





पर—–मैंने झिझकते हुए कहा, भैरवी तो उग्र देवी है और सुना है उनकी साधना तलवार की धार के समान है और अगर कोई भूल हो जाये तो गये काम से—। वह हो-हो कर हंस पड़े। मेरी बात कतई हास्यास्पद नहीं थी, पर वह ऐसे हंस रहा था, मानो मैंने कोई चुटकुला सुना दिया हो।
अरे नहीं—नहीं! वह हंसी के बीच बड़ी मुश्किल से बोलें, ये सब कहां से सीख लिया तूने, कितनी बार समझाया है, कि इन दो टके के साधुओं के पास मत बैठा कर, जो चौबीसों घण्टे चिलम सुलगाते रहते हैं। ये बेचारे खुद भटके हुये हैं, तुझको क्या रास्ता बतायेंगे—? पर फिर भी—है तो यह बात सच ही? अरे नहीं, ये सब फालतू बातें हैं, लोगों को गुमराह करने के लिये और अपनी दुकान जमाने के लिये है।
अच्छा अगर मैं तुझसे कहूं, कि भैरवी से ज्यादा सौम्य देवी और कोई है ही नहीं और इसकी साधना अत्यन्त सुगम है तो? मेरी आंखें आश्चर्य के साथ फैल गयी और उनमें सन्देह साफ-साफ झलक रहा था, असंज्ञानन्द ने मेरी मनोस्थिति तुरन्त भांप ली। तेरा इस तरह से आश्चर्य करना सही ही है, परन्तु मैं तुझसे दो टूक सत्य कह रहा हूं, कि भैरवी साधना बहुत सहज, सौम्य एवं साधक के लिए सर्वोपयोगी साधना है, जिसके बिना उसका जीवन अर्थहीन, सामान्य एवं चेतनाहीन रहता है।
शिव की ‘शिवा’ पूर्ण शक्ति स्वरूपा मां हैं और उन्हीं के दस अंशो से दस महाविद्याओं का प्रादुर्भाव होता है अर्थात् अगर हम दसों महाविद्याओं को संग्रहित करें, तो जो पिंड प्राप्त होता है वही आद्या शक्ति कहलाती है। इन दस महाविद्याओं का विभाजन करके ही चौंसठ योगिनियों या भैरवियों की उत्पति होती है, जो मूल रूप से शक्ति स्वरूपा ही हैं।
भैरवी तो मात्र उस सर्वव्यापी शक्ति, उन महाविद्याओं की ही अंश स्वरूपा है और जब महाविद्याओं की साधना करने में कोई नुकसान नहीं, तो फिर भैरवी की साधना में ऐसा कैसे सम्भव है और अगर अनुभव के आधार पर सच कहूं तो भैरवी साधना अन्य शक्ति साधनाओं से ज्यादा उपयोगी एवं महाविद्या साधनाओं में सफलता की प्रथम सीढ़ी है।
मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। अब भैरवी साधना महाविद्या साधनाओं से ज्यादा उपयोगी कैसे हो गई, जबकि वह खुद ही महाविद्या का अंश मात्र है। असंज्ञानन्द ने मेरे चेहरे पर उठते हुये संशय के भावों को अनदेखा करते हुये अपनी बात आगे बढ़ाई, जब कोई व्यक्ति पी-एच-डी- करना चाहता है तो उससे पूर्व उसे इण्टर, ग्रेजुएट आदि करना पड़ता है। वे उसके लिये अत्यधिक उपयोगी हैं और कोई भी व्यक्ति पी-एच-डी सीधे नहीं कर सकता—–बेशक कोशिश करके देख लो।
उसी तरह आप सीधे दस महाविद्याओं की साधना नहीं सिद्ध कर सकते, क्योंकि उनके लिये अद्वितीय चेतना एवं तेजस्विता की आवश्यकता होती है जो केवल भैरवी साधना के द्वारा ही प्राप्त हो सकती है। जो लोग कहते हैं, कि उन्हें महाविद्या सिद्ध है उनमें से 95 बकवास करते हैं, क्योंकि इतनी तीव्र एवं उग्र शक्ति को अपने शरीर में स्थापित करने के लिये किसी भैरवी की सहायता आवश्यक है।
असंज्ञानन्द ने उस दिन भैरवी साधना से सम्बन्धित न जाने कितनी गूढ़ बातें मुझे बतायी। जब मैंने उनसे किसी भैरवी साधना के विषय में जानकारी चाही, तो उन्होंने मुझे ‘सकल सिद्धिदा भैरवी’ के विषय में विशिष्ट जानकारी दी,
सकल सिद्धिदा भैरवी सौम्य साधना है। सिद्धिदा भैरवी चौंसठ भैरवियों में से एक हैं और साधकों को योग क्षेत्र में अग्रसर करती रहती हैं।
ऊपर दिये गये बिन्दु जो इस सिद्धिदा भैरवी की साधना सम्पन्न करने से व्यक्ति के जीवन में स्वतः ही प्राप्त होने लग जाती हैं और स्वयं भैरवी भी चौबीस घण्टे अदृश्य रूप से साधक से साथ रहती है।
यह साधना अत्यधिक सरल है और इसको स्त्री-पुरूष कोई भी सम्पन्न कर सकता है। इसमें निम्न सामग्री की आवश्यकता होती हैं- सकल सिद्धिदा त्रिपुरी भैरवी यंत्र, सर्व सिद्धि प्रदायक भैरवी माला ।
यह साधना भैरवी जयंती 25 दिसम्बर को सम्पन्न करे या किसी भी शुक्रवार को रात्रिकाल में। साधक सफेद स्वच्छ धोती पहन कर श्वेत आसन पर दक्षिणाभिमुख होकर बैठ जायें और अपने सामने सफेद वस्त्र से ढके बाजोट पर त्रिपुर भैरवी यंत्र स्थापित कर, उसका विधिवत पंचोपचार पूजन सम्पन्न करें। फिर यंत्र पर लाल सिन्दूर अर्पित करते हुये, जीवन में सभी दृष्टियों से पूर्णता प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त करें, कि भैरवी निरन्तर सहयोगिनी बनी रहे।
इसके उपरान्त भैरवी माला’ से निम्न मंत्र का 10 माला जप करें।
साधना समाप्ति के उपरान्त समस्त साधना सामग्रियों को किसी जलाशय में अर्पित कर दें।
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