





भारतवर्ष के संस्कृति का परिचय प्राचीन ऋषियों के जीवन में निहित है। इनके जीवन को समझकर ही भारतीय संस्कृति से परिचित हुआ जा सकता है। ऋषिगण आर्यावर्त के जनक है और इनके ही सहयोग से सृष्टि का संचालन होता है। भारतीय शास्त्र ऐसे ऋषियों के गुणगान से भरे पड़े हैं। जिन्होंने समय-समय पर अपने ज्ञान और तप शक्ति से मानव के साथ धरती पर अवतरित देवों का भी मार्गदर्शन किया।
ऋषिगण इस धरती पर देवता स्वरूप हैं। उनके लिये यह समग्र संसार तृण-तुल्य है। सोना तथा पत्थर-मिट्टी उनके लिये एक समान है। सुख और दुख में वे कोई अन्तर नहीं समझते। ऋषि प्रभुमय होते हैं। वे साक्षात्कार प्राप्त होते हैं। न केवल वे ईश्वर को जानते हैं अपितु वे स्वयं ही ईश्वर रूप होते हैं। सदैव प्रभु-चर्चा में ही मग्न रहते हैं। वे दूसरों को ईश्वर की ओर प्रेरित करते हैं (प्रभु पथ की ओर ले जाने का कार्य करते हैं)। ऋषि इस जगत में प्रभु के कार्यकर्ता हैं। ऋषि में ईश्वर अपनी शोभा, अनन्त शक्ति, ज्ञान और आनन्द दर्शाते हैं।
प्रभु रूपी मंदिर की ओर जाने वाले राही के लिये ऋषिगण सीढ़ी का कार्य करते हैं। संत तथा ऋषिगण जहां अल्पावधि के लिये भी रूक जाते हैं। वहीं वाराणसी, प्रयाग तथा वृन्दावन जैसे तीर्थ बन जाते हैं। ऋषि इस पृथ्वी पर वरदान रूप होते हैं। वे धर्म के जीवन्त प्रतीक तथा मानवता के सच्चे हितैषी हैं। इतिहास में विश्व के आध्यात्मिक मूल्यों को सुरक्षित रखने वाले ऋषि ही हैं। ऋषि ‘आध्यात्मिक-धोबी’ का रूप है। वे भक्ति तथा ज्ञान के साबुन से संसारी जनों के पाप धोते हैं। उनकी उपस्थिति में मानव पावन हो जाता है।
हृदय में जब ऋषि स्मृति होती है तब कुवासनायें तथा कामुकता के भाव झड़ जाते हैं। उनके ज्ञान, चिंतन, भाव को ग्रहण करने से जीवन का सही निर्माण हो पाता है। ऋषियों की जीवन गाथा के चिंतन से, उनकी सिन्नधि से, उनके शुभाशीर्वाद से मानव दिव्य चेतना, प्रेरणा और पवित्रता से सराबोर होता है।
ऋषि में न अहंता होती है न ही मेरापन। वे काम-क्रोध तथा लोभ से मुक्त होते हैं। सभी प्राणियों को आत्मभाव से प्रेम करते हैं। वे वैराग्य तथा दया से सम्पन्न होते हैं। सर्वदा सत्यभाषी होते हैं और सबकी सेवा करते हैं। सदैव ईश्वर ध्यान में रत रहते हैं। वे समदृष्टि होते है। प्रत्येक नारी में देवी या मातृरूप के दर्शन करते हैं। वे शांत तथा प्रसन्न रहते हैं। उनके पास दिव्य ज्ञान होता है। वे निर्भय और उदार होते हैं। वे मांगते कभी नहीं, सदैव देते ही रहते हैं। वे ऐश्वर्य सम्पन्न और वैभवशाली होते हैं। ऐसे सच्चे ऋषि तो कोई विरले ही होते हैं।
ऋषि प्रेम मूर्ति स्वरूप होते हैं। दया तो उनके स्वभाव में कूट-कूट कर भरी रहती है। उनके हृदय से करूणा स्फुटित होती रहती है। दूसरों की त्रुटियों की ओर तो उनका ध्यान जाता ही नहीं। वे बुराई के बदले भलाई ही करते हैं।
