





इस देश में साबर साधनायें कब प्रारंभ हुई, ऐतिहासिक दृष्टिकोण से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। पुराण और इतिहास का कुछ ऐसा सामंजस्य भारतवर्ष में दिखलाई देता है, कि सब कुछ श्रद्धा और विश्वास का विषय बन जाता है। वैदिक मंत्रों में जो जटिलता होती है, विधि-निषेध होते हैं, जाति-वर्ण, शुद्धि आदि का विचार होता है, वह सब साबर साधनाओं एवं मंत्रों में नहीं होता और यदि हम साबर मंत्रों का विश्लेषण करें, तो भाषा से वैज्ञानिक दृष्टि से वे मंत्र बड़े ही विचित्र प्रतीत होंगे, किन्तु साधकों का कहना है, कि वे विचित्र मंत्र बड़े ही चमत्कारिक ढंग से सिद्धि प्रदान करते हैं। त्वरित गति से वे मंत्र संसार में अपना ऐसा प्रभाव उत्पन्न करते हैं, कि वैज्ञानिक भी चकित रह जाते हैं।
साबर साधनाओं में गुरू की बड़ी आवश्यकता होती है, बिना गुरू के निर्देशन के यह साधना करना अनुकूल नहीं माना गया। वस्तुः सत्य तो यह है कि साबर साधनाओं में अधिकांशतः चौकी विधान किया जाता है, उसमें परा-शक्ति साक्षात् विराजमान होती हैं, साबर तांत्रिक मंत्र जो भगवान शिव के श्रीमुख से उद्घोषित और भगवती आद्या शक्ति की चेतना से आपूरित है। जिन साबर साधनाओं में भगवती का आवाहन कर चौकी स्थापन की क्रिया सम्पन्न होती है। वहां भगवती वात्सल्य रूप धारण कर सूक्ष्म रूप से उपस्थित होकर पूर्ण फलदायी लाभ प्रदान करती हैं। साबर मंत्र समस्त मंत्रों में सर्वश्रेष्ठ, अचूक प्रभावयुक्त और महत्वपूर्ण माने गये हैं, क्योंकि इन मंत्रों के द्वारा जल्दी सफलता और सिद्धि प्राप्त होती है, इन साधनाओं का निशाना अचूक होता है। जो साधक अपने जीवन में कुछ कर गुजरने की क्षमता रखते हैं, जो दृढ़ और हिम्मतवान व्यक्तित्व लिये हुये होते हैं, वे ही इन साधनाओं में गुरू की आज्ञा से सफलता प्राप्त कर पाते हैं।
हर बार की तरह इस बार भी आपके सामने आश्विन नवरात्रि पूर्ण चैतन्यता के साथ उपस्थिति हो रही है। इस पर्व पर मां दुर्गा अपने पूर्ण वात्सल्य स्वरूप को धारण कर जगत में विद्यमान होती हैं। और प्रदान करती हैं अपने पुत्रों को वह सब कुछ, जो उनकी इच्छा होती है, जो उनकी मनोकामना होती है।नवरात्र के इस पावन पर्व पर, जब सम्पूर्ण वायुमण्डल आपूरित होता है शक्ति तत्व से, ऐसे अवसर पर यदि स्वयं महादेव के श्रीमुख से उच्चरित साबर मंत्रों की साधना की जाये तो साधक का सफलता प्राप्त करना सुनिश्चित होता है क्योंकि शक्ति और शिव का अद्भुत संयोग होना ही सफलता का सूचक है। विषमतायें, परेशानियां, दुर्गती तो इन साधनाओं को सम्पन्न करने के पश्चात् टिक ही नहीं सकते। इन साधना सामग्री को सावन पूर्णिमा के दिन अमृत काल के चैतन्य मुहूर्त में प्राण प्रतिष्ठित करने से इनमें शिव और गुरूतत्व का पूर्णता से समावेश हो गया है। इसकी तीव्रता तो साधना सम्पन्न करने के बाद ही साधक अनुभव कर पायेंगे। भगवान शिव व आद्या शक्ति मां जगदम्बा के ही सम्मिलित रूप की विशिष्ट साधनायें जो सीधे जीवन के उन पक्षों को स्पर्श करती हैं, जिन पक्षों में अभाव या न्यूनता से जीवन नीरस हो गया हो।
जीवन में सभी सुख होते हुये भी यदि आत्मशक्ति की न्यूनता, दुर्बलता हो तो किसी भी सुख का उपभोग नही हो सकता। धन के साथ ही साथ आवश्यक है कि पुरूष ‘पौरूषता’ से भरा हो, स्त्री ‘अप्सरा’ की आभा से परिपूर्ण हो, जीवन आरोग्यता के साथ पुष्टवान देह, आकर्षण, लावण्यता, सम्मोहन से युक्त हो। तभी वे सभी सुखों को पूर्णता से भोग पायेंगे। नवरात्र के किसी भी दिन या शुक्रवार की रात को 10 बजे के बाद पीले रंग की धोती पहन, पीले आसन पर, दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठ जायें। तेल का दीपक जलाकर तांत्रोक्त नारियल को चंदन और सिंदूर से पूरी तरह रंग कर सामने ताम्रपात्र में स्थापित करें। और कुछ अक्षत भी अर्पित करें पश्चात् निम्न मंत्र का 3 माला जप तांत्रोक्त सिद्धि माला से करें।
