





भगवती काली का वर्णन प्रत्येक विज्ञजन ने अपनी अपनी भावनानुसार किया है। कोई उन्हें कृष्णवर्णा बताता है, तो कोई उन्हें रक्तवर्णा। महानिर्वाण तंत्र के अनुसार काली का वर्ण काला बताया गया है। जिस प्रकार काले रंग में प्रत्येक चाहे वह श्वेत हो, पीला हो, नीला हो, आपस में समाहित हो एकमात्र काले रंग के ही प्रतीत होते हैं, ठीक उसी प्रकार विश्व के प्रत्येक जीव का समाहितीकरण- चाहे वह किसी भी वर्ण का हो, काली में हो जाता है, विश्व के समस्त प्राणियों का लय काली में होना माना गया है, अतः शास्त्रकारों ने निराकार, निर्गुणा, कालशक्ति काली का रंग काला ही निरूपित किया है।
भगवती के ललाट पर अमृतत्व रूपी चन्द्रमा सुशोभित है, अतः काली के साधक को अमृतत्व की प्राप्ति होती है। वे मुक्तकेशी होने के कारण केश विन्यास से रहित त्रिगुणातीता हैं। सूर्य, चन्द्र और अग्नि ये भगवती के तीन नेत्र है, जिनके कारण वे समस्त लोकों व समस्त कालों को देखने में समर्थ हैं। जिस प्रकार सिंह गर्जना से भयभीत हो अन्य पशु भाग जाते हैं, उसी प्रकार महाकाली का नाम सुनते ही समस्त पाप-दोष, तंत्र बाधा, कालसर्प दोष पलायित हो जाते हैं। भगवती ने अपने कान में बालकों के शव कुण्डलवत पहन रखे हैं। इस कथन का तात्पर्य है, कि वे सदैव अपने बाल सुलभ हृदय वाले साधकों की प्रार्थना को सुनती हैं और उनकी मनः इच्छा को पूर्ण करती हैं।
भारतीय आचार्यों ने भगवती काली को दस महाविद्याओं में सर्वप्रमुख स्थान दिया है। आचार्य भट्ट ने काली के दस अर्थ बतायें हैं-
शास्त्रोक्त नियमों के अनुसार नवरात्रि के प्रथम दिवस पर ही जीवन में हर दृष्टि से सुमंगलता की स्थितियों को प्राप्त करने के लिये साधक प्रातः 9 बजे के बाद अपने पूजा स्थान में शुद्ध वस्त्र लाल धोती पहनकर और गुरू चादर पहन कर तथा साधिकायें लाल साड़ी पहन कर साधना करें। प्रातः घट स्थापन के साथ ही आसन पर दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर बैठ जायें और सामने तेल का दीपक लगा लें, प्लेट में सुमंगलमय त्रिशक्ति सिद्ध महाकाली गुटिका को स्थापित कर दें। और साथ में अमंगलमय स्थितियों को समाप्त करने हेतु हकीक माला को स्थापित कर इन सभी को सिन्दूर का तिलक करें। इसके बाद सभी सामग्री का पंच पूजन करें।
नित्य 1 माला अगले नव दिवस तक करें।
यह साधना साधक के लिये शीघ्र फलदायी होती है, दरिद्रता निवारण, पाप-ताप, कालसर्प दोष निवारण, शक्ति प्रदायक, कार्यो में अनेक विघ्नों को समाप्त करने, जीवन को मंगलमय बनाने, शत्रुभय शांति हेतु यह साधना सर्वश्रेष्ठ है। साधना के पूर्णता के पश्चात् यंत्र को लाल कपड़े में बांधकर किसी निर्जन स्थान पर गाड़ दें, बाकी सभी सामग्री को किसी सरोवर में प्रवाहित कर दें। ऐसा करने से सभी दोषो से मुक्ति मिलती है और साधक दिन-प्रतिदिन सुवृद्धि की ओर बढ़ता है।
इस सृष्टि में जो कुछ भी है विद्या, अविद्या, माया वह आद्या शक्ति का ही स्वरूप है। बुद्धि, श्री, कीर्ति, गति, श्रद्धा, मेधा, दया, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा, क्षमा, कान्ति, शान्ति, स्पृहा, पुष्टि ये सभी शक्ति महाकाली के स्वरूप में विद्यमान हैं। प्रत्येक साधक को सुमंगलमय वृद्धि के लिये निरन्तर शक्ति की आवश्यकता होती है और शक्ति प्राप्त करने के लिये तथा प्राप्त शक्ति के चिर स्थायीत्व के लिये आद्या शक्ति की चेतना को आत्मसात करना ही चाहिये। जिस व्यक्ति के जीवन में कर्म शक्ति, ज्ञान शक्ति और दुखों को समाप्त करने की शक्ति होती है, वही जीवन की सभी भौतिक और गृहस्थ रूप में उच्चता और श्रेष्ठता प्राप्त करता है। नवरात्रि जीवन की सभी अमंगलमय स्थितियों से निजात पाने का श्रेष्ठतम अवसर है।
सोलह कला प्राप्ति सुमंगल शक्ति दीक्षा से अर्थ, क्रिया शक्ति से युक्त होकर सभी दुःख, कष्ट, धनहीनता के अभावो की समाप्ति निश्चिन्त रूप से प्राप्त होगी। साथ ही जीवन के सभी अमंगलमय रूपी पाप-ताप, संताप, दोष, दुःख, धन न्यूनता आद्या शक्ति के तेजमय स्वरूप से भस्मीभूत हो सकेगी।
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