ऋषि हृदय प्रेम की ज्वाला है। वे पीडि़त मानव के उद्धार के लिये लालायित रहते हैं। अपने सुख सुविधा को भूल सदैव दूसरों के लिये ही जीवित रहते हैं। समग्र सृष्टि में अपने ही रूप के दर्शन करते है। वे अनेकता में एकता के दर्शन करते हैं। समस्त जगत के साथ उनका तादात्म्य होता है। युवाओं में युवा, वृद्धों में वृद्ध, शूरवीरो में शूरवीर, बालकों के मध्य बालक रूप में रहते हैं। वे दुखी जनों के दुःख को अपना ही दुःख समझते हैं।
संत का जीवन सीधा-सादा, सरल तथा आकर्षक होता है, सम्मोहन, वाक्चातुर्यता, दिव्यभाषी होते हैं। जिसमें ईश्वर अनुग्रह के दर्शन होता है, वे सदैव हंसमुख और प्रसन्नचित्त रहते हैं। उन्हें जीवन में कोई भी अप्रियता दृष्टिगत नहीं होती। उनके लिये जीवन आनंदपूर्ण है। दुःख का तो उन्हें अनुभव होता ही नहीं। वे सदा निडर रहते हैं। कोई चक्रवर्ती सम्राट भी उन पर अपना अधिकार नहीं कर पाता।
एक संत का जीवन शांत और अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर गतिशील रहता है। संसार की परिवर्तन शीलता से अप्रभावित रहते हैं। कोई भी बाह्य घटना उन्हें असंतुलित नहीं कर पाती। वे दिव्य दृष्टा होते हैं।
ऋषि अपनी सभी इच्छाओं को पूर्ण करने में सक्षम होते हैं हालांकि वे इच्छा रहित होते हैं। अतः वे सदैव परम उल्लास में रहते हैं। एक राजा के पास सभी कुछ है, इसीलिये वह प्रसन्न है। परंतु संत की प्रसन्नता अनंत इसलिये है कि वे सदैव आत्मस्थित है। ब्रह्मानंद-सागर में लीन रहते हैं। जब कि सम्राट तो सदैव भय तथा चिंताओं से घिरा होता है। उसे यही डर लगा रहता है कि शत्रु उसे पराजित कर देगा इसीलिये वह अशांत तथा दुखी रहता है।
वस्तुतः ऋषि ही सच्चा धनवान है। इच्छाओं से ग्रस्त लखपति भिखारी है। ऋषि तो चक्रवर्ती राजा और देवराज इंद्र से भी बढ़कर धनवान और वैभवशाली होते हैं। परंतु वे अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन नहीं करते। सांसारिक स्वप्न से ऋषि जागृत हो चुके होते हैं। वे नित्यानंद में लीन हैं। एक ज्ञान प्राप्त ऋषि के समक्ष समग्र संसार नतमस्तक रहता है।
समाज में रहते हुये भी ऋषि की पहचान कठिन है। सभी इन्हें एक साधारण मनुष्य ही समझते हैं। पर वे समाज में गृहस्थ जीवन जीते हुये अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। ऋषि सांसारिक मानव से कहीं अधिक वैभवशाली, ऐश्वर्यवान होते हैं। ऋषि का तात्पर्य है उस भाव को ग्रहण करना जिससे जीवन सुलभ हो सके, ना कि जटा-जूटी बढ़ाकर जंगल भाग जाना, वे उन सभी चीजों को प्राप्त करते हैं जो मानव जीवन की आवश्यकता है, उन्हें प्राप्त कर भी कभी विचलित नही होते, वे सभी प्रकार के भोग-विलास करते हुये भी एक दृष्टा के भाव से जीवन को व्यतीत करते हैं।
कभी तो वे सर्वज्ञ प्रतीत होते हैं कभी अज्ञानी। क्योंकि वे जानते हैं कि कब उन्हें ब्रह्मनिष्ठ और कब मूर्ख सा व्यवहार करना है। इस व्यवहार पर ही आप अपना निर्णय नहीं दे सकते। यदि आप श्रद्धा, भक्ति और जिज्ञासा-भाव से उनके पास जायेंगे तो वे आपको परम ज्ञान प्रदान करेंगे। अगर आपका भाव उचित नहीं तो वे पागल से दिखेंगे।
