





आकर्षण-विकर्षण तो प्रकृति का निश्चित नियम है, जिस प्रकार चुम्बक के पास लोहा ले जाने पर उसे चुम्बक पकड़ लेता है, उसी प्रकार इस जीवन का भी यह खेल है, जिसकी ओर मन आकर्षित होता है, उसे वह सम्पूर्ण रूप से प्राप्त करना ही चाहता है, और भावना बढ़ती-बढ़ती इच्छा का रूप ले लेती है।
आकर्षण भाव में रस, सौन्दर्य-भाव सबसे अधिक प्रभावशाली हैं, यह सौन्दर्य व रस-तत्व ऐसे तत्व हैं, जिन्हें बार-बार देखने की, उन्हें अपने भीतर पूर्ण रूप से समाहित कर लेने की इच्छा रहती है, यह सौन्दर्य, स्थान-सौन्दर्य, प्रकृति-सौन्दर्य, वाणी-सौन्दर्य कुछ भी हो सकता है।
सौन्दर्य अर्थात् सुन्दरता एक ऐसा तत्व है, जिसे आप उपेक्षित नहीं कर सकते हैं, उसमें तो एक ऐसा आकर्षण होता ही है, कि मन रोकते हुये भी नहीं रूकता, यह केवल शरीर के माध्यम से पूर्ण स्पष्ट हो बल्कि हाव-भाव, व्यवहार, वाणी, वस्त्र आदि से स्पष्ट हो, पूर्ण रूप से लयबद्ध हो, वाणी में संगीत का अनुभव हो, नेत्रों में ऐसी दृष्टि हो जो हृदय के भीतर समा जाये, यही तो सौन्दर्य का आकर्षण है, जीवन की जो सौन्दर्य के प्रति स्वाभाविक प्रकृति है, वह रोकने पर भी नहीं रूकती, तो उसे झूठे बन्धनों से क्यों जकड़ा जाये?
जीवन में हास्य, विनोद, आनन्द व तृप्ति प्राप्त हो जाना कोई सामान्य सी बात नहीं है, यह तो जीवन की श्रेष्ठतम उपलब्धि है, जिसे प्राप्त करने के लिये बड़े-बड़े योगियों और ऋषि-मुनियों ने कठिन से कठिन तप किया है। तब जाकर वे पूर्ण कहलायें और यह दिखा दिया कि यदि दृढ़ निश्चयी और आत्मविश्वासी हो, तो वह तप व साधना के बल पर क्या कुछ नहीं कर पाता और जब ऐसा होगा तो उसके चेहरे पर एक ओज, एक उमंग, एक आह्लांद, एक प्रसन्नता स्वतः ही झलकने लग जायेगी और यही तो वास्तविक सौन्दर्य है।
सौन्दर्य किसी नारी, अप्सरा या प्रकृति का नाम नहीं है, वे तो केवल सौन्दर्य के प्रतिमान हैं जिन्हें देखकर आप अपने-आप को चिंता मुक्त अनुभव करने लगें और आनन्द की स्थिति उत्पन्न होने लगे, सही अर्थों में वही सौन्दर्य है।
आज सौन्दर्य प्रसाधनों के माध्यम से व्यक्ति सौन्दर्यशाली बने रहने का प्रयास करता है तरह-तरह के विटामिन्स खाता है। सौन्दर्य विशेषज्ञ भी सौन्दर्य का स्थायी हल ढूंढने के प्रयास में रहते हैं। किन्तु आज तक स्थायी उपाय प्राप्त करने में असफल ही है। हां, यह जरूर है कि सर्जरी के माध्यम से चेहरे व शरीर की झुर्रियों को समाप्त करने में डॉक्टर सफल हुये हैं, किन्तु यह चिकित्सा अत्यन्त महंगी हैं और अत्यन्त कष्ट साध्य भी है जिसे अपनाना प्रत्येक व्यक्ति के सामर्थ्य की बात नहीं हैं
यदि हम अपना थोड़ा सा ध्यान ऋषि परम्परा द्वारा आविष्कृत उपायों पर डालें, तो हमें पता चलेगा कि सौन्दर्य का स्थायी उपाय उन लोगों ने बहुत पहले ही ढूंढ निकाला है। हमारे प्राचीन ऋषियों तथा धन्वन्तरी, अश्विनी, च्यवन आदि ऐसे व्यक्तित्व हुये हैं जिन्होंने अपने पूरे जीवन को इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु लगा दिया कि
आखिर देह का वास्तविक स्वरूप क्या हो?
कैसे अपने को ओजस्वी, यौवनवान और सौन्दर्यवान बनाया जा सकता हैं?
किस प्रकार वृद्धावस्था को कामदेव शक्ति से युक्त यौवन मे बदला जा सकता है?