जीवन को सुखमय बनाने के लिये अत्यन्त आवश्यक है धन, बिना धन के आज के भौतिक युग में कुछ भी संभव नही है, ऐसे में ना किसी पर्व का कोई महत्व होता है ना जीवन का। धन के साथ सहजता व सरसता की स्थिति तभी निर्मित होती है, जब एक ओर खुले हाथों से व्यय करने की स्थिति हो, तो वहीं निरंतर किसी न किसी स्रोत के माध्यम से जितना खर्च हो उसका कोटि गुना धनागम भी होता रहे। जिससे जीवन की सभी भौतिक आवश्कताओं को पूर्ण करते हुये श्रेष्ठ भविष्य के लिये धन संचय करने में भी कोई रूकावट उत्पन्न ना हो। 17 अक्टूबर या किसी भी बुधवार को रात्रि में पीले वस्त्रादि धारण कर पूजा स्थान में बैठ जायें। इस प्रयोग के लिये साधक कमलगट्टे के बीज को घी में डूबोकर निम्न उच्चारण करते हुये हवन कुण्ड या अग्नि जलाकर 108 आहूतियां दें। पश्चात् दुर्गा व गुरू आरती सम्पन्न करें।
यह एक दिवसीय साधना अपने आप में सम्पूर्ण दुर्गति-दरिद्रता नाशक के साथ ही नये धन स्रोतो का उत्तम उपाय है। सभी साम्रगी को जल विसर्जित कर दें।
शत्रु का नाम सुनते ही लोगों में किसी व्यक्ति विशेष की छवि उन्मुख हो जाती है। जबकि शत्रु किसी भी रूप में हो सकते हैं। हमारे सगे-सम्बन्धी भी हमारे घोर शत्रु के रूप में आस-पास होते हैं, जो पूर्णता गुप्त होते हैं, भले ही व्यक्ति कितना ही सौम्य हो अनायास बैर उठाने वालों की कमी नहीं है। विचार शक्ति भी जीवन में कभी-कभी विरोधाभास रूप में हमारे सामने बाधायें उत्पन्न करती है। संतानों का आज्ञा पालक ना होना, पारिवारिक मतभेद ये सभी शत्रुता के भाव ही हैं। जीवन में शत्रुता की उपस्थिति ना हो चाहे वह किसी भी रूप में ही क्यों ना हो।
अनायास पीड़ा व क्लेश देने वाले शत्रुओं के वैचारिक शक्ति को परिवर्तित अर्थात् हमारा सहायक बनाने में सक्षम है। इस साधना को सम्पन्न करने के इच्छुक साधक एक शत्रु विजय यंत्र प्राप्त कर उस पर साबर मंत्र से सिद्ध कपाल भैरव गुटिका स्थापित करें तथा काली धोती पहन दक्षिण दिशा की ओर मुख कर बैठ जाये, सरसों तेल से मिट्टी का दीपक जलाकर निम्न मंत्र का एक घंटा तक सतत् जप करे। यह रात्रि कालीन साधना इतना अचूक है कि साधना के कुछ दिनों पश्चात् ही विरोधियों में विशेष परिवर्तन व मित्रता का भाव दिखने लगता है। गुप्त शत्रुओ के मानस विचार को बदलने में भी यह साधना पूर्णता समर्थ है। जिससे हर दृष्टि से सुरक्षा हो पाती है।
प्रेम स्वयं में हृदयपक्ष का एक प्रस्फुटन होता है। जिसने जीवन में कभी भी प्रेम ही न किया हो, उसका न तो अन्तर्मन खुल सकता है और न उसमें कभी उल्लास व उमंग की ताजी स्वच्छ शीतल वायु का प्रवेश हो सकता है। किन्तु यह स्थिति तब दुखद हो जाती है, जब पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका, सहयोगी कर्मचारी, परिवारिक सदस्यों के बीच किसी कारण मनमुटाव, अलगाव की स्थिति आ जाये अथवा संदेह के कारण किसी गलतफहमी का कोई बीज पड़ जाये या प्रेमी या पति किसी गलत संगत अथवा पराई स्त्री से अनुरक्त हो तो जीवन अत्यन्त पीड़ादायक व कष्टदायक हो जाता है। और स्थिति तब और भयावह हो जाती है जब ससुराल पक्ष भी हेय दृष्टि से देखे, या ससुराल में उचित सम्मान, प्रेम का ना मिल पाना। ऐसे में यह साधना रामबाण साबित होती है, जो अपने आप-पास के वातावरण का ही वशीकरण कर आपके अनुकूल बना देती है। साधक एक प्रेममय वशीकरण के तेज पुंज से युक्त हो जाता है जिसकी स्पर्श में आने वाला हर शख्स उसका ही बनकर रह जाता है। 18 अक्टूबर या किसी भी सोमवार की रात्रि में गुलाबी वस्त्र पहन कर, हरे रंग (हरा आसन ना हो तो पीले आसन पर हरा सूती कपड़ा डालें) के आसन पर बैंठे और दोनों हथेलियों में कोई सुगन्धित इत्र लेकर कलमाद माला पर महकायें और उसे गले में पहन कर निम्न मंत्र का एक घंटे तक जप करें। अन्य किसी विधान की जरूरत नहीं है।
यह अत्यधिक तीव्र प्रयोग है। साधना समाप्ति के अगले दिन माला को किसी नये हरे रंग के रेशमी कपड़े में लपेट कर कुछ मिठाई व फूल के साथ किसी मजार पर पूरे सम्मान के साथ भेंट चढ़ा दें।
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