





प्रतिज्ञा और ज्ञान की भी एक सीमा अवश्य होती है, व्यक्ति अपने प्रयत्नों से किसी भी कार्य को श्रेष्ठतम रूप से पूर्ण करते हुये उज्ज्वल पक्ष की ओर बढ़ने का विचार करता है, लेकिन उसकी बुद्धि एक सीमा से आगे नहीं दौड़ पाती। बाधायें उसकी बुद्धि एवं कार्य के विकास को रोक देती है और यही मूल कारण है कि हमारे शास्त्रों में पूजा, साधना उपासना को विशेष महत्व दिया गया।
इस हेतु ईश्वर मनुष्य को कई अवसर प्रदान करता है। ये अवसर मनुष्य जीवन में तंत्र-मंत्र-यंत्र का उपयोग करने के लिये विभिन्न ‘काल समय’ में आते हैं, जिन्हें हम नवरात्रि, रामनवमी, हनुमान जयंती, नृसिंह जयंती, गुरू पूर्णिमा, महाशिवरात्रि, श्रावण पर्व, रक्षा बंधन, अनन्त चतुर्दशी, वराह जयंती, दीपावली, श्राद्ध पर्व, कालाष्टमी, वंसत पंचमी इत्यादि कहते हैं। समय चक्र में इन विशेष क्षणों को व्रत, पर्व और त्यौहार के रूप में परिवर्तित कर दिया, जबकि इनके पीछे मूल उद्देश्य मनुष्य को अपनी गलतियां सुधार कर आने वाले समय के लिये तैयार करना था, उसमें नवीन शक्ति, चेतना भरना था। भाद्रपद के विशिष्ट योग में निर्मित वराहवतार और गणेश चतुर्थी का अवसर इन्हीं उद्देश्यों के पूर्ति का दिवस है, और शक्ति के इसी भाव को ग्रहण कर जीवन को नवीन ऊर्जा शक्ति से भरना है।
साधकों की जानकारी हेतु वराहवतार और भगवान गणपति के स्वरूप की जानकारी अवश्य देना चाहूंगा, जिससे वे यह जान सकें कि इनके स्वरूप के मूल तत्व में कितनी तीव्र शक्ति निहित है।
पौराणिक गाथाओं के अनुसार भगवान विष्णु के दो द्वारपाल जय-विजय ने एक बार भगवान विष्णु की आज्ञा के पालन के क्रम में ब्रह्मा के चार मानस पुत्र सनकादि को भीतर प्रवेश करने से वर्जित कर दिया, जिससे वे क्रोध युक्त हो उन दोनों को राक्षस योनि में चले जाने का श्राप दिया। वास्तविकता का ज्ञान होने पर भगवान विष्णु ने अपने द्वारापालों की प्रार्थना पर उन्हें यह वरदान दिया, कि ऋषियों की वाणी मिथ्या तो हो नहीं सकती इसलिये राक्षस योनि में तो जाओगे ही परन्तु शीघ्र ही राक्षस योनि से मुक्ति पाने के लिये तुम्हारा वध स्वयं मेरे हाथों से होने के कारण तुम मुक्त होकर परमपद की प्राप्ति कर सकोगे।
कालांतर में ये दोनों द्वारपाल ही क्रमशः हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकश्यप के रूप में आए, जिनके अत्याचारों से सारी धरा ही नहीं देवलोक आदि तक त्रहि-त्रहि करने लगें। जिन्हें समाप्त करने के लिये भगवान विष्णु ने दो बार अवतार लिये। हिरण्याक्ष को समाप्त करने के लिये शूकर अवतार तथा हिरण्यकश्यप के लिये नृसिंह अवतार इसी कारणवश संभव हुए।