किस प्रकार अपने पूर्ण शरीर का कायाकल्प किया जा सकता है।
कायाकल्प का तात्पर्य उस सदाबहार तरोताजगी, अद्वितीय सौन्दर्य और उस मस्ती से जो जीवन में आनन्द का बीज बो दे, 60 वर्ष के वृद्ध को भी 16 वर्षीय पूर्ण सौन्दर्य प्रदान कर दें, क्योंकि व्यक्ति तन से भी अधिक मन पर थोपे गये विचारों से बूढ़ा हो जाता है। और उसका सारा सौन्दर्य ही ढ़ल जाता है। जीवन में इस आनन्द का होना ही सौन्दर्य वृद्धि है।
सौन्दर्य तो आधार है जीवन का, ईश्वर का दिया हुआ वरदान है जिसको प्राप्त करना जीवन की श्रेष्ठता, पूर्णता कही जाती है। जिसने भी ग्रन्थ, वेद, पुराण, आदि लिखे गये हैं उन सब में सौन्दर्य का विस्तृत विवेचन हुआ है।
सुन्दर होना, सुन्दर दिखना, सुन्दरता का सम्मान करना, उसकी प्रशंसा और सराहना करना मानव का धर्म है। मैंने अपने जीवन में सिद्धाश्रम मे अनिन्द्य सुन्दर साधिकाओं और संन्यासियों को देखा है। एक से बढ़कर एक सुन्दरियों व अप्सराओं को भी साधनारत होते देखा हैं जो अपनी देहयष्टि को पूर्ण यौवनवान और चैतन्यवान बनाने के लिये साधनारत रहती है।
निश्चित रूप से साधना के द्वारा भी अनिन्द्य सौन्दर्य प्राप्त किया जा सकता है। अप्सरायें भी सुन्दरतम बनने के लिये सौन्दर्य साधना करती हैं।
सौन्दर्य साधना ऐसी ही अद्वितीय साधना है जिसे अप्सराओं ने भी सिद्ध किया। वैसे तो पूर्ण यौवनवान और सौन्दर्यवान बनने के लिये 16 प्रकार की अप्सराओं की साधनाओं का ही महत्व पुराणों में प्रतिपादित किया गया है, किन्तु जिसे प्राप्त करने के लिये स्वयं अप्सरायें भी लालायित हों, उस सौन्दर्य की तो मात्र कल्पना ही की जा सकती है। और ऐसे अद्वितीय सौन्दर्य का प्राप्त होना जीवन का सौभाग्य हैं, जीवन की श्रेष्ठता हैं, जीवन की सम्पूर्णता है।
इस साधना को स्त्री व पुरूष दोनों ही सम्पन्न कर अपने शरीर का पूर्ण कायाकल्प कर सकते हैं। जहां पुरूष यह साधना कर उंचा कद, उन्नत ललाट, अत्यधिक दिव्य और तेजस्वी आंखे, उभरा हुआ वक्षस्थल, लम्बी भुजायें और उसे साथ ही साथ दृढ़ता, पौरूष, साहस प्राप्त कर उसे कामदेव युक्त देह का मालिक बनाता है, जो दर्शनीय हो, शौर्य और साहस का प्रतिबिम्ब हो, वहीं स्त्रियां भी सांचे में ढला हुआ भरा-पूरा शरीर, गोरा रंग, अण्डाकार चेहरा, उन्नत उरोज और मुठ्ठी में आने लायक कमर एक ऐसा शरीर जो खिले हुये गुलाब के पुष्प की याद दिलाता हो, जिसे देखकर बहते हुये झरने का लुभावना नृत्य दिखाई दे, जिसके एहसास से ही जीवन मे आनन्द की अनुभूति होती हो।
1- कामदेव के मंत्रों से प्रतिष्ठित शरद पूर्णिमा चैतन्य युक्त ‘रति अनंग यंत्र’ और कामदेव सौन्दर्य वृद्धि नीलकर्ण मुद्रिका को साधना से पूर्व साधक प्राप्त कर लें।
2- यह साधना माह के किसी भी शुक्रवार के दिन अथवा पूर्णिमा के दिन प्रारम्भ करें।
3- रात्रि को 8 बजे के बाद यह साधना प्रारम्भ करें।
4- साधना प्रारम्भ करने से पूर्व ही अपने साधना कक्ष को अच्छी तरह धोकर साफ-सुथरा कर लें। साधना काल में प्रत्येक सामग्री में नूतनता स्पष्ट होनी चाहिये, क्योंकि सौन्दर्य साधना के लिये यह सब नवीनता आवश्यक है।
5- स्वयं भी स्वच्छ और सुरूचिपूर्ण वस्त्र धारण करें।
6- अपने सामने एक चौकी बिछा कर उसके ऊपर एक पीला कपड़ा बिछा लें, पानी से भरा एक सुन्दर कलश रखें, उसके ऊपर पीले चावल हल्दी से रंगकर एक प्लेट में जो उस कलश पर रखी जा सके रख दें।
7- पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर लाल आसन पर बैठकर यह साधना सम्पन्न करें।
8- इसके बाद यंत्र को जल से धोकर पोंछ लें और यंत्र पर इत्र छिड़क दें तथा अपने ऊपर भी इत्र छिड़के धूप व दीप से वातावरण को सुगन्धमय बनायें।
9- यंत्र को पीले चावलों के ऊपर स्थापित करें, इसके बाद यंत्र पर केसर से पांच बिन्दी लगायें, जो पांच प्राणों की प्रतीक है, क्योंकि सौन्दर्य का प्रतिस्फुरण इन्हीं प्राणों के माध्यम से शरीर में अभिव्यक्त होता है।
10- मुद्रिका को भी यंत्र के ऊपर स्थापित कर दें।
11- निम्न मंत्र को बोलते हुये यंत्र पर पांच बिन्दियां लगायें तथा मुद्रिका पर भी एक बिन्दी लगायें।
ऊँ गन्धद्वारां दुराधर्षा नित्यपुष्टां करीषिणी। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहो पह्वयेश्रियम्।।
12- अक्षत चढ़ायें
अक्षतान् धनलान् देवि शालीयांतन्दुलांस्तथा।
चन्द्र ज्योत्सना पूजार्थ गृहाण परमेश्वरि।।
यंत्र, कलश तथा मुद्रिका पर चावल छिड़के।
13- इसके बाद धूप और दीप दिखाकर दोनों हाथों में खुले पुष्प पुष्पांजलि अर्पित करें।
नाना सुगन्ध पुष्पाणि यथा कालोद्भवानि च।
पुष्पांजलिर्मयादत्ता गृहाण परमेश्वरि।।
यंत्र के ऊपर पुष्प चढ़ा दें।
14- इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करें हे सौन्दर्यत्तमा कामदेव आपके भीतर समाहित सभी गुण मुझमें अनुप्राणित हों।
सौन्दर्य भवतीरहो के माधुर्य ओजमं तेजस्तथेदं।
रूपोज्जला रूपदिव्या कामदेव नित्यं त्वं देहि मातः।।
हे रूपोज्जवल देवी! आप सौन्दर्य की अधिष्ठात्री देवी हैं, ओज और तेज सभी दिव्य गुण आप में समाहित है। मैं आप से इसी रूप राशि की प्राप्ति की कामना करता हूं।
15- इसके बाद निम्न मंत्र का रूप अनिन्द्य माला से
11 माला मंत्र जप करें।
16- जप समाप्ति बाद गुरू पूजन व गुरू मंत्र जप करें।
17- तीन दिवसीय साधना के बाद सभी सामग्री को जलाशय में प्रवाहित कर दें।
यह साधना अत्यंत ही प्रभावोत्पादक एवं शीघ्र लाभप्रद है। साधना के थोड़े दिन बाद ही आप अपने भीतर विशिष्ट गुणों का आविर्भाव अनुभव करेंगे। तथा शनैः शनैः सौन्दर्य वृद्धि अनुभव होने लगेगी ओर दूसरों के साथ-साथ स्वयं को भी इस बात का एहसास होने लगेगा। इस साधना को गम्भीरता पूर्वक पूर्ण श्रद्धा से करें।
सौन्दर्य, आकर्षण, प्रेम, रस, मधुरता, कोमलता के आधार पर ही श्रेष्ठ जीवन जीया जा सकता है। जिनके भी जीवन में इन तत्वों का समावेश होता है, वे पूरी प्रसन्नता के साथ जीवन का पूर्ण आनन्द प्राप्त करते हुये जीवन व्यतीत करते हैं। सही मायने में ऐसे ही साधक पूर्ण हैं। जो जीवन को आनन्द के साथ जीते हैं। आपके पास धन हो पर प्रेम का अभाव, रोग, कायरता, आलस, तृष्णा से युक्त जीवन भी किस काम का है।
जीवन को नवीन चेतना, उर्जा, ओज, तेज, आकर्षण, उत्साह, प्रेम, सौन्दर्य, पुष्ट कान्ति युक्त देह से युक्त करने हेतु सौन्दर्यात्मा कामदेव रति अनंग शक्ति दीक्षा प्रत्येक साधक-साधिकाओं को प्राप्त करना चाहिये। जिससे जीवन के उन अभावों, इच्छाओं को पूर्ण किया जा सकें जिनके बिना जीवन नीरस, शुष्क, बेजान सा था। पूर्ण रूप से सौन्दर्य व कायाकल्प की क्रिया की प्राप्ति हेतु शक्तिपात दीक्षा प्राप्त करने के पश्चात् साधना सम्पन्न करें। जिससे कामदेव सौन्दर्य शक्ति तत्व को पूर्णता से अपने जीवन में आत्मसात कर सकेंगे।
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