
ऊँ गणेश्वर्यै नमः
ऊँ कान्हायै नमः
ऊँ व्यापिकायै नमः।
पश्चिम दिशा में-
ऊँ अलर्कवासिन्यै नमः
ऊँ मायाराज्ञै नमः
ऊँ मदनप्रियायै नमः।
उत्तर दिशा में-
ऊँ रत्यै नमः
ऊँ लक्ष्म्यै नमः
ऊँ कान्हेश्वर्यै नमः।
अब महायंत्र का पूजन धूप, दीप, नैवेद्य, सिन्दूर
एवं हिंगुल आदि से सम्पन्न करे।
अब साधक भगवती का ध्यान करते हुये मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये प्रार्थना करें। फिर एक दीपक और जलाकर उसे अपने सामने स्थापित करे, इसके बाद कालरात्रि महामंत्र का उच्चारण स्पष्ट शब्दों में वीर मुद्रा में बैठ कर सम्पन्न करें-
इस प्रकार पूजन करने से प्रबल से प्रबल शत्रु परास्त हो जाता है, किसी भी प्रकार का चाहे किसी भी विद्या से किया हुआ तांत्रिक प्रयोग निष्फल हो जाता है और करने वाला घोर पीड़ा से पीडि़त होता है। जीवन के महासंकट भी इस साधना से शान्त हो जाते हैं। शास्त्रें के अनुसार साधक को कम से कम 1100 सौ मंत्र जप तीन दिन में करना चाहिये।
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