श्वेत वाराह कल्प के समय परम पराक्रमी दितिपुत्र हिरण्याक्ष अपने अहंकार के कारण पृथ्वी को पाताल लोक में स्थापित करने के लिये रसातल में लेकर चला गया, जिससे पृथ्वी पर रहने वाले जनमानस के जीवन पर संकट आ गया और सम्पूर्ण पृथ्वी के अस्तित्व का भी भय उत्पन्न हुआ। इससे चिन्तित होकर पितामह ब्रह्मा जी ने भगवान श्री हरि का मन ही मन स्मरण किया। स्मरण करते ही भगवान उनके नासाछिद्र से वराह शिशु के रूप में अवतरित हुये और देखते ही देखते उन्होंने विशाल पर्वताकार श्वेत वराह का रूप धारण कर समुद्र के जल में प्रवेश किया और रसातल से पृथ्वी को लाने लगे। यह देखकर हिरण्याक्ष क्रोध से भर गया और उनसे युद्ध करने लगा, कुछ ही क्षणों में उन वराह रूपधारी श्री हरि ने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को पुनः प्रतिष्ठित कर जन-मानव का कल्याण किया।
वराह स्वरूप प्रतीक है ईश्वर की उस महान्शक्ति का जो किसी भी रूप में प्रकट हो सकती है, उसके लिये कोई विशेष आकार की आवश्यकता नहीं है। समय-अनुरूप जैसी आवश्यकता है, उस रूप में शक्ति प्रकट हो सकती है। वराहवतार का तात्पर्य ही यही है कि जीवन के अकल्याणकारी शक्तियों को समाप्त कर कल्याणकारी मार्ग पर स्थापित किया जाये। जिससे जीवन का उद्देश्य पूरा हो सकें
गणेश हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में माने जाते हैं। हर कार्य में ऋद्धि-सिद्धि सफलता प्रदान करने एंव विघ्नों का नाश करना उनकी विशेषता है। वह बुद्धि के विशेष प्रतिनिधि हैं। महादेव के पुत्र होने के कारण उनका महत्व और बढ़ गया है। कोई कार्य आरम्भ करने से पूर्व उनकी पूजा की जाती है। गणेश का सिर हाथी का है। जो बुद्धिमत्ता का प्रतीक है उनके सिर पर सुशोभित होता चन्द्रमा शांति का प्रतीक है, विशाल नेत्र विशालता का स्वरूप है, बड़े-बड़े कान श्रवण शक्ति के प्रतीक हैं।
लम्बी नाक सम्मान एवं प्रतिष्ठा का प्रतीक है। गणेश का स्वरूप शक्ति और शिवत्व का साकार स्वरूप है, और इन दोनों तत्वों का सुखद स्वरूप ही किसी कार्य में पूर्णता ला सकता है। गणेश का शाब्दिक अर्थ है- गणों का स्वामी। मानव शरीर पांच कर्मेन्द्रियों, पांच ज्ञानेन्द्रियों और चार अन्तः करण द्वारा संचालित होता है, और इनके संचालित होने के पीछे जो शक्ति है, वह विभिन्न चौदह देवताओं की शक्ति है, जिनके मूल प्रेरणा स्रोत है-भगवान गणपति।
श्री गणेश आदि स्वरूप, पूर्ण कल्याणकारी, देवताओं के भी देवता माने गये हैं, जिनकी उपासना-पूजा का उल्लेख वेदों में भी प्राप्त होता है। गणेश को विघ्न विनाशक कहा जाता है। मनुष्य जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिये जिन गुणों की आवश्यकता होती है, उन्हें गणेश के रहस्यमय आकार के माध्यम से चित्रित किया गया है।
वराहवतार विघ्न विनाशक, सिद्ध लक्ष्मी प्रदायक देवताओं में अगण्य पूज्य हैं। गणपति, वराहवतार और कामेश्वरी लक्ष्मी का संयुक्त पूजन, आराधना व साधना करने से शीघ्र ही सिद्धियां व सफलता प्राप्त होती हैं। क्योंकि दोनों देव शक्तियां सभी विघ्न, बाधाओं को समाप्त करने में अग्रणी देव हैं और जीवन की सभी भोग-विलास, धन-सम्पदा, ऐश्वर्य भगवती लक्ष्मी के द्वारा ही प्राप्त होता है।
जीवन में बाधाओं को हटाने के लिये जिस शक्ति की आवश्यकता होती है। वे शक्तियां भगवान गणपति और श्री हरि स्वरूप वराहवतार के संयुक्त होने से प्रचंड ज्वाला शक्ति के समान है जिसके सामने संसार की प्रत्येक असुरी शक्ति पराजित होती है। इस साधना को सम्पन्न कर साधक विघ्न विनाशक शक्तियों से युक्त होता ही है साथ में ही भगवान वराह हरि अवतार होने से महालक्ष्मी की कृपा दृष्टि का भी पात्र होता है। वहीं भगवान गणपति के साथ ऋद्धि-सिद्धि, शुभ-लाभ का आगमन भी निश्चिंत रूप से होता है। जिससे कार्य सफलता सुनिश्चित होती है। और जैसे-तैसे पूरा न होकर जिस सफलता के साथ कार्य पूरा करने की इच्छा है उसी रूप में कार्य पूर्ण होता है।
साधक ऐसे ही गुणों को अपने अन्तः करण में स्थापित कर अपने जीवन में विघ्न विनाशक और कामेश्वरी लक्ष्मी शक्ति के रहस्यों को आत्मसात कर अपने व्यावहारिक जीवन में ऋद्धि-सिद्धि एवं शुभ-लाभ के दाता सिद्ध होते हैं।
16-9-2015 को या किसी भी गुरूवार को अर्द्ध रात्रि को स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहन कर ऊनी आसन पर पीला रेशमी वस्त्र बिछा कर पश्चिम दिशा की ओर मुंह कर साधक अपने पूजा स्थान में बैठें अपने सामने एक लकड़ी के बाजोट पर पीला वस्त्र बिछा कर उस पर चावल की ढेरी बना कर ताम्र कलश स्थापित करें, कलश में जल डालें तथा इसके साथ ही पुष्प तथा दूब डालें, तत्पश्चात अपने सामने पांच बत्तियों का दीपक जलायें। दीपक में शुद्ध घी का ही प्रयोग करें।
अब साधक चन्दन तथा अबीर गुलाल से कलश का पूजन कर दूसरे ताम्र पात्र में श्री कामेश्वरी महालक्ष्मी यंत्र, वराह गुटिका व विश्वकर्मा माला स्थापित कर चन्दन, गुलाल तथा सिन्दूर से पूजन करें तथा गजानन स्वरूप सुपारी का पंचोपचार पूजन कर भगवान गणपति का ध्यान करें।
ध्यान
ध्याये हृदब्जे शोणांगं वामोत्संग विभूषया।
सिद्धलक्ष्म्या समाश्लिष्ट पार्श्वमर्धेन्दु शेखरम्।।
वामाघं: करतो दक्षाघः करान्तेषु पुष्करे।
परिष्कृतं मातु लुंगं गदा पुण्ड्रेक्ष कार्मुकैः।।
शूलेन शंखचक्राभ्यां पाशोत्पल युगेन च।
शालि मंजरिका स्वीय दन्तान्जल मणि घटै।।
स्रवन्मदंच सानन्दं श्री श्रीपत्यादि सम्बृतम्।
अशेष विघ्न विध्वंस निघ्नं विघ्नेश्वरं भजे।।
अब साधक कामेश्वरी महालक्ष्मी को प्रसाद अर्पित करते हुये प्रार्थना मंत्र का 21 बार उच्चारण करें।
पश्चात् निम्न मंत्र का जप 7 दिन तक 11 माला जप करें। प्रतिदिन साधना समापन के पश्चात् गुरू प्रार्थना अवश्य करें।
यह एक सिद्ध साधना है और यदि साधक की भावना हो प्रबल तो शीघ्र प्रभाव देखने को मिलता है। साधना समाप्ति के पश्चात् सभी सामग्री को विसर्जित कर दें।
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