





दस महाविद्या साधना क्रम में भुवनेश्वरी साधना एक ऐसी अद्वितीय साधना है जो शिष्य को गुरू की कृपावश प्राप्त होती है तथा जिसे सम्पन्न कर वह सर्वश्रेष्ठ व्यक्त्वि बनने की ओर अग्रसर होता है।
सांदीपन ऋषि ने भी कृष्ण को जब विश्व का अद्वितीय और श्रेष्ठतम व्यक्तित्व बनाने की क्रिया आरम्भ की तो उन्हें भुवनेश्वरी साधना ही सम्पन्न करवाई थी। भुवनेश्वरी साधना सम्पन्न करने के बाद साधक में समस्त चर-अचर को सम्मोहित करने की क्षमता आ जाती है, उसके समक्ष समस्त प्राणियों की वाणी स्तम्भित हो जाती है तथा इस प्रकार निर्बल शक्तिहीन व्यक्ति भी शक्ति सम्पन्न बन जाता है, क्योंकि भगवती भुवनेश्वरी साधना को सिद्ध करने के पश्चात् साधक के लिये वशीकरण, सम्मोहन, आर्थिक सम्पदा तथा शत्रु पर विजय प्राप्त करना कठिन कार्य नहीं रहता है। उसके जीवन में अभाव होता ही नहीं।
दक्षिणामूर्ति संहिता के अनुसार भगवती भुवनेश्वरी के बीज मंत्र में आकाश बीज हकार में कैलाशादि समाहित हैं, वहीं बीज रेफ में पृथ्वी समाहित है तथा ईकार अनन्त रूप में पाताल में स्थित हो समस्त भू-मण्डल को समाहित किये हुये है। अतः तीनों लोकों स्वर्ग, मृत्य और पाताल के समाहित होने के कारण ही इन्हें त्रिभुवनों की नायिका मानकर भुवनेश्वरी कहा गया है।
देवी भागवत में वर्णित देवी का शक्ति स्वरूप तथा महालक्ष्मी स्वरूप का समन्वित रूप है ह्रीं बीज। भुवनेश्वरी साधना का अर्थ है कि साधक समस्त प्रकार की भौतिक सम्पदाओं को प्राप्त करता हुआ साधना के उस उच्चतम सोपान को प्राप्त करे, जहां साधक कालपुरूष बन जाता है। भगवती भुवनेश्वरी को अनेक स्वरूपों में सम्बोधित किया गया है, प्रत्येक स्वरूप साधक के लिए नवीन चिन्तन युक्त है। विश्वोत्पत्ति के पश्चात् जब वह शक्ति त्रिभुवन का संचालन करती है, तो उसे भुवनेश्वरी के रूप में सम्बोधित किया गया।
अमृत से विश्व का पोषण करने के लिए भगवती ने अपने किरीट पर चन्द्रमा धारण किया। भगवती के इस स्वरूप का इन्दु किरीटी के रूप में चिन्तन किया गया है। भगवती त्रिनेत्र स्वरूप हैं, अतः उन्हें नेत्रों द्वारा सम्पूर्ण लोको को प्रकाशित करने का हेतु कहा गया। समस्त योनियों के पोषण करने के फलस्वरूप उन्हें वरदा कहा गया। अत्यन्त कृपायुक्त, स्नेहयुक्त दयामयी भगवती को स्मेरूमुखी (मन्द हास्य युक्त मुख वाली) माना गया है तथा उनके हाथ में शोभित अंकुश शासन शक्ति का प्रतीक है।
यह साधना साधनात्मक उन्नति के साथ सामाजिक, गृहस्थ पूर्णता, यश, आध्यात्मिक उच्चता, सम्मान, भौतिक सम्पदा, सफलता प्राप्त कर स्थिर बनायें रखने में पूर्णतया समर्थ व महत्वपूर्ण साधना है।