ज्ञान तो सभी ऋषि में समान रहता है किंतु व्यवहार में अतंर रहता है। वशिष्ठ कर्म-कांडी थे। वे हवन तथा यज्ञादि किया करते थे। राजा जनक निरासक्त भोगी थे, वे अपने राज्य के प्रशासक थे, और समस्त प्रकार का भोग किया था उन्होंने, वे राजकीय भोगों को भोगते थे। श्री दत्तात्रेय परिव्राजक और अवधूत थे। कई ऋषि वैवाहिक जीवन व्यतीत करते थे और समस्त प्रकार के भोगों को भोगते हुये जीवन को पूर्णता प्रदान की। उनके जीवन में कभी कोई न्यूनता रही ही नहीं।
उन्होंने जब जो चाहा अपने जीवन में किया। राजा जनक और श्री शंकराचार्य जी जैसी परोपकारी महान आत्मायें जगत में एकात्मकता लाने में रत रहती थी। वे एक दयालु ऋषि की भांति पुस्तके लिखते, पाठशालायें चलाते, आश्रम स्थापित करते। ऋषित्व रूपी जीवन का निर्माण तो तभी संभव है जब साधक के हृदय में भक्ति रूपी वृक्ष का रोपण होता है। तब उसे मायारूपी बकरी से हानि होने का भय तो होता है, परंतु पौधे की रक्षा के लिये उसके चारों ओर साधना और दीक्षा का घेरा लगाकर गुरू अपनी तपस्यांश जल से सींचकर उसके चारों ओर श्रेष्ठ भाव-चिंतन की शाखा-प्रशाखाओं का विकास करता है और वह आकाश की ओर एकाकार होने के लिये बढ़ने लगता है।
सरल ऋषि हृदय रूपी पात्र में सुशोभित इस विशाल भक्ति वृक्ष की छाया पाकर त्रिविध तापों से तपे साधक सन्ताप रहित होकर परमानन्द प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार क्रिया करने पर काम-क्रोध, मोह-माया में जीते हुये भी साधक हाथी की भांति मद-मस्त होकर गतिशील रहता है और वह जीवन के महासंग्राम में विजयी होता है। काम, क्रोध, लोभ, माया आदि उस वृक्ष को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचा पाते।
यदि भौतिक सम्पूर्णता के साथ ही साथ आध्यात्मिक पूर्णता भी उपलब्ध हो जाये, तो फिर व्यक्ति निश्चय ही पूर्ण मानव कहलाने योग्य हो पाता है। इससे पहले तो वह एक पशु है, जो विभिन्न बंधनों एवं मजबूरियों में बंधा हुआ अपना जीवन ढो रहा है। यह साधना पूर्ण ऋषित्व प्राप्ति की साधना है, क्योंकि ऋषि का अर्थ ही उस व्यक्तित्व से है, जिसने समस्त प्रकार के अनुभवों को अपने अंदर पचाया हो, सब प्रकार से रहता हुआ (योगी एवं भोगी) अपने जीवन को गतिशील किया हो।
ऋषि पंचमी या किसी भी गुरूवार को ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर सफेद आसन पर पूर्वाभिमुख होकर बैठें। सफेद धोती व सफेद कपड़ा कंधे पर डालें। फिर अपने सामने सफेद आसन पर सप्तर्षि सिद्धाश्रम चैतन्य यंत्र, ऋषि गुटिका व रूद्राक्ष माला को स्थापित कर पूजन करें। फिर महागुरू (भगवान शिव) का आवाहन कर ऋषि तुल्य जीवन प्राप्ति के लिये प्रार्थना करें। उक्त मंत्र का 5 माला मंत्र जप करें।
यह एक दिवसीय साधना है। साधना के बाद गुटिका को 21 दिन तक धारण करें व नित्य निम्न मंत्र का 10 मिनट जप करें। पश्चात् सभी सामग्री को सफेद कपड़े में लपेट कर जल में विसर्जित कर दें।
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