संसार की त्रिगुणात्मक शक्तियां महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती है। महालक्ष्मी का श्रेष्ठतम स्वरूप वरदायक स्वरूप भुवनेश्वरी माना गया है, यह दस महाविद्याओं में एक है। भुवनेश्वरी साधना अत्यन्त सरल, सौम्य अद्वितीय एवं शीघ्र सफलतादायक है, जीवन में अष्टपाश रूपी मृत्यु, रोग, ऋण, कुटुम्ब क्षय, बुद्धि हीनता, शत्रु आक्रमण, गृहस्थ न्यूनता, अज्ञानता रूपी स्थितियों को समाप्त करने में यह अष्टगण वैभव शक्ति भुवनेश्वरी साधना सर्व रूप में श्रेष्ठ है। भुवनेश्वरी साधना भगवान शिव के द्वारा प्रदत्त वरदान है। इस भुवनेश्वरी साधना के माध्यम से सभी जीवन के आयाम धन, यश, मान, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य, विलास, पूर्णता, सफलता, अनुकूलता, व्यापार वृद्धि, भोग और वह सब कुछ जो आप चाहते हैं।
यह पंच दिवसीय साधना है। यह शनिवार से ही प्रारम्भ करनी चाहिये। साधक शुद्ध पीला वस्त्र धारण करें। लकड़ी के बाजोट पर पीले वस्त्र बिछायें तथा उस पर चावल से ह्रीं और गं निर्मित करें अष्ट वैभव प्रदायिनी भुवनेश्वरी यंत्र को स्थापित करें। यंत्र की बायीं और अष्ट सिद्धि गुटिका रखें। यंत्र व गुटिका का पूजन कुंकुम, अक्षत तथा पुष्प से करें। घी का दीपक लगायें।
भुवनेश्वरी अष्ट वैभव सम्मोहन शक्ति का ध्यान करें-
सिन्दूरारूण विग्रहां त्रिनयनां माणिक्य मौलिक्।
रत्तारानायक शेखरां स्मितमुखी।। वक्षोरूहाम् पाणिभ्यां
मणिपूर्णरत्नचषकं।। रक्तोत्पलं विभ्रतीं सौम्या रत्नघटस्थ
सत्यचरणां अष्ट वैभव ध्यायेत्पराम्बिकाम।।
ध्यान के पश्चात् खड्ग माला से निम्न मंत्र का नित्य 9 माला मंत्र 5 दिन तक जप करें।
साधना समाप्ति के पश्चात् अष्ट सिद्धि गुटिका को 3 माह तक तिजोरी में रखें और यंत्र, माला को किसी जलाशय में अष्ट गण भुवनेश्वरी मंत्र का 21 बार जप करते हुये प्रवाहित कर दें।
अपने जीवन के सभी दुःख, संताप रूपी संकटों पर विजय प्राप्त करने व धन हीनता, रूग्णता, न्यूनता, अकर्मणयता रूपी शत्रुओं पर विजय हेतु कार्तिकेय विजयश्री प्राप्ति शरद पूर्णिमा साधना महोत्सव 26-27 अक्टूबर 2015 को बसना महासमुन्द (छ-ग) में सम्पन्न होगा। जिससे शरद पूर्णिमा की शीतलता, सौन्दर्यता, सौम्यता, कोमलता को अपने सद्गुरूदेव के सानिधय में आत्मसात कर गृहस्थ विजय युक्त आत्मिक चेतना से परिपूर्ण हो सकेंगे और कार्तिकेयमय रूपी गृहस्थ योद्धा स्वरूप से जीवन में विजय को निरन्तरता युक्त बनायें रखने हेतु माता खाल्लेरी की चैतन्य भूमि पर विशिष्ट दीक्षा, कार्तिकेय विजय शक्ति हवन, शिव-गौरीमय रूद्राभिषेक, प्रवचन और अंकन की श्रेष्ठतम क्रियायें सम्पन्न होंगी।जिससे आने वाला दीपावली पर्व भौतिक सम्पदा, आध्यात्मिक पूर्णता, शारीरिक व मानसिक श्रेष्ठता से युक्त हो सकेगा